संकर भाषा के जन्म पर सोहर उर्फ़ डोंट टच माइ गगरिया मोहन रसिया – १

जुलाई 25, 2007

संकर भाषा के जन्म पर सोहर 

उर्फ़ 

डोंट टच माइ गगरिया मोहन रसिया – १

 

पमन्यु चटर्जी के अंग्रेज़ी उपन्यास इंग्लिश ऑगस्ट का नायक अगस्त्य सेन समकालीन भारत की ऐसी युवा पीढी का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी अंग्रेज़ी शिक्षा ने उसे अपने समाज और जीवन से काट कर अपने ही देश में अजनबी बना दिया है . अब कम-से-कम भाषा के स्तर पर यह दूरी पाटने की एक जोरदार मुहिम चल निकली है . हिंदी में अंग्रेज़ी की अनपेक्षित और अवांछनीय घालमेल से एक नए किस्म की संकर भाषा के जन्म पर विद्वज्जन बलिहारी हो रहे हैं . और ऐसा करते समय वे भाषाओं के मध्य अंतर्क्रिया,उदार ग्रहणशीलता, अनुकूलन और समंजन जैसे पदबंधों और संप्रत्ययों का भी बेहद होशियारी से हवाला देते चलते हैं .

हिंदी बोलते समय अंग्रेज़ी शब्दों का इस्तेमाल कोई नई घटना नहीं है . इसकी पृष्ठभूमि में है हमारा औपनिवेशिक अतीत . निस्संदेह यह हमारी मौखिक अभिव्यक्ति का हिस्सा रहा है . परंतु अब जब सांस्कृतिक प्रभुत्ववाद के भूमंडलीय अभियान के तहत इसे बाकायदा एक भाषा का दर्जा देकर महिमामंडित किया जा रहा हो और इसे नए युग की भाषा के रूप में प्रचारित किया जा रहा हो तो न केवल इस भाषा के स्वरूप-संरचना और प्रभाव पर  विचार करना ज़रूरी हो गया है वरन समूचे सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक  है .

                                                                             

                                                                                     क्रमशः ……. 

हमारी राष्ट्रीय परम्परा

जुलाई 20, 2007

हमारे यहां कंटिया फ़ंसाने की सामाजिक स्वीकृति है.

धनिया में लीद मिलाने और कालीमिर्च में पपीते के बीज मिलाने को सामाजिक अनुमोदन है.

रिश्वत लेना और देना सामान्य और स्वीकृत परंपरा है और उसे लगभग रीति-रिवाज़ के रूप में मान्यता है.

कन्या-भ्रूण की हत्या यहां रोज़मर्रा का कर्म है और अपने से कमज़ोर को लतियाना अघोषित धर्म है .

काहिली और कामचोरी  हमारा स्वर्ग है और चापलूसी-मुसाहिबी अपवर्ग . 

शिकायत हमारा संध्या-नियम है, मंत्रोच्चार है और भ्रष्टाचार में  प्रकट-प्रदर्शित हमारा सुविचार और आचार है .

अगर किसी की लड़की अपनी मर्ज़ी से, अपनी पसन्द के किसी लड़के से शादी कर ले तो महाभारत  है, विश्व-युद्ध है और  बिजली का ४४० वोल्ट का करेंट है . यह पाप और पतन की पराकाष्ठा है, पर गणेश जी को दूध पिलाना हमारी धार्मिक आस्था है .

पड़ोसी की लड़की के प्रेम विवाह करने पर फ़लाने की लड़की भाग गई इसका जोर-शोर से संचार है, प्रचार है और उससे उपजा जुगुप्सा और जुगाली का रसबोध है . पर हमारी बेबी तो बिलकुल गऊ है, अबोध है .

हमारा लड़का हमें गरियाते और जुतियाते हुए भी श्रवणकुमार है , पर पड़ोसी का  ठीक-ठाक-सा  लड़का भी बिलावजह दुष्ट और बदकार है .

परम्परा हमारे रसबोध का स्रोत है . परम्परा हमारे जीवन का आधार है .

परम्परा हमारे हर मर्ज की रामबाण दवा है . परम्परा हमारे नैतिकबोध का  सार है .

हमें अपनी परम्पराओं पर गर्व है .

 

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मैंने सात बार ……..

जुलाई 13, 2007

खलील जिब्रान  का  सुभाषित गद्यकाव्य

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मैंने सात बार अपनी आत्मा से घृणा की

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मैंने सात बार अपनी आत्मा से घृणा की :

प्रथम  :    जब मैंने उसे उच्चता-प्राप्ति की अभिलाषा में हतोत्साह पाया ;

द्वितीय :  जब मैंने उसे अपंग के सामने लंगड़ाते पाया ;

तृतीय :   जब उसे सरल या कठिन का चुनाव करना था और उसने

                 सरल को चुना ;

चतुर्थ   :  जब उसने एक पाप किया और यह सोचकर संतोष कर लिया

               कि अन्य भी यह पाप करते हैं ;

पांचवीं बार :  जब कमज़ोरी के प्रति उसने धैर्य दिखाया और अपनी इस

                        धैर्यशीलता को शक्ति का प्रतीक बताया ;

छठी बार     :  जब उसने एक चेहरे की विद्रूपता पर घृणा की दृष्टि डाली

                        और यह न समझा कि यह उसी का एक रूप है ;

और सातवीं बार तब : जब उसने प्रशंसा का एक गीत गाया और इसे

                                        अपना ‘गुण’ व्यक्त किया ।

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खलील जिब्रान (१८८३-१९३१) : विश्वविख्यात लेखक,कवि,चित्रकार और दार्शनिक . सीरिया के माउंट लेबनान प्रांत में जन्म .  अरबी और अंग्रेज़ी में लेखन . ‘दि प्रोफ़ेट’ उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना मानी जाती है . बलिष्ठ कल्पना-शक्ति के कवि खलील जिब्रान गद्य-काव्य की एक नई शैली के उन्नायक थे . वे उस परम्परा के कवि थे जिससे सूफ़ी-संत-मनीषी और ज्ञानी जन आते हैं .

दो अनुभव

जुलाई 4, 2007

 

भवानी भाई की एक कविता

 

दो अनुभव

 

विच्छिन्न करता हूं

अपने को जब

दूसरों से

 

तो खिन्न करता हूं

अपने को और

दूसरों को

 

अभिन्न करता हूं

अपने को

जब दूसरों से

 

ऊसरों से तब जैसे

हरीतिमा फूटती है

 

घास की पत्ती-पत्ती से

चांदनी छूटती है !

 

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हिंदी की बीमारी,उसके झोला-छाप डॉक्टर और रघुवीर सहाय

जून 29, 2007

प्रियंकर 

हिंदी बीमार भाषा है कि नहीं, पता नहीं . पर यह बीमारों की भाषा ज़रूर है . पीलिया के मरीज को सारी दुनिया पीली दिखती है . यह अलग बात है कि  ठीक होते ही मरीज को  दुनिया अपने आप ठीक-ठाक लगने लगती है . साहिबानो! कविता-कहानी से दूर रहें . यह हिंदी और बाज़ार के बीच का आग का दरिया है . हिंदी और बाज़ार के बीच एक पुल बनाएं, बल्कि पुल बन जाएं . हिंदी और बाज़ार के बीच ऐसे परिकम्मा करें जैसे अपने घर से गोवर्धन धाम और करौलीवाली कैला मइया के दरबार तक करते आये हैं . अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें . हिंदी अपने आप स्वस्थ होने लगेगी . इधर सौ-दोसौ वेबसाइटों में हिंदी का संक्रमण हुआ नहीं कि उधर से नौकरियों की मूसलाधार वर्षा होने लगेगी . बाढ़ न आ जाए नौकरियों की तो कहना .

प्रियंकर

नवीन प्रौद्योगिकी के अश्व पर आरोहण आवश्यक है . पर उससे भी ज्यादा ज़रूरी है भाषा के पर्यावरण की रक्षा . भाषा का अपनी जड़ों से — अपनी अर्थ-परम्परा से –  जुड़ा रहना . आज हमारी भाषा पीली पड़ती जा रही है,छीजती जा रही है . भाषा की कोशिकाओं में जीवन रस कुछ सूख-सा चला है . चिकित्साविज्ञान की शब्दावली में कहूं तो हमारी भाषा की लाल रुधिर कणिकाएं मरती जा रही हैं . भाषा का हीमोग्लोबिन स्तर लगातार घट रहा है . भाषा का बोलियों से संबंध टूट रहा है और हिंदी ने अपनी बोलियों से पोषक रस पाना बंद कर दिया है .

न केवल हमने ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों से, विशेषकर विज्ञान और प्रौद्योगिकी संबंधी साहित्य से अपनी भाषा को समुचित समृद्ध नहीं किया बल्कि काफ़ी हद तक रचनात्मक साहित्य की भाषा को भी रस-गंधविहीन बना दिया . देशज मुहावरे  और व्यंजना  का ठाठ अब समाप्तप्राय है .

 

अविनाश

हिंदी एक बीमार भाषा है। क्‍योंकि इसका मुल्‍क बीमार है। अस्‍सी फीसदी नौजवान हाथ बेकार हैं। प्रोफेसर और दूसरे कमाने वालों को बैंक का ब्‍याज चुकाना है, वे ट्यूशन पढ़ा रहे हैं, कमाई का अतिरिक्‍त ज़रिया खोज रहे हैं। वे क्‍यों पढ़ेंगे किताब? आपकी किताब उन्‍हें दुष्‍चक्र से बाहर निकलने का रास्‍ता नहीं दिखा रही। आप किताबों का मर्सिया गा रहे हैं, आपके मुल्‍क को तो ठीक-ठीक ये भी नहीं पता कि टेक्‍स्‍ट बुक और रामचरितमानस से बाहर भी किताब किसी चिड़‍िया का नाम है।

 

प्रियंकर

वे ट्यूशन न कर रहे होते तो कौन-सा रामचरितमानस रच रहे होते। भाई मेरे! वे ट्यूशन पढा रहे हैं, इसीलिए कुछ पेड़ कटने से बचे हुए हैं। कविता की नदी में गाद (सिल्ट) कुछ कम है और पानी अभी भी बह रहा है, भले ही थोड़ा मंथर गति से, तो इसीलिए कि कुछ ज्ञानी लोग कविता लिखने के बजाय ट्यूशन पढा रहे हैं। हम सबकी (और बैंकों की भी) भलाई इसी में है कि वे ट्यूशन पढाते रहें और किस्त समय पर जमा करते रहें। हिंदी भाषा का क्या है उसको तो गरीब-गुरबा बचा ही लेगा . बचा क्या लेगा . जब तक वह खुद बचा रहेगा, हिंदी भी बची रहेगी .

और जहां ज्ञान-गुमान खूब-खूब है, आर्थिक स्वास्थ्य समाज के चेहरे पर दमक रहा है और समृद्धि आठों पहर अठखेलियां कर रही है, वहां भाषा-साहित्य की दुर्दशा के क्या कारण हैं, जरा यह भी देखो-समझो और तब किसी नतीज़े पर पहुंचो।

 

प्रमोद सिंह

क्‍योंकि इस तथाकथिक साहित्‍य का अपने समाज से कोई जीवंत संवाद नहीं. यह संवाद ज़माने से टूटा व छूटा हुआ है. वह संवाद कैसे बने या उसके बनने में क्‍या रूकावटें हैं इसकी कोई बड़ी व्‍यापक चिंता हिन्‍दी की सार्वजनिकता में दिखती है? नहीं, चार किताब छपवाये व तीन पुरस्‍कार पाये साहित्यिकगण अपने-अपने लघु संसार में सुखी, कृतार्थ जीवन जीते रहते हैं! जो सुखी नहीं हैं, वे इन सवालों की चिंता में नहीं, पुरस्‍कार न पाने के दुख में दुखी हो रहे हैं. सपना भी समाज नहीं, आनेवाले वर्षों में पुरस्‍कार पाकर धन्‍य हो लेने की वह अकुलाहट ही है.

 

प्रियंकर

‘हिंदी दुर्दशा देखी न जाई’  के हताश करनेवाले हाहाकार और ‘कुछ बात है कि हिंदी मिटती नहीं हमारी’  की विलक्षण आत्ममुग्धता के दो अतिवादी शिविरों में बंटे बुद्धिजीवियों को समान संदेह से देखते, अंग्रेज़ी न जाननेवाले विशाल भारतीय समाज को भी इधर एक मिलावटी भाषा ‘हिंग्रेज़ी’ में उच्चताबोध का छायाभास होने लगा है .यह घालमेल सरसों में सत्यानासी के बीज (आर्जीमोन)  की मिलावट से भी अधिक घातक है .

यथार्थ आकलन और आत्मविश्लेषण के मध्यम मार्ग की जितनी आवश्यकता आज है पहले कभी नहीं थी .जड़ें सूख रही हैं और हम पत्तों को पानी देकर प्रसन्न हैं . अंग्रेज़ी के गढ़ लंदन और न्यूयॉर्क में विश्व हिंदी सम्मेलन हो रहे हैं और देश के भीतर प्राथमिक शिक्षा का माध्यम उत्तरोत्तर अंग्रेज़ी होता जा रहा है . जब तक सच्चे और ईमानदार प्रयास नहीं होंगे, हिंदी के नाम पर प्रतीकवादी कर्मकांड चलता रहेगा और उससे उपजे ताने-तिसने भी जारी रहेंगे .

 

प्रमोद सिंह

 बड़ी मुश्किल है बेगूसराय, मुंगेर, बनारस, बरकाकाना है हिंदी की दिल्‍ली नहीं है. दिल्‍ली की हिंदी का दिनमान, हिंदुस्‍तान, धर्मयुग नहीं है. चालीस प्रकाशक हैं उनका धंधा है. चार सौ कवि-पत्रकार हैं उनका चंदा है. हंस का पोखर और समयांतर का लोटा है. पटना के मंच से युगपुरुष कहकर सम्‍मानित हुए उनका कद भी बहुतै छोटा है.

हिंदी की छपाई में पंचांग और कलेंडर हैं वर्ल्‍ड मैप नहीं है. वर्ल्‍ड मैप का ठेका है जिसके खिलाफ़ शशिधर शास्‍त्री ने दो मंत्रालयों को लिखा है सात लुच्‍चों को तीन वर्षों से समझा रहे हैं. राष्‍ट्रहित का प्रश्‍न है, बच्‍चो, पाप चढ़ेगा. लाजपत नगर का लुच्‍चा थेथर है हंसकर पेट हिलाता है. गुटका खाता हिंदी अकेडमी की गाता है. अराइव्‍ड फ्रॉम रांची हेडिंग फॉर मॉरीशस का लुच्‍चा शालीन है शास्‍त्री जी को चार रुपये वाली चाय पिलाकर समझाता है क्‍या चिट्टी-पत्री में लगे हो, मास्‍टर. भाग-दौड़ की नहीं अब आपकी घर बैठने की उम्र है. फालतू के झमेलों में देह और दिल जला रहे हो. आराम करो मुन्‍ना भाई की वीसीडी देखो. साहित्‍य-फाहित्‍य का रहने दो यहां लौंडे हैं संभालेंगे.

बेटा बेरोज़गार है और शास्‍त्री जी समझते हैं. मंत्रालय की सीढियों पर गिरकर प्राण गंवाना नहीं चाहते. वैसे भी पिछले दिनों से हिंदी की कम जवान बेटी की चिंता ज्‍यादा है. उद्वेग, उत्‍कंठा, आकांक्षा, साधना थी मगर अब उसका आधे से भी आधा है.

इतनी भागाभागी में किसको संस्‍कार की पड़ी है. शिक्षा में टुच्‍चई समाज में गुंडई है. पुरानी स्‍मृतियों के ताप की अगरबत्‍ती जलाकर कितनी और कब तक बदबू हटायेंगे. फिर अगरबत्‍ती महंगी है ज़मीन का भाव चढ़ रहा है और नई बीमारियां बढ़ रही हैं.

हिंदी की रेट लिस्‍ट का नया सर्कुलर आया है. नई दूकानों की लाइसेंसिंग हुई है. खुली है एक देहरादून में दूसरी दूकान बरेली में. मुन्‍ना भाई और मुलायम हैं हिंदी के माखनलाल और प्रशस्‍त राजमार्ग कहां है. सत्‍ता अंग्रेजी की ही नली से निकलती है. हिंदी पियराये कागज़ की नाव है संकरी नाली में बह रही है.

(पुनश्‍च: अंतरजाल में भी वही हाल है. सात छंद और सत्रह सेवैया है उससे बाद का बाहरी गवैया है. लोग आंगन में भंटा छत पर भतुआ फैला रहे हैं. तरकारी को बघार और घर-दुआर बुहार रहे हैं. कहते हैं इसी में सुख है. हिंदी का यही लुक है.)

 

ज्ञानदत्त पांडेय

हिन्दी है ही दुरुह! इसमें बकरी की लेंड़ी गिनने का मॉर्डन मेथमेटिक्स है. इसमें पंत पर कविता है. इसमें लम्बे-लम्बे खर्रों वाला नया ज्ञानोदय है. बड़े-बड़े नाम और किताबों की नेम ड्रापिंग है. पर इसमें नौकरी नहीं है!

लेकिन मेरा मानना है कि हिन्दी साहित्य के नाम पर दण्ड-बैठक लगाने वाले कहीं और लगायें तो हिन्दी रिवाइटल खिला कर तन्दुरुस्त की जा सकती है. अगर 100-200 बढ़िया वेब साइटें हिन्दी समझ में आने वाली हिन्दी (बकरी की लेंड़ी वाली नही) में बन जायें तो आगे बहुत से हाई-टेक जॉब हिन्दी में क्रियेट होने लगेंगे. इस हो रही जूतमपैजार के बावजूद मुझे पूरा यकीन है कि मेरी जिन्दगी में हिन्दी बाजार की भाषा (और आगे बाजार ही नौकरी देगा) बन कर उभरेगी.

नागार्जुन जी की तर्ज में कहें तो साहित्य-फाहित्य की ऐसी की तैसी. 

 

प्रियंकर

हिंदी में सब कुछ है पर नौकरी नहीं है . इधर हिंदी में नौकरी का जुगाड़ हुआ नहीं उधर  हिंदी तुरतै खजैले कुत्ते से    ‘लैप डॉग’ की श्रेणी में पदोन्नत हो  जाएगी . मदमाती चाल से चलता हुआ हाथी भी हो सकती है हमारी हिंदी . बाज़ार वह पारस है जिसको छूते ही हमारी हिंदी सोना हो जाएगी . साहित्य-फाहित्य से हटकर जैसे ही हिंदी बाज़ार से जुड़ेगी उसके झाड़ से सुनहरे-रूपहले खनखनाते सिक्के झड़ा करेंगे . अब यह अलग बात है कि अभी तक तो इस मुई महामंडी ने जिस भी चीज़ को छुआ उसे गुड़ से गोबर ही किया है . हमारी हिंदी क्या कु्छ  आलरेडी है वह तो रघुवीर बाबू मुद्दत हुए ‘हमारी हिंदी’  कविता में  बता गए हैं :

 

हमारी हिंदी एक दुहाजू की नई बीबी है

बहुत बोलने वाली बहुत खानेवाली बहुत सोनेवाली

 

गहने गढाते जाओ

सर पर चढाते जाओ

 

वह मुटाती जाये

पसीने से गन्धाती जाये घर का माल मैके पहुंचाती जाये

 

पड़ोसिनों से जले

कचरा फेंकने को लेकर लड़े

 

घर से तो खैर निकलने का सवाल ही नहीं उठता

औरतों को जो चाहिए घर ही में है

 

एक महाभारत है  एक रामायण है  तुलसीदास की भी राधेश्याम की भी

एक नागिन की स्टोरी बमय गाने

और एक खारी बावली में छपा कोकशास्त्र

एक खूसट महरिन है परपंच के लिए

एक अधेड़ खसम है जिसके प्राण अकच्छ किये जा सकें

एक गुचकुलिया-सा आंगन  कई कमरे कुठरिया एक के अंदर एक

बिस्तरों पर चीकट तकिये   कुरसियों पर गौंजे हुए उतारे कपड़े

फ़र्श पर ढंनगते गिलास

खूंटियों पर कुचैली चादरें जो कुएं पर ले जाकर फींची जाएंगी

 

घर में सबकुछ है जो औरतों को चाहिए

सीलन भी और अंदर की कोठरी में पांच सेर सोना भी

और संतान भी जिसका जिगर बढ गया है

जिसे वह मासिक पत्रिकाओं पर हगाया करती है

और ज़मीन भी जिस पर हिंदी भवन बनेगा

 

कहनेवाले चाहे कुछ कहें

हमारी हिंदी सुहागिन है  सती है  खुश है

उसकी साध यही है कि खसम से पहले मरे

और तो सब ठीक है पर पहले खसम उससे बचे

तब तो वह अपनी साध पूरी करे ।

(रघुवीर सहाय,1957)

 

प्रमोद सिंह

आप भी गजब करते हैं, मित्र! तीसरी दुनिया के देश में जहां प्राथमिक शिक्षा व स्‍वास्‍थ्‍य का सवाल अभी भी गड्ढे में गिरा हुआ है, आप बुद्धिजीवी पर कीचड़ उछाल रहे हैं. खुद एक पैर एनजीओ दूसरा कंपौंडरी तीसरा गांव की ज़मीन में धंसाये हमको बुद्धिजीवीपना सीखा रहे हैं. अब जो हैं सो हैं क्‍या कीजियेगा. कंप्‍यूटर के बाजू में अगरबत्‍ती जलाते हैं ज़रूरत लगने पर पूंजी की प्रशस्ति गाते हैं और बुड़बकों के बीच बुद्धिजीवी कहाते हैं.

हिंदी लेखक की ही तरह हिंदी ब्‍लॉगर भी अपने जैनरायन पुरस्‍कार और शील सम्‍मान की छतरी के नीचे गदगद रहता है.. बुकर क्‍यों नहीं मिला और नोबेल पर हमारा हक़ बने ऐसा साहित्‍य हम क्‍यों नहीं लिख पा रहे हैं- जैसी चिंताओं को पास फटकने देकर अपने जीवन के चिथड़े नहीं करता.. उसे उपनगर के किसी सम्‍मानजन एरिया में एमआईजी टाइप एक सम्‍मानजनक मकान, एक आल्‍टो या ज़ेन और एकाध प्रेमिका की संभावना दे दीजिए, देखिए, वह कितने मुग्‍धभाव से एक के बाद एक दनादन कविता ग्रंथ छापे जा रहा है!

हम छोटे-छोटे सुखों में सुखी हो जाने वाले, सिर्फ़ भूगोल के स्‍तर पर ही, एक बड़े राष्‍ट्र हैं. चंद मसाला डोसा, गोवा का सैर-सपाटा, डेढ़ हज़ार के दो जूते और खुशवंत सिंह के दो जोकबुक हमारे एक वित्‍तीय वर्ष को चरम-परम आनंद में भरे रख सकते हैं. पुरातत्‍व, इतिहास, कला, स्‍थापत्‍य, हाउसिंग, जल-संकट, शहरों का भविष्‍य यह सब कुछ भी हमें हमारे चाहे की दुनिया नहीं लगती.. इनकी बात उठते ही लगता है, सामनेवाला बौद्धिकता पेल रहा है.. लात से ऐसी बौद्धिकता को एक ओर ठेल.. हम अपनी बंटी और बबली टाइप चिरकुट चाहनाओं की आइसक्रीम चुभलाने लगते हैं..

यह हम हैं?.. या हमारा वैचारिक-सामाजिक भूगोल है?.. ज़रा खुद से पूछिएगा, दिन में कितनी दफ़े आप इस भूगोल को हिलाने-छेड़ने की कसरत करते हैं!

छोड़ि‍ए, हटाइए ये सब.. रघुवीर सहाय की ‘सीढ़ि‍यों पर धूप’ में से इन पंक्तियों का आनंद लीजिए. ये खास तौर पर प्रियंकर भाई के लिए हैं जो इन दिनों हमारे ज्ञानदान से उखड़े हुए हैं. तो, लीजिए, प्रियंकर भाई, अर्ज़ है:

दिन यदि चले गए वैभव के
तृष्‍णा के तो नहीं गए
साधन सुख के गए हमारे
रचना के तो नहीं गए.

 उपसंहार

 

 प्रमोद सिंह

बात निजी तकलीफनामे से खिंचकर फैल रही है.. बाकी का झोला हम कल खोलते हैं.. आप भी ज़रा कल तक अपनी हिंदी अपने दिमाग में गुनिए.. कि इस भाषाई चिंता का कोई सामूहिक स्‍वर बने..

 

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नियमावलियां

जून 28, 2007

 

बच्चन की एक कविता

 

नियमावलियां

 

ये संस्थाएं हैं

ये नियमावलियों में बंधकर ही जीती हैं

पर जीवन ?

नियमावलियों में बंधकर मरेगा नहीं

तो रोगी होगा ।

मैंने नियमों को तोड़ा है

मुझे जेल में डाल दो ,  दरोगा ।

जेल की सलाखें

नियमावलियों से मुलायम होंगी

इसे जानते हैं सब भुक्तभोगी ।

मैं उन्हें तोड़कर निकलूंगा

और तंदुरस्त , और निरोगी ।

 

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शक्ति से मद पैदा होता है

जून 27, 2007

 

भवानी भाई की एक कविता

 

शक्ति से मद

 

शक्ति से मद पैदा होता है

सो भी आदमकद पैदा होता है

 

और फिर गठित होती हैं

आदमकद मद की टोलियां

 

ढाली जाती हैं उनके हाथों से

तलवारें और गोलियां

 

तय होता है बड़प्पन

जातियों और देशों का

शस्त्रों के अंबार से ।

 

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( काव्य संकलन ‘परिवर्तन जिए’ से साभार )

गालियों का शिक्षाशास्त्र-2

जून 26, 2007

 हिंदी साहित्य गालियों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है . पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ से लेकर फ़णीश्वरनाथ रेणु, राही मासूम रज़ा,जगदम्बाप्रसाद दीक्षित,काशीनाथ सिंह,अब्दुल बिस्मिल्लाह आदि ने अपने साहित्य में गालियों का भरपूर प्रयोग किया है . शुचितावादियों के गुल-गपाड़े के बावजूद इन अत्यंत महत्वपूर्ण लेखकों का विश्वसनीय  पाठक-समुदाय रहा है .

पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की गर्म पकौड़ी पर तो उनकी शिकायत पं बनारसीदास चतुर्वेदी के माध्यम से गांधी जी तक पहुंची थी . चतुर्वेदी जी उग्र जी के साहित्य को घासलेटी साहित्य मानते थे . पर सौभाग्य से गांधी जी न केवल इस बात से सहमत नहीं हुए बल्कि उन्होंने अपने हाथ से उग्र जी के पक्ष में  लिख कर दिया .

 रेणु जी ने  भी आंचलिकता का जादू रचने में अपशब्दों से परहेज नहीं किया . तभी तो वे  मैला आंचल के बारे में लिखते हैं कि ‘इसमें धूल भी है और शूल भी . सुगंध भी है और दुर्गंध भी’ . उन्होंने किसी से भी अपना दामन नहीं बचाया है . रेणु की कहानियों को लें तो ‘नैना जोगन’ की रतनी बहुत भद्दी और अश्लील गालियां बकती है . पर उसके पीछे का मनोविज्ञान समझते ही वे गालियां हमें अश्लील नहीं लगतीं . रेणु जी ने ठीक ही लिखा है कि ” कोई जादू जानती है सचमुच रतनी! कोई शब्द उसके मुंह में अश्लील नहीं लगता।” जबकि इसके उलट ‘एक आदिम रात्रि की महक ‘  में घोष बाबू की गालियां सुनकर करमा का खून खौलने लगता है .

‘लाल पान की बेगम’ में बिरजू का पिता बैलों को भद्दी-भद्दी गालियां देता है पर गांव की पतोहुओं को देख उसे अपने खेत की झुकी हुई बालियां याद हो आती हैं . यह है दृष्टि की पवित्रता . ‘तीसरी कसम’ में यह गालियां देने वाला ग्राम-समाज किस तरह कंपनी की पतुरिया में अपनी सिया-सुकुमारी खोज लेता है यह गालियों की ऊपरी दृश्य सतह के परे जाकर उस पवित्र मन-मानस की अन्तःपरतों को सहानुभूति से समझने पर ही जान सकिएगा .

राही मासूम रज़ा का ‘आधा गांव’ गालियों के कारण बहुत चर्चा में रहा . हटाए जाने के पहले यह दो विश्वविद्यालयों (जोधपुर और मराठवाड़ा) के पाठ्यक्रम में भी रहा . इसका जवाब देते हुए राही मासूम रज़ा ने कहा था कि मेरे पात्र वही बोलेंगे जो वे आम ज़िंदगी में बोलते आये हैं . वे यदि गीता के श्लोक बोलेंगे तो मैं उनके मुंह से वह बुलवाऊंगा और यदि वे आम ज़िंदगी में गालियां देते हैं तो वे उपन्यास में भी  गालियां देते ही दिखेंगे  .

उन्होंने कहा कि ‘आधा गांव’ में बेशुमार गालियां हैं . पर यह उपन्यास जीवन की तरह पवित्र है . जबकि ‘टोपी शुक्ला’ में (उनका एक अन्य उपन्यास) एक भी गाली नहीं है. पर यह पूरा उपन्यास ही एक भद्दी गाली है जिसे मैं डंके की चोट बक रहा हूं .  निश्चय ही राही साहब की बात के मर्म को समझा जाना चाहिए  . गाली शब्द में नहीं नीयत में होती है .

अब्दुल बिस्मिल्लाह की ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ गरीब बुनकरों के जीवन-संघर्ष का अनूठा आख्यान है . निश्चित रूप से उसमें उनकी बोली-बानी आएगी ही . अब अगर गालियां उनकी रोज़मर्रा की बात-चीत का अभिन्न हिस्सा हैं तो लेखक उनसे कैसे बचेगा . और बचने पर वह क्या उस ‘लोकैल’ को हूबहू रच सकेगा . नागर जी जैसे समर्थ लेखक ने उक्त उपन्यास में अब्दुल बिस्मिल्लाह के गालियों के प्रयोग को जायज़ और स्वाभाविक ठहराया है .

आधा गांव में एक छोटे ज़मींदार हैं फ़ुन्नन मियां .  खूब गालियां देने वाले अनपढ और खांटी आदमी . बात के पक्के आला दर्ज़े के आदमी और जबर्दस्त लठैत . देश विभाजन और पाकिस्तान के पक्ष में पढे-लिखे लोगों की दलीलों का अपनी अतुलनीय गाली-गलौज़ से भरी शैली में वे जो प्रत्यख्यान रचते हैं वैसा अन्यत्र दुर्लभ है .

तो साहिबानो! गाली शब्द में नहीं नीयत में होती है . गाली का एक वर्ग-चरित्र होता है . जैसे संजय को दी गई राहुल की गाली से उसका वर्ग-चरित्र पकड़ में आता है . राहुल एक खाते-पीते उच्च-मध्यवर्गीय परिवार का लड़का दिखता है . जिसने उस तरह की तकलीफ़ें नहीं देखीं-भोगीं जैसी तकलीफ़ें रोज़ी-रोटी के लिए लड़ते लाखों निम्न और निम्न-मध्यवर्ग के लड़के भोगते हैं . और इस व्यवस्था के लिए तीखी और मौलिक गालियां ईज़ाद करते हैं .राहुल इसीलिए गालियों की दृष्टि से फ़िसड्डी है .तभी तो नशे में भी उसे ‘गंदा नैपकिन’ जैसी कमज़ोर किस्म की गाली सूझी . यह भी कोई गाली हुई भला .

हम जिस वर्ग के आदमी हैं उसमें तो हम या हम जैसे अन्य लोग हाथ गंदे होने पर गांव में रहने पर राख या पड़ुआ माटी से और कस्बे-शहर में रहने पर हद-से-हद कार्बोलिक एसिड वाले लाल लाइफ़बॉय से अपने हाथ धो लेते हैं . बहुत हुआ तो शहर का नया हैल्थ-कांशस उपभोक्ता वर्ग डेटॉल साबुन का इस्तेमाल कर लेता है .

कभी-कभी पार्टी आदि में नैपकिन व्यवहार करने के बावज़ूद यह नैपकिन वाला वर्ग और है . फ़ाइव स्टार कल्चर की नकल में बनता हुआ वर्ग . उससे हमारा थोड़ा-बहुत साबका है . जब कभी हम अपने मध्यवर्गीय परिवेश की हदें पार कर उस वर्ग के बीच उठते-बैठते हैं तो हमारा सम्पर्क इस वर्ग और उसके चरित्र से होता है . पर अन्ततः यह पक्का है कि यह  हमारा वर्ग नहीं है . यह नैपकिन वाली गाली इसी यूज़ एण्ड थ्रो कल्चर से उपजी गाली है . भगवान जाने गाली है भी या नहीं .

गाली रचने के लिए भी बहुत रचनात्मकता चाहिए होती है ,जिसकी संभावना मुझे राहुल में उसकी भाषा-शैली को देखते हुए कम ही दिखती है . राहुल की धर्मनिरपेक्षता पर मुझे कोई शक नहीं है,पर उसकी गाली देने की क्षमता अत्यंत संदिग्ध है . उसे इस दिशा में अभी और मेहनत करनी होगी . 

गालियों का शिक्षाशास्त्र

जून 18, 2007

वरिष्ठ ब्लॉगर, मित्र और अफ़सर  ( अथवा अफ़सर और मित्र ; यह पदक्रम या हायरार्की , उनसे रू-ब-रू प्रथम साक्षात्कार के पश्चात तय की जाएगी ), और उससे भी ऊपर ओपन-एंडेड प्रसन्न गद्य के अनूठे लिखवैया अपने ज्ञान जी, एक बार  जब सब गाड़ियां ठीक-ठाक ‘रन’ कर रहीं थी, वीआईपीऔं का आवागमन कम था , गूजर आंदोलन की कोई सूंघ भी नहीं थी और घर की भवानी का मूड भी चकाचक था, ऐसे में जीवन के हंसी-खुशी और भावुकता से भरे अवकाश के कमज़ोर क्षणों में वे एक सामान्य ब्लॉगर की टिप्पणियों पर परम-प्रसन्न होते भए और उससे अपनी कलम बदलने की कृपापूर्ण और याचनापूर्ण घोषणा एकसाथ करते भये कि वह अपनी कलम उस ब्लागरिए से बदलेंगे .

ब्लॉगरिए को भला क्या ऐतराज़ था . उसकी दुअन्नी की कलम में कौन-से लाल लटक रहे थे .  बदले में उसे कम से कम एक अदद पार्कर पेन की सॉलिड उम्मीद थी . वह मानकर चल रहा था कि यह ज्ञानदत्त नामक अफ़सर कितना भी ईमानदार और बुड़बक टाइप होगा पर इतना गिरा हुआ न होगा कि ट्रेन कंट्रोलर, ड्राइवरों और गार्डों से पेन भी उपहार में  न लेता हो . सो निश्चिंत होकर वह मुदित-मन इस प्रॉफ़िटेबल डील पर विचार करने लगा .

पर जैसा कि होता है, ऐन मौके पर मक्खी छींक गई और उसे बेटैम का ईमानदारी का दौरा पड़ गया . अब तक उसे अस्थमा का दौरा ही हलकान किये था, इस नये दौरे ने तो जैसे उसके इस सुंदर सपने की  वाट ही  लगा दी . उसने ज्ञान जी को साफ़-साफ़ बताया कि वे अंधेरे में हैं . और हलफ़नामा देकर ज्ञान जी को आगाह किया कि आसामी के चरित्र और पूर्ववृत्त का सत्यापन किए बिना ऐसा ऑफ़र देने की गलती न किया करें . यह देश चोर-उचक्कों और बेईमानों से भरा पड़ा है. यहां हर एक अदद प्रियंकर के भीतर एक चौपटस्वामी छुपा हुआ है . ईमानदारी के उस उग्र दौरे में ज्ञान जी के ऑफ़र को स्वीकार करते हुए भी उसने उन्हें डील के ऐन पहले अपनी दूसरी पहचान और अपने मारक-सुधारक टाइप गद्य के बारे में लिख भेजा . इस आत्मस्वीकारोक्ति के साथ कि ” पहले बता देता हूं कि आप घाटे में रहेंगे . मेरे बारे में सबकी धारणा वैसी नहीं है जैसी आप रखते हैं . “

पर क्या किया जाए . बुरा वक्त कोई कह कर थोड़े ही आता है . जब बुरा समय आता है तो सर्विस रूल्स का पाठ सुंदर काण्ड की तरह करने वाला अफ़सर भी  ऐसी गलती कर जाता है . उल्टे अपने प्रत्युत्तर में ‘द ग्रेट अफ़सर’ यह और कहते भये  कि  इस कथित ब्लॉगरिए की टिप्पणियां उनकी स्वयं की पोस्टों से ज्यादा अच्छी हैं . ब्लॉगरिया बिना अपनी औकात बूझे प्रशंसा के हिंडोले में झूल रहा था . इधर इस तारीफ़ का प्रेषण-संप्रेषण हुआ . उधर गरब-गुमान में लिथड़े ब्लॉगरिये ने अपनी अज़ीब-ओ-गरीब लेखन-हरकतें और तेज कर दी .

 सो भाइयो और बहनो!

आज का यह लेख ‘गालियों का शिक्षा शास्त्र’ इन्हीं ज्ञान जी के उकसावे का विस्फ़ोट-प्रस्फ़ोट है . चौपटस्वामी का एहमा कौनौ दोष नाहीं है . अच्छा लगे तो तारीफ़ सीधे कलकत्ते के पते पर भेजिएगा . और जो जियरा में क्रोध की लपटें उठने लगें तो खाद-पानी इतना ही दीजिएगा के लपटें इलाहाबाद में गंगा तट तक जाकर रुक जाए . राहुल-टाहुल से भी ई पोस्ट का कौनो किसम का सम्बंध नाहीं है .टैम बहुतै खराब चल रहा है . नारद का जासूस ठिकाने-ठिकाने फ़ैला हुआ है .हमरा ‘कम्पलिन’ भी हो सकता है . सो सज्जनो! सतर्कता बरतने में ही भलाई है . भूमिका जरा लंबा गई है, सो माफ़ी मांगते हुए मुद्दे पर आता हूं .

 ज्ञान जी ने राहुल पर नारद के ‘प्यूनटिव एक्शन’ का समर्थन किया है . अफ़सर और अनुशासन का निकट का संबंध होता है . हर सफ़ल अफ़सर ‘अथॉरिटी’ और ‘कम्पैशन’ के द्वन्द्व में ‘अथॉरिटी’ को वरीयता देता है .सो कुर्सी पर बैठे  ‘अफ़सर’  की अनुशासन का समर्थन करती टिप्पणी पर आश्चर्य प्रकट करने का कोई कारण नहीं बनता है . आश्चर्य तब होता जब वे ऐसा न करते .

पर समस्या यह है कि मेरा परिचय एक रसिक ज्ञानदत्त पांडेय से और है . एक ऐसा मौजिया जीव जो मेरी तरह काशीनाथ सिंह का फ़ैन है . जो नेट के औघड़ साधु-समाज से ‘काशी का अस्सी’ खरीद कर पढने की ताकीद करता है . जो एक सच्चे जिज्ञासु की तरह यह प्रश्न कर सकता है कि क्या गाली बनारस की रोज़मर्रा की भाषा का अंग है ? और यह जानकर संतुष्ट हो सकता है कि यह बनारस की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है . 

अतः इस मूरख-खल-कामी ब्लॉगरिये की बात की  प्रस्तावनास्वरूप रसिक अग्रज ज्ञान जी की एक टिप्पणी प्रस्तुत है :

“मित्रों, अच्छी भाषा आपको अच्छा मनई बनाती हो; यह कतई न तो नेसेसरी कण्डीशन है, न सफीशियेण्ट ही. आप अच्छी भाषा से अच्छे ब्लॉगर भले ही बन जायें!”

तो भाई लोगो!

हम जो भी उवाचूंगा, इसी टिप्पणी का आलोक-परकास में ही उवाचूंगा . आप लोग चाहे ओह! करें या आह! या वाह! . अंतिम की उम्मीद जरा कम है . पर उम्मीद पर दुनिया कायम है .

तो पंचो!

कुछ मुंह ऐसे होते हैं जिनसे निकली गालियां भी अश्लील नहीं लगती . और कुछ ऐसे होते हैं जिनका सामान्य सौजन्य भी अश्लीलता में आकंठ डूबा दिखता है . सो गालियों की अश्लीलता की कोई सपाट समीक्षा या शाश्वत किस्म की परिभाषा नहीं हो सकती . गाली के संदर्भगत व मनोसामाजिक आधार और उसके उद्देश्य को समझे बिना इस बारे में कोई भी टिप्पणी और कोई भी फ़ैसला बेमानी है .

 गालियों में जो जबर्दस्त ‘इमोशनल कंटेंट’ होता है उसकी सम्यक समझ और उसका विश्लेषण बहुत जरूरी है . गाली कई बार ताकतवर का विनोद होती है तो कई बार यह कमज़ोर और प्रताड़ित के खारे आंसुओं की सहचरी . वह शोषित की असहायता के बोध से भी उपजती है . कई बार यह दो प्रेमियों और कुछ मित्रों की प्रेमपूर्ण चुहल होती है तो बहुत बार गाली उदासीन-सी बातचीत  का  निरर्थक तकियाकलाम मात्र होती है .

काशीनाथ सिंह ( जिनके लेखन का मैं मुरीद हूं ) और राहुल (जिनका लिखा मुझे अरुचिकर लगा) दोनों के बहाने सही, पर जब बात उठी है तो कहना चाहूंगा कि गालियों पर अकादमिक शोध होना चाहिए. ‘गालियों का उद्भव और विकास’, ‘गालियों का सामाजिक यथार्थ’, ‘गालियों का सांस्कृतिक महत्व’, ‘भविष्य की गालियां’ तथा ‘आधुनिक गालियों पर प्रौद्योगिकी का प्रभाव’ आदि विषय इस दृष्टि से उपयुक्त साबित होंगे. उसके बाद निश्चित रूप से एक ‘गालीकोश’ अथवा ‘बृहत गाली कोश’ तैयार करने की दिशा में भी सुधीजन सक्रिय होंगे .

 नारद के संचालक और नियामक और सलाहकार जो इधर अतिसक्रिय दिख रहे हैं, वे कृपया इस परियोजना के लिए आवश्यक नैतिक और तकनीकी सहयोग प्रदान करने की कृपा करें . यह अत्यंत  ऐतिहासिक महत्व का काम होगा . हम इतिहास बनाने की ओर चल तो पड़े ही हैं .

 निवेदक

चौपटस्वामी

साथियों के विचारार्थ सुभाषितानि

जून 16, 2007

-१- 

दूरस्थोपि न दूरस्थः यो यस्य मनसि स्थितः ।

यो यस्य हृदये नास्ति    समीपस्थोपि    दूरतः ॥

                                                            —  चाणक्य 

( जो जिसके चित्त में बसता है वह उससे दूर होते हुए भी दूर नहीं रहता — निकट ही जान पड़ता है। इसके विपरीत, जो जिसके चित्त में नहीं रहता वह समीप होते हुए भी दूर ही जान पड़ता है।)

 

-२-

कुर्वन्नपि व्यलीकानि यः प्रिय: प्रिय एव सः ।

अनेकदोषदुष्टोपि   कायः   कस्य न    वल्लभः ॥

 

(जो प्रिय है वह कितने भी अपराध करे,तो भी प्रिय ही बना रहता है। अनेक दोषों से दूषित होने पर भी अपना शरीर किसको प्रिय नहीं लगता ।)

 

-३-

द्वेष्यो न   साधुर्भवति     मेधावी न    पंडितः ।

प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेष्ये पापानि चैव हि॥

—  महाभारत

(जिस व्यक्ति से द्वेष हो जाता है वह न साधु जान पड़ता है,न विद्वान और न बुद्धिमान । जिससे प्रेम होता है उसके सभी कार्य शुभ और शत्रु के सभी कार्य अशुभ प्रतीत होते हैं ।)

 

-४-

अन्यमुखे दुर्वादः स्वप्रियवदने तदेव परिहासः ।

इतरेन्धजन्मा      यो धूमः    सोगुरुभवो     धूपः ॥

  —  शुक्र

( जो बात दूसरों के मुख से निंदा या गाली समझी जाती है,वही अपने प्रियजन के मुख से कही जाने पर हंसी-मज़ाक जान पड़ती है।साधारण लकड़ियों का धुआं धुआं ही माना जाता है,लेकिन वही जब अगर की लकड़ी से निकलता है धूप समझा जाता है ।)

 

 

और समापन महागुरु कबीर की बात के साथ  जो साधु-समाज से बार-बार कहते रहते थे कि ‘बिना प्रीति का मानवा कहीं ठौर ना पावै’ और यह भी कि ‘जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान’ . सो  समापन उनके एक दोहे के साथ :

सोना , सज्जन , साधुजन ,  टूटि जुटैं सौ बार ।

दुर्जन , कुम्भ , कुम्हार का ,   एकै धका दरार ॥

 

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