भविष्य के परिवार बकलम टॉफ़लर – 1

नवम्बर 8, 2007

 नवीनता का ज्वार अपने समूचे वेग से विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों से कारखानों और कार्यालयों तक, बाजार और जन-संचार माध्यमों से हमारे सामाजिक सम्बंधों तक, समुदाय से घरों तक आ पहुंचा है । हमारी निजी जिन्दगी में अपनी गहरी पैठ बनाते हुए यह परिवार नामक इकाई पर अभूतपूर्व असर डालेगा ।

 परिवार को समाज का असाधारण ‘शॉक अब्सॉर्बर’ कहा गया है — ऐसा स्थान जहां संसार से अपने संघर्ष के पश्चात लुटे-पिटे और खरोंच खाये व्यक्ति शरण के लिये लौटते हैं । ऐसा स्थान जो निरंतर अस्थिरता से भरे वातावरण में एक स्थिर बिन्दु है । जैसे-जैसे अति औद्योगिक क्रांति घटित हो रही है, यह     ‘शॉक अब्सॉर्बर’  स्वयं आघातों की चपेट में है ।

 सामाजिक समालोचक उत्तेजित होकर परिवार के भविष्य के बारे में अटकलें लगा रहे हैं । ‘द कमिंग वर्ल्ड ट्रान्सफ़ॉर्मेशन’   के लेखक फर्डीनेंड लुंडबर्ग   कहते हैं कि   परिवार   ‘सम्पूर्ण विलोपन के कगार   पर’  है । मनोविश्लेषक विलियम वुल्फ के अनुसार “बच्चे के पालन-पोषण के पहले या दूसरे साल को छोड़ दें तो परिवार समाप्त हो चुका है ।’ निराशावादी यह तो कहते रहते हैं कि परिवार विलुप्त होने  की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं पर यह नहीं बताते कि परिवार का स्थान कौन-सी इकाई लेगी ।
 
 इसके विपरीत परिवार के प्रति आशावादी यह विश्वास व्यक्त करते हैं कि परिवार चूंकि हमेशा रहा है, अत: हमेशा रहेगा । कुछ तो यहां तक कहते हैं कि परिवार का स्वर्ण युग आने वाला है । वे इस सिद्धांत के पक्षधर हैं कि जैसे-जैसे अवकाश के क्षण बढ़ेंगे, परिवार अधिकाधिक समय साथ बिताएंगे और सहभागी गतिविधियों में अधिकाधिक संतुष्टि प्राप्त करेंगे ।

 अधिक सयाना दृष्टिकोण यह है कि कल की उथल-पुथल और अनिश्चितता ही लोगों को परिवार से और गहरे जुड़ाव के लिए बाध्य करेगी । अल्बर्ट आइन्सटाइन कॉलेज ऑव मेडिसिन में मनोचिकित्सा के प्रोफेसर डॉ. इर्विन एम. ग्रीनबर्ग कहते हैं, ‘लोग टिकाऊ ढांचे के लिए विवाह करेंगे।’ इस दृष्टिकोण के अनुसार परिवार परिवर्तन के तूफान  में  लंगर की भांति व्यक्ति की ‘पोर्टेबल रूट्स’ — वहनीय जड़ों– के रूप में काम करता है। लब्बोलुआब यह कि जितना अधिक क्षणभंगुर और नवीन वातावरण होगा परिवार का महत्व उतना अधिक बढता जाएगा ।

 हो सकता है इस वाद-विवाद के दोनों पक्षकार गलत साबित हों । क्योंकि भविष्य जितना दिखता है उससे अधिक खुला है । परिवार न तो गायब होंगे और न ही स्वर्णिम युग में प्रवेश करेंगे । सम्भव है –और यही ज्यादा सम्भव लगता है — कि परिवार टूट जाएं, बिखर जाएं और फिर अजीबोगरीब और नए रूपों में पुन: गठित हों ।

आगे आने वाले दशकों में परिवार की मूल अवधारणा पर नई प्रजनन प्रौद्योगिकी का व्यापक प्रभाव पड़ेगा । अब ‘प्रोग्राम’ करके यह तय करना आसान हो जाएगा कि पैदा होने वाले बच्चे का लिंग क्या हो, उसमें कितनी बुद्धि या ‘आइ क्यू’ हो, उसका चेहरा-मोहरा कैसा हो या उसके व्यक्तित्व में कौन-कौन सी विशेषताएं हों । भ्रूण प्रतिरोपण, परखनली में विकसित बच्चे, एक गोली खाकर जुड़वा या तीन या उससे भी अधिक बच्चों के जन्म की गारंटी, बच्चों को जन्म देने के लिए ‘बेबीटोरियम’ में जाकर भ्रूण खरीदना आदि इतना सहज होगा कि अब भविष्य को देखने के लिए किसी समाजशास्त्री या परम्परागत दार्शनिक की नहीं, बल्कि कवि या चित्रकार की आंखों की आवश्यकता होगी ।

 विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, विशेषकर प्रजनन जैविकी में हुई प्रगति थोड़े ही समय में परिवार और उसके उत्तरदायित्वों के बारे में प्रचलित सभी परंपरागत विचारों को चकनाचूर करने में सक्षम है । जब बच्चे प्रयोगशाला के जार में उपजाए जा सकेंगे तब मातृत्व की धारणा का क्या होगा और समाज में स्त्रियों की ‘सेल्फ इमेज’ का क्या होगा । जिन्हें प्रारंभ से ही यह सिखाया जाता है कि उनका प्राथमिक कार्य मानवजाति का प्रजनन और उसका संवर्धन करना है ।

 अब तक बहुत कम समाजविज्ञानियों का ध्यान इस ओर गया है । मनोचिकित्सक वाइत्जेन के अनुसार, जन्म का चक्र “अधिकांश स्त्रियों में एक प्रमुख रचनात्मक जरूरत को पूरा करता है .. अधिकांश स्त्रियों को जन्म दे सकने की अपनी क्षमता पर गर्व होता है… गर्भवती स्त्री को महिमा-मंडित करता हुआ जो विशिष्ट प्रभामंडल है, उसका वर्णन बहुतायत से पूर्व व पश्चिम दोनों के कला व साहित्य में मिलता है ।”

 वाइत्जेन प्रश्न करते हैं कि मातृत्व के इस गौरव का क्या होगा जब स्त्री के बच्चे वस्तुत: उसके नहीं होंगे, बल्कि किसी अन्य स्त्री के आनुवंशिक रूप से ‘श्रेष्ठ’ डिम्ब से लेकर   उसके गर्भाशय में प्रतिरोपित किए गए   होंगे । यदि और कुछ नहीं तो हम मातृत्व के रहस्यानुभव का हनन करने वाले हैं ।
 न केवल मातृत्व, बल्कि पितृत्व की धारणा भी आमूलचूल परिवर्तित होगी, क्योंकि वह दिन दूर नहीं जब एक बच्चे के दो से अधिक जैविक माता-पिता होंगे ।

 जब एक महिला अपने गर्भाशय में ऐसे भ्रूण को धारण करेगी जिसे किसी अन्य महिला ने अपनी कोख में सिरजा हो, तो यह कहना मुश्किल हो जाएगा कि बच्चे की मां कौन है और पिता कौन है ?

 जब कोई दंपति भ्रूण खरीदेंगे, तब ‘पेरेंटहुड’ जैविक नहीं, कानूनी मुद्दा बन जाएगा । अगर इन कार्रवाइयों को कठोरता से नियन्त्रित नहीं किया गया तो यह बेतुकी और भोंडी कल्पना की जा सकती है कि एक दम्पति भ्रूण खरीद रहे हैं  और उसे परखनली में विकसित कर रहे हैं और फिर पहले भ्रूण के नाम पर दूसरा खरीद रहे हैं, मान लीजिये किसी ट्रस्ट फ़ंड के लिये । ऐसी स्थिति में उनके पहले बच्चे के बाल्यकाल में ही उन्हें वैध दादा या दादी का दर्जा मिल जायेगा । इस तरह की नातेदारी के सम्बंधों को बताने के लिये हमें एक पूर्णत: नई शब्दावली गढ़नी होगी ।

और यदि भ्रूण विक्रय के लिये उपलब्ध हो तो क्या कोई कॉरपोरेशन उन्हें खरीद सकेगी?  क्या वह दस हज़ार भ्रूण खरीद सकेगी? क्या वह उन्हें पुन: बेच सकेगी? यदि कोई कॉरपोरेशन नहीं तो क्या कोई गैर-व्यापारिक अनुसन्धान प्रयोगशाला ऐसा कर सकेगी? यदि हम जीवित भ्रूणों के क्रय-विक्रय लग जाएं तो क्या हम एक नये किस्म की गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं? जल्दी ही हमें ऐसे ही दुस्वप्नसदृश सवालों पर बहस करनी होगी।

 

क्रमशः …

दो सभ्यताओं का दुलारा बेटा

नवम्बर 5, 2007

 

 1911 — 2006

 

वे एक सांस्कृतिक प्रकाश-स्तम्भ थे……जिन्होंने अरबी साहित्य को विश्व मानचित्र पर प्रतिष्ठित किया . प्रबोधन और सहिष्णुता के मूल्य को अपने लेखन के माध्यम से  रूपायित किया .

नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले अरबी लेखक नज़ीब महफ़ूज़ मिस्र(इजिप्ट) की राजधानी काहिरा की पृष्ठभूमि पर लिखी अपनी उपन्यास-त्रयी ‘कायरो ट्रिलजी’  के अंग्रेज़ी अनुवाद के बाद ही अरबी साहित्य की दुनिया के बाहर चर्चा में आ पाए . उन्नीस सौ बावन में लिखे गये ये उपन्यास : पैलेस वॉक(बैनुल-कसरैन),पैलेस ऑव डिज़ायर(कसरुस्शौक) तथा सुगर स्ट्रीट(अस्सुकरिय) , उन्नीस सौ छप्पन और सत्तावन में छपे और नवें दशक में इनका अंग्रेज़ी अनुवाद सामने आया . ये उपन्यास  बीसवीं सदी के शुरुआती दौर के मिस्र के इतिहास में रची-बसी अल-सईद अब्द अल-जवाद  के संयुक्त परिवार कहानी है .इन उपन्यासों में एक मुस्लिम व्यवसायी परिवार का लेखा-जोखा तो है ही मिस्र के तत्कालीन सामाजिक-राजनैतिक जीवन पर भी प्रबोधनकारी व्याख्याएं और विमर्श देखने को मिलता है .  इन उपन्यासों के प्रकाशन के बाद-से ही उनकी तुलना चार्ल्स डिकेंस और दोस्तोवस्की जैसे महान उपन्यासकारों से की जाने लगी .

1959 में प्रकाशित पुस्तक औलादो हार्रतुना (चिल्ड्रेन ऑफ गेबेलावी) की वजह से महफ़ूज़ विवादों के घेरे में आ गए . एक अखबार में धारावाहिक रूप से प्रकाशित इस पुस्तक को इस्लामी कानून का उल्लंघन करने और धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में यह कह कर ‘बैन’ कर दिया गया कि इसमें अल्लाह और उनके प्रोफ़ेट के बारे में अनुपयुक्त अन्योक्तिपरक  कथाएं  हैं . बाद में यह उपन्यास लेबनान में प्रकाशित हुआ और इसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया गया .

उन्नीस सौ चौरानबे में एक धार्मिक उन्मादी ने छुरा मार कर महफ़ूज़ को बुरी तरह घायल कर दिया .  सात सप्ताह तक अस्पताल में उनका इलाज चला और गर्दन की नसों के कट जाने से उनकी देखने और सुनने की शक्ति कमजोर हो गई . इसके बावजूद  वे यथा-सामर्थ्य लिखते रहे .

गत वर्ष अगस्त माह की तीस तारीख को चौरानबे वर्ष की आयु में अल्सर की बीमारी से काहिरा में नजीब महफ़ूज़ का  इन्तकाल हो गया .

नजीब महफ़ूज़ ने न केवल अरबी भाषा को नया उन्मेष दिया,उसमें एक किस्म  के  भाषिक-नवाचार को प्रतिष्ठा दी, बल्कि यथार्थवाद, प्रतीकात्मकता और अन्य नए प्रयोगों द्वारा अरबी उपन्यास में आधुनिकता के तत्व को समाहित किया . उन्होंने नई पीढी के  लेखकों के लिए एक ऐसी राह तैयार की जिस पर चल कर अरबी उपन्यास विश्व-साहित्य में प्रतिष्ठापूर्ण स्थान  पा सका .

महफ़ूज़ के बारे में और अधिक जानने के लिए कृपया रवि रतलामी के ब्लॉग रचनाकार पर जाकर विजय शर्मा का यह बेहतरीन लेख पढें जो  ठट्ट की ठट्ट पोस्टों के अम्बार में दबा रह गया : 

http://rachanakar.blogspot.com/2007/04/blog-post_12.html

 

गत वर्ष  महफ़ूज़ का एक उपन्यास ‘मिडक एली’ पढने का मौका मिला था और उस उपन्यास को पढ कर मैं विस्मित रह गया था .  भारत के किसी पुराने शहर के गली-कूचों  और मिस्र की राजधानी काहिरा की गलियों में मुझे कोई अंतर दिखाई नहीं दिया . इस अर्थ में वे मुझे भारतीय अनुभवों  के बहुत नजदीक लगे .

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(बहुत-से लोगों ने तस्वीर पर कयास लगाया था . ज्ञान जी ही सत्य के कुछ नजदीक निकले जिन्होंने इसे किसी साहित्यकार का चित्र बताया था . बाकी सबको यह चित्र आई.के. गुजराल साहब का लग रहा था .)

यह किसकी तस्वीर है ?

अक्टूबर 31, 2007

यहां एक जाने-माने व्यक्तित्व की तस्वीर दी जा रही है । कृपया बताएं यह किसकी तस्वीर है :

 

परिचय के लिए प्रतीक्षा करें ।

 

बिलारहिं सिखवै मूसा

अक्टूबर 29, 2007

मूसा कहे बिलार सों……. 

 

मूसा कहे बिलार सों, सुन रे जूठ जुठैल ।

हम निकसत हैं सैर को, छांड़ि बैठ मेरी गैल

छांड़ि बैठ मेरी गैल, कचरि लातन सों जैहौ ।

तुम हौ निपट गरीब  कहा घर बैठे खैहौ ॥

 

कह गिरिधर कविराय, बात सुनियो रे हूसा ।

वाह दिनन  के फेर बिलारहिं सिखवै मूसा ॥

 

—   गिरिधर कविराय

 

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(आभासी जगत में कुंडलियों के बेताज बादशाह उड़नतश्तरी उर्फ़ समीर लाल से अनुरोध कि  इसे उनके इलाके/क्षेत्राधिकार में घुसपैठ का प्रयास न माना जाए )

 

हाथ-रिक्शा के लिए एक विदागीत

अगस्त 3, 2007

कोलकाता से हाथ-रिक्शा हटाने की अधिसूचना — कोलकाता हैकनी कैरिज बिल — जारी हो गई है . वे दौडते,घंटी बजाते रिक्शेवाले अब इतिहास की वस्तु हो जाएंगे . इतिहास में रुचि रखने वाले लोग बताते हैं कि रिक्शे चीन से आये . कुछ कहते हैं कि जापान से आए . पहले शिमला आए,फिर दार्जिलिंग और कोलकाता आए . मेरी चिंता यह है कि रिक्शा कहीं से भी आया हो, ये रिक्शेवाले कहां जाएंगे . क्या इन्हें बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया जाएगा . प्रश्न चूंकि पंद्रह-बीस हज़ार गरीब-गुरबा की ज़िंदगी से — उनकी आजीविका से — उनके पेट से जुड़ा है,इसलिए प्रश्न बहुत बड़ा है . पुनर्वास की अफ़वाहनुमा भंकस भी जोरों पर है . हम    पुनर्वास के गंभीर किस्म के प्रयासों के भी हश्र देख चुके हैं , यहां तो यह उड़ती-उड़ती खबर है .

देश के नये बनते मध्य और उच्च-मध्य वर्ग के लिए यह खबर नाकाबिल-ए-गौर है . वह तो मॉल-मल्टीप्लेक्स-एसईज़ेड के सुखद सपनों में खोया है . उसे  कल्पना  में रुपया और डॉलर उड़ता हुआ दिख रहा है . रात को सपने में नए-नए मेक की कारें आती हैं जिनमें वह अपने को किसी सुंदर स्त्री के साथ ‘लोंग ड्राइव’ पर जाता देखता है . भारत उसे सिंगापुर होता दिख रहा होता है . उसे यह सोचने  की फ़ुरसत ही  कहां है कि ये रिक्शेवाले अब क्या करेंगे, कहां जाएंगे . अरे जहां मन करे वहां जाएं . देखते नहीं आना-जाना कितना सुगम और सस्ता होता जा रहा है . ट्रेन के किराये में प्लेन आपको ले जाने को तैयार  है .

यह अगस्त का महीना है . देशभक्ति के इस मौसम में हमें थोड़ा इतिहास में लौटना चाहिए . हम १९४७ में आज़ाद हुए . नेहरू ने इसे ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ — ‘नियति से मिलन का दिन’ — कहा . कवियों ने प्रफुल्लित स्वर में गाया :

“आज देश में नई भोर है

 नई भोर का समारोह है”

पर जैसा कि होता है, समारोह जल्दी समाप्त हो गया और कठोर यथार्थ ने हमारे सुखद सपनों की अग्नि-परीक्षा लेनी शुरु कर दी . १९५० में हमने अपना संविधान अधिनियमित और अंगीकृत किया . पहले हम लोकतांत्रिक समाजवादी सम्प्रभु गणराज्य कहाये . फिर जल्दी ही हमने इस असुविधाजनक ‘समाजवादी’ शब्द को निकाल फेंका और मिश्रित अर्थव्यस्था की ओर चलते-बढते रहे . और अब तो यह आवारा ग्लोबल पूंजी के नंगे नाच का विकराल समय है जिसे भूमंडलीकरण,उदारीकरण और न जाने किस-किस नाम से पुकारा जा रहा  है . ऐसे समय में इन रिक्शाचालकों के बारे में बात करना एक तरह की मूर्खता ही कही जाएगी . पर इधर होशियारों की होशियारी देखते हुए इस देश को कुछ मूर्खों की नितान्त आवश्यकता प्रतीत होती है .

लगभग दो दशक पहले देश के एक अनुभवहीन युवा प्रधानमंत्री ने कोलकाता को ‘डाइंग सिटी’ — मरता हुआ शहर — कहा था . एक हिंसक दुखद त्रासद आतंकवादी हमले में हमारे वे प्रधानमंत्री मारे गये पर यह शहर कोलकाता नहीं मरा . टूटते-बिखरते आधारभूत ढांचे के बावज़ूद यह शहर नहीं मरा तो सिर्फ़ इसलिए कि इसकी आत्मा जीवित-जाग्रत थी . आत्मा का ताप बचा और बना हुआ था .

पर इधर स्थितियां तेजी से बदली हैं . हम कोलकातावासी अन्य महानगरों की तुलना में कोलकाता को लेकर और कोलकाता में अपने को लेकर कुछ शर्मिंदा से हैं . पारम्परिक संस्कृतिबोध की जगह एक नये अर्थबोध ने ले ली है . और यह नया ‘अर्थ’ उर्फ़ ‘टाका’बोध एक नए तरह  का — अभिजात्य किस्म का सौन्दर्यबोध — इलीट ऐस्थेटिक्स — पैदा कर रहा है जिसमें इन रिक्शेवालों की कोई जगह नहीं बनती .हम कोलकाता को भारत की सांस्कृतिक राजधानी के स्थान पर एक ‘डिज़ाइनर सिटी’ बनाना चाहते हैं जहां ‘इन्वेस्टर’ आए तो उसकी आंखें धंस कर रह जाएं और वह फ़ंस कर ही जाए .

राज्य की भूमिका के बारे में जितना कम बोला जाए उतना अच्छा .  शहर से खटाल हटा  दिये जाते हैं ताकि अकर्मण्यता,अक्षमता और अपव्यय की वजह से खस्ताहाल सरकारी डेअरियों का दूध खप सके . रिलाएंस फ़्रेश को प्रश्रय  दिया जाता है ताकि ये ठेली-थड़ी-खोमचे वाले ऐसे गायब हो जाएं जैसे कभी इस पृथ्वी पर थे ही नहीं . खुदरा व्यापार के इलाके में वाल्मार्ट और मोटे धन्नासेठों के लिए पलकें बिछाईं जाती हैं  बिना इस बात की चिंता किये कि कैसे हमारे पड़ोस के परचूनी दूकानदारों का धंधा ठप्प हो जाएगा और एक बड़ी ‘सप्लाई चेन’ — एक कारगर वितरण व्यवस्था — हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी . किसानों को हटा दिया जाता  है ताकि वहां लम्बी-लम्बी जीभ लपलपाते देश के  उच्च-मध्यवर्गीय उपभोक्ता के लिए नई-नई कारें बन सकें . और चूंकि कोलकाता के संकरे जनसंकुल रास्तों पर इन कारों के दौड़ने के लिए जगह बनानी है, इसलिए कारों की पहली खेप आने के पहले इन रिक्शेवालों का जाना तो तय था . इस योजना-चक्र या चक्रांत को समझे बिना इस निर्णय को सही-सही नहीं समझा जा सकता  .

कुछ लोग  इन रिक्शावालों को  इस आधार पर भी हटाने के पक्षधर है कि यह अमानवीय है ,ऐसे मानवीय लोगों को अक्सर आठ आने या एक रुपये के लिए इन रिक्शावालों से हुज्जत करते देखा गया है . कुछ आधुनिक लोग शहर की साफ़-सफ़ाई के मद्देनज़र उन्हें हटा देने के पक्षधर हैं .मुझे उदयप्रकाश की कविता का वह सफ़ाईपसंद हत्यारा याद आता है जो सफ़ाई को लेकर बेहद संजीदा  था .

आज के उन्सठ साल पहले एक सिरफिरे ने महात्मा गांधी को गोली मार दी थी . पर गांधी मरे नहीं . और मरे इसलिए नहीं क्योंकि गांधी व्यक्ति नहीं एक विचार थे . हटाने वाले निश्चिंत रहें . ये रिक्शेवाले भी नहीं मरेंगे . मरेंगे इसलिए नहीं क्योंकि वे कोलकाता के सौ वर्ष के इतिहास का हिस्सा हैं . उसके ऐतीज्य का अभिन्न अंग . इस शहर की श्रम-संस्कृति का बेहद मानवीय पक्ष .

वे रहेंगे — कोलकाता के पुराने बाशिन्दों  की स्मृति में किसी आत्मीय अपने की तरह रहेंगे . जल-निकास की आधी-अधूरी व्यवस्था से जूझते इस शहर में भारी बारिश के दिनों में जब कोई भी कार, कोई भी टैक्सी, कोई भी वाहन आपको जरा-सी भी दूरी  पार कराने को तैयार नहीं होगा , तब  कमर तक पानी में —  मात्र पांच-दस रुपये में आपको इधर से उधर लाते-ले जाते हुए ये रिक्शेवाले आपकी स्मृतियों में ऊभ-चूभ होंगे . पर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी .

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संकर भाषा के जन्म पर सोहर उर्फ़ डोंट टच माइ गगरिया मोहन रसिया – (सम्पूर्ण)

अगस्त 2, 2007

पमन्यु चटर्जी के अंग्रेज़ी उपन्यास इंग्लिश ऑगस्ट का नायक अगस्त्य सेन समकालीन भारत की ऐसी युवा पीढी का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी अंग्रेज़ी शिक्षा ने उसे अपने समाज और जीवन से काट कर अपने ही देश में अजनबी बना दिया है . अब कम-से-कम भाषा के स्तर पर यह दूरी पाटने की एक जोरदार मुहिम चल निकली है . हिंदी में अंग्रेज़ी की अनपेक्षित और अवांछनीय घालमेल से एक नए किस्म की संकर भाषा के जन्म पर विद्वज्जन बलिहारी हो रहे हैं . और ऐसा करते समय वे भाषाओं के मध्य अंतर्क्रिया,उदार ग्रहणशीलता, अनुकूलन और समंजन जैसे पदबंधों और संप्रत्ययों का भी बेहद होशियारी से हवाला देते चलते हैं .

हिंदी बोलते समय अंग्रेज़ी शब्दों का इस्तेमाल कोई नई घटना नहीं है . इसकी पृष्ठभूमि में है हमारा औपनिवेशिक अतीत . निस्संदेह यह हमारी मौखिक अभिव्यक्ति का हिस्सा रहा है . परंतु अब जब सांस्कृतिक प्रभुत्ववाद के भूमंडलीय अभियान के तहत इसे बाकायदा एक भाषा का दर्जा देकर महिमामंडित किया जा रहा हो और इसे नए युग की भाषा के रूप में प्रचारित किया जा रहा हो तो न केवल इस भाषा के स्वरूप-संरचना और प्रभाव पर  विचार करना ज़रूरी हो गया है वरन समूचे सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक  है .

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि तीसरी दुनिया सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध है . इसकी भाषा,साहित्य,संगीत,कला,वेशभूषा,खान-पान एवं स्थापत्य आदि की सांस्कृतिक समृद्धि और विविधता इसके नागरिकों की आवश्यकताओं,आकांक्षाओं और रचनात्मकता से विकसित हुई है . यह न केवल उनकी स्थानीय स्थितियों के लिए अनुकूल है बल्कि उनकी आधारभूत मानवीय आवश्यकताओं के लिए भी आवश्यक है .

संचार के साधनों पर कुंडली मारकर बैठी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कुदृष्टि इन देशों की भाषा,संस्कृति और जीवन पद्धति पर है . अतः बहुत ही आक्रामक ढंग से जीवनशैली को प्रभावित किया जा रहा है . परम्परागत सांस्कृतिक वैविध्य और सामुदायिक सहभागिता को नष्ट कर एक मानकीकृत उपभोक्ता संस्कृति लादी जा रही है जो मात्र तीसरी दुनिया के अभिजात्य वर्ग और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ही फ़ायदा पहुंचाएगी . 

न केवल एक एकरूप उपभोक्ता-उन्मुख बाज़ारू संस्कृति को लादने के सारे सरंजाम जुटा दिये गये हैं वरन समाज के एक बड़े वर्ग,विशेषकर युवाओं को परम्परागत मूल्यबोध से काटकर खतरनाक हद तक सांस्कृतिक बिलगाव पैदा कर दिया गया है . भाषा की अर्थ-परम्परा तथा उसकी अन्तर्वस्तु से अलगाव इसी सांस्कृतिक पार्थक्य की कार्यसूची का एक हिस्सा है . 

जातीय दुनिया का यह आत्मविसर्जन — यह लोप — खान-पान से लेकर भाषा के क्षेत्र तक फैल गया है . जीवन की पहली पाठशाला — घर — में न मिठाइयां बनती हैं, न भाषा . दोनों बाहर से आ रही हैं . जब भाषा घर और समाज में नहीं बनेगी तो बाज़ार में बनेगी . दुर्भाग्य से बन भी रही है .

इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों के चौंधियाने वाले रंगीन दृश्य-श्रव्य विज्ञापनों ने भाषा को बाज़ार में इस्तेमाल की चीज़ में बदल दिया है . हिंग्रेज़ी उर्फ़ लॉलीपॉप हिंदी  हिंदुस्तान के अपरिपक्व विज्ञापन जगत के हाथों का ऐसा ही एक खिलौना है  जिसे बाज़ार के लिए, बाज़ार के द्वारा, बाज़ार में गढा जा रहा है और उपग्रह टेलीविज़न के जरिये हिंदुस्तान के दूर-दराज़ के गांवों,ढाणियों और कस्बों में ‘नए आदमी’ की भाषा के रूप में — सामाजिक गतिशीलता की भाषा के रूप में — प्रचारित किया जा रहा है .

यह एक छद्म भाषा है जिसका एकमात्र उद्देश्य एक जीवंत भाषा को नज़रबंद करना है . 

 

इस बात से भला किसे इंकार हो सकता है कि ‘भाषा के क्षेत्र में शुद्धतावाद एक यूटोपियाई संकल्पना है .’ यह भी सही है कि भाषाएं आपसी अंतर्क्रिया और ग्रहणशीलता से ही समृद्ध होती हैं . यह एक सहज स्वाभाविक प्रक्रिया है . शब्द एक भाषा से दूसरी भाषा में बेरोकटोक आते-जाते हैं और अनायास ही भाषियों के भाषिक संस्कार का हिस्सा हो जाते हैं . परंतु यह कार्य किसी दबाव से या किसी कार्यसूची के तहत योजनाबद्ध रूप से नहीं किया जा सकता . ऐसे असफल प्रयासों के उदाहरण सामने हैं .

राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद ने ऐसा ही एक प्रयास किया था . आचार्य शुक्ल ने ठीक ही लक्षित किया है कि ‘राजा शिवप्रसाद खिचड़ी हिंदी का स्वप्न ही देखते रहे कि भारतेन्दु ने स्वच्छ हिंदी की शुभ्र छटा दिखाकर लोगों को चमत्कृत कर दिया .’ सहज स्वाभाविक रूप से दूसरी भाषाओं के जितने शब्द हिंदी में आएं उनका स्वागत है . वे वरेण्य हैं . पर उनका सायास आरोपण अन्ततः भाषा के स्वाभाविक  प्रवाह  को बाधित करना है .

भाषा के साथ खिलवाड़ के खिलाफ़ ऐसी ही एक चेतावनी हमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने दी थी . उन्होंने कहा :

“भाषा आत्मीयता का आधार होती है, वह मनुष्य की जैविक प्रवृत्ति से ज्यादा गहरी चीज़ होती है . … भाषा नाम की जो चीज़ है उसका जीवन-धर्म होता है . उसको सांचे में ढालकर, मशीन में डालकर फ़र्माइश के अनुसार नहीं गढा जा सकता . उसके नियम को स्वीकार करके ही उसका पूरा फल मिलता है . उसके विरुद्ध दिशा में चलने पर वह बांझ हो जाती है .”

परंतु वर्तमान इतना लुभावना है कि हमने परम्परा की ओर पीठ कर ली है .

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो हिंदी में अंग्रेज़ी के मिश्रण से बनी खिचड़ी भाषा हिंग्रेज़ी के जन्म के बीज संभवतः ईस्ट इंडिया कम्पनी के अंग्रेज़ अधिकारियों से बातचीत की कोशिश करते हिंदुस्तानी खानसामाओं की बटलरी हिंदी में छुपे रहे होंगे .

लेखन की दुनिया में मिश्रित भाषा के प्रयोग का पहला उदाहरण गोवानी कवि जोसेफ़ फ़ुरतादो (१८७२-१९४७) की कविताओं में मिलता है,जिन्होंने हास्य उत्पन्न करने के लिए ‘पिजिन इंग्लिश’ का प्रयोग किया :

“ स्लाय रोग , द ओल्ड ईरानी

 हैज़ मेड ए लाख

 बाय मिक्सिंग मिल्क विद ‘पानी’ ।”

बॉलीवुड की फ़िल्मी पत्रकारिता में नवीनता और चटपटापन लाने के लिए देवयानी चौबाल और शोभा डे ने इसका उपयोग किया तथा पत्रकारिता में इसका श्रेय द इलस्ट्रेटेड वीकली के तत्कालीन सम्पादक खुशवंत सिंह को जाता है .

इस संदर्भ में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भाषिक संकरता के बावज़ूद यह हिंदी में अंग्रेज़ी की नहीं,बल्कि अंग्रेज़ी में हिंदी की मिलावट थी,वह भी आटे में नमक जितनी.  भारतीय भाषाओं के विराट समाज की उपस्थिति में बोली जाने वाली अंग्रेज़ी के लिए यह बहुत अस्वाभाविक भी नहीं था .

इस संस्कारित भाषा में इसकी एक प्रचारक देवयानी चौबाल की मृत्यु पर इसके दूसरे झण्डाबरदार खुशवंत सिंह की श्रद्धांजलि की बानगी गौर फ़रमाइए :

 ” देवयानी’ज़ ग्रेटेस्ट कंट्रीब्यूशन वॉज़ द डिलाइटफ़ुल वे शी मिक्स्ड बॉम्बे उर्दू(हिंदी) विद इंग्लिश .  फ़्रॉम हर आई लर्न्ट ‘लाइन मारना’ , ‘भाव’ एण्ड ‘लफ़ड़ा’ . एण्ड नाउ शी हरसेल्फ़ इज़ ‘खलास’ .”

हिंदी पर अंग्रेज़ी का प्रभाव पहले वाक्य-विन्यास तक सीमित था . तत्पश्चात शहरी और कस्बाई मध्यवर्ग की आत्मसम्मानहीनता और मानसिक शिथिलता के चलते बात अंग्रेज़ी शब्दों, विशेषकर संज्ञा और विशेषण,के अबाधित इस्तेमाल तक पहुंची . अब तो स्थिति क्रियापदों के विरूपण तक जा पहुंची है . विज्ञापन जगत तथा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की अधकचरी हिंदी के साथ अंग्रेज़ी के संयोग से एक अज़ीब-ओ-गरीब कबाइली भाषा प्रचलन में आ रही है .

भारत में अंग्रेज़ी प्रभुवर्ग की भाषा है . विज्ञापन और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर काबिज  अधिकांश लोग इसी पृष्ठभूमि से आए हैं . उनका हिंदी ज्ञान न केवल स्तरीय नहीं है,बल्कि बहुत छिछला है .

चूंकि हिंदी एक बड़े उपभोक्ता समाज की भाषा है अतः उसकी उपेक्षा भी संभव नहीं है . ऐसे में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में विज्ञापन तथा संचार माध्यमों के लिए लेखन की कोई स्वस्थ परम्परा विकसित न कर पाने की स्थिति में मिलावटी हिंदी का प्रयोग एक मज़बूरी है . यानी उनकी मज़बूरी इस नई भाषा को गढ रही है .

 इससे भी दुखद तथ्य यह है कि यह संकर भाषा, अंग्रेज़ी न जानने वाले ऐसे विशाल उपभोक्ता वर्ग को जिसके भाषिक संस्कार भ्रष्ट हो चुके हैं, आत्मतुष्टि का छायाभास देने लगी है .

 हिंदी इस विशाल देश के बहुजातीय समाज की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का  अखिल भारतीय माध्यम है .  विभिन्न भारतीय भाषाओं और बोलियों की शब्द-सम्पदा से अनवरत पोषण पाने वाली हिंदी को आखिर अंग्रेज़ी शब्दों की क्या दरकार है ?  भाषा की उदार ग्रहणशीलता और अबाध आदान-प्रदान की वकालत करते हुए जो इस संकर भाषा के पक्षपोषण में लगे हुए हैं, वे यह तथ्य छिपाते हैं कि अंग्रेज़ी शब्द जनबोलियों तथा उर्दू (अरबी-फ़ारसी) के रचे-पचे शब्दों को धकेल कर ही अपनी जगह बना रहे हैं .

सदाबहार वनों की भांति करोड़ों जीवन-रूपों को फलने-फूलने का अवसर देने वाला यह महादेश पस्त हाल है . इसकी भाषा छीज रही है . कोशिकाओं में जीवन रस सूख चला है . लाल रुधिर कणिकाएं कम से कमतर होती जा रही हैं . परम्परा से भाषा का रिश्ता टूट रहा है . हम एक समृद्ध भाषा को काम चलाने की भाषा,मनोरंजन की भाषा और बाज़ार की भाषा में बदलते देखने को अभिशप्त हैं . ऐसी मिलावटी भाषा में जो भावनाशून्य है,निर्मम है तथा जिसमें फुसलाने व बहकाने की असीम क्षमता है . यह ‘भाषा के मातृलोक’ से कटे स्मृतिहीन  जन-समुदाय की भाषा है . यह उत्तरदायी नागरिकों की नहीं, विचारशून्य उपभोक्ताओं की भाषा है .  बाज़ार की ज़रूरतों तथा संचार माध्यमों के दबाव के परिणामस्वरूप जन्मी यह संकर भाषा, भाषाओं के सुदीर्घ सहसंबंध का वैध प्रतिफलन न होकर घालमेल की अराजकता का अज़ब नमूना है . यह उन भ्रमित अस्मिताओं की बेतुकी भाषा है जो उत्तर-औपनिवेशिक यथार्थ और अंग्रेज़ी के साम्राज्य के साथ पटरी बैठाने की जुगत में हैं .

इस भाषा में कोई गंभीर विमर्श संभव नहीं है . दरअसल यह विचारशीलता का चक्का जाम करने वाली भाषा है . यह भाषा एमटीवी और केंचुकी फ़्राइड चिकन की अमरीकी खुराक पर पली छिन्नमूल श्वेता शेट्टियों और पार्वती खानों की खाने-कमाने की भाषा हो सकती है पर इस महादेश के सांस्कृतिक सरोकार और सामाजिक कारोबार की ‘जातीय’  भाषा नहीं .

भाषा महज अभिव्यक्ति का माध्यम भर है या इसका किसी जाति या समाज के मन-प्राण से, उसकी सामूहिक स्मृति से कोई गहरा और स्थायी रिश्ता होता है ?  भाषा के संबंध विच्छेद क्या हमारी चित्तवृत्तियों में भी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है ?  आचार्य शुक्ल ने  1912 में ही ‘भाषा की शक्ति’   पर विचार करते हुए नागरी प्रचारिणी पत्रिका के जनवरी अंक में लिखा था :

 ” भाषा ही किसी जाति की सभ्यता को सबसे अलग झलकाती है, यही उसके,हृदय के भीतरी पुरजों का पता देती है . किसी जाति को अशक्त करने का सबसे सहज उपाय उसकी भाषा को नष्ट करना है .”

होगा !  क्या करें ? सामने तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चकाचौंध है . इसकी पहुंच है,पैसा है . अनगिनत तात्कालिक लाभ हैं . और फिर समय के साथ भाषा तो बदलेगी ही . कब तक ‘मैया कबहुं बढेगी चोटी’ लिखते रहें ?  अब तो बच्चों तक को दूध इस तरह पिलाया जाता है :

दूध , दूध ,दूध , दूध

पियो   glassful

दूध , दूध ,दूध , दूध

दूध है wonderful

पी सकते हैं रोज़ glassful

दूध , दूध , दूध , दूध

गर्मी में डालो दूध में ice

दूध बन गया very nice

पियो daily once or twice

मिल जाएगा tasty  surprise

पियो must  in  every  season

पियो दूध     for every reason

रहोगे फिर fit and fine

जिओगे past ninty nine

 दूध , दूध , दूध , दूध

चारों ओर मच गया शोर

Give  me  more

Give  me  more

दूध , दूध , दूध , दूध

 

यह भारत के सबसे बड़े और सबसे सफल सहकारिता आंदोलन की भाषा है .

************

 

संकर भाषा के जन्म पर सोहर उर्फ़ डोंट टच माइ गगरिया मोहन रसिया – अंतिम भाग

जुलाई 31, 2007

      हिंदी इस विशाल देश के बहुजातीय समाज की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का  अखिल भारतीय माध्यम है .  विभिन्न भारतीय भाषाओं और बोलियों की शब्द-सम्पदा से अनवरत पोषण पाने वाली हिंदी को आखिर अंग्रेज़ी शब्दों की क्या दरकार है ?  भाषा की उदार ग्रहणशीलता और अबाध आदान-प्रदान की वकालत करते हुए जो इस संकर भाषा के पक्षपोषण में लगे हुए हैं, वे यह तथ्य छिपाते हैं कि अंग्रेज़ी शब्द जनबोलियों तथा उर्दू (अरबी-फ़ारसी) के रचे-पचे शब्दों को धकेल कर ही अपनी जगह बना रहे हैं .

सदाबहार वनों की भांति करोड़ों जीवन-रूपों को फलने-फूलने का अवसर देने वाला यह महादेश पस्त हाल है . इसकी भाषा छीज रही है . कोशिकाओं में जीवन रस सूख चला है . लाल रुधिर कणिकाएं कम से कमतर होती जा रही हैं . परम्परा से भाषा का रिश्ता टूट रहा है . हम एक समृद्ध भाषा को काम चलाने की भाषा,मनोरंजन की भाषा और बाज़ार की भाषा में बदलते देखने को अभिशप्त हैं . ऐसी मिलावटी भाषा में जो भावनाशून्य है,निर्मम है तथा जिसमें फुसलाने व बहकाने की असीम क्षमता है . यह ‘भाषा के मातृलोक’ से कटे स्मृतिहीन  जन-समुदाय की भाषा है . यह उत्तरदायी नागरिकों की नहीं, विचारशून्य उपभोक्ताओं की भाषा है .  बाज़ार की ज़रूरतों तथा संचार माध्यमों के दबाव के परिणामस्वरूप जन्मी यह संकर भाषा, भाषाओं के सुदीर्घ सहसंबंध का वैध प्रतिफलन न होकर घालमेल की अराजकता का अज़ब नमूना है . यह उन भ्रमित अस्मिताओं की बेतुकी भाषा है जो उत्तर-औपनिवेशिक यथार्थ और अंग्रेज़ी के साम्राज्य के साथ पटरी बैठाने की जुगत में हैं .

इस भाषा में कोई गंभीर विमर्श संभव नहीं है . दरअसल यह विचारशीलता का चक्का जाम करने वाली भाषा है . यह भाषा एमटीवी और केंचुकी फ़्राइड चिकन की अमरीकी खुराक पर पली छिन्नमूल श्वेता शेट्टियों और पार्वती खानों की खाने-कमाने की भाषा हो सकती है पर इस महादेश के सांस्कृतिक सरोकार और सामाजिक कारोबार की ‘जातीय’  भाषा नहीं .

भाषा महज अभिव्यक्ति का माध्यम भर है या इसका किसी जाति या समाज के मन-प्राण से, उसकी सामूहिक स्मृति से कोई गहरा और स्थायी रिश्ता होता है ?  भाषा के संबंध विच्छेद क्या हमारी चित्तवृत्तियों में भी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है ?  आचार्य शुक्ल ने  1912 में ही ‘भाषा की शक्ति’   पर विचार करते हुए नागरी प्रचारिणी पत्रिका के जनवरी अंक में लिखा था :

 ” भाषा ही किसी जाति की सभ्यता को सबसे अलग झलकाती है, यही उसके,हृदय के भीतरी पुरजों का पता देती है . किसी जाति को अशक्त करने का सबसे सहज उपाय उसकी भाषा को नष्ट करना है .”

होगा !  क्या करें ? सामने तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चकाचौंध है . इसकी पहुंच है,पैसा है . अनगिनत तात्कालिक लाभ हैं . और फिर समय के साथ भाषा तो बदलेगी ही . कब तक ‘मैया कबहुं बढेगी चोटी’ लिखते रहें ?  अब तो बच्चों तक को दूध इस तरह पिलाया जाता है :

दूध , दूध ,दूध , दूध

पियो   glassful

दूध , दूध ,दूध , दूध

दूध है wonderful

पी सकते हैं रोज़ glassful

दूध , दूध , दूध , दूध

गर्मी में डालो दूध में ice

दूध बन गया very nice

पियो daily once or twice

मिल जाएगा tasty  surprise

पियो must  in  every  season

पियो दूध     for every reason

रहोगे फिर fit and fine

जिओगे past ninty nine

 दूध , दूध , दूध , दूध

चारों ओर मच गया शोर

Give  me  more

Give  me  more

दूध , दूध , दूध , दूध

 

यह भारत के सबसे बड़े और सबसे सफल सहकारिता आंदोलन की भाषा है .

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संकर भाषा के जन्म पर सोहर उर्फ़ डोंट टच माइ गगरिया मोहन रसिया – भाग ४

जुलाई 30, 2007

भाग १ , भाग २ , भाग ३  

 

संकर भाषा के जन्म पर सोहर

उर्फ़

डोंट टच माइ गगरिया मोहन रसिया – भाग ४

 

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो हिंदी में अंग्रेज़ी के मिश्रण से बनी खिचड़ी भाषा हिंग्रेज़ी के जन्म के बीज संभवतः ईस्ट इंडिया कम्पनी के अंग्रेज़ अधिकारियों से बातचीत की कोशिश करते हिंदुस्तानी खानसामाओं की बटलरी हिंदी में छुपे रहे होंगे .

लेखन की दुनिया में मिश्रित भाषा के प्रयोग का पहला उदाहरण गोवानी कवि जोसेफ़ फ़ुरतादो (१८७२-१९४७) की कविताओं में मिलता है,जिन्होंने हास्य उत्पन्न करने के लिए ‘पिजिन इंग्लिश’ का प्रयोग किया :

” स्लाय रोग , द ओल्ड ईरानी

 हैज़ मेड ए लाख

 बाय मिक्सिंग मिल्क विद ‘पानी’ ।”

बॉलीवुड की फ़िल्मी पत्रकारिता में नवीनता और चटपटापन लाने के लिए देवयानी चौबाल और शोभा डे ने इसका उपयोग किया तथा पत्रकारिता में इसका श्रेय द इलस्ट्रेटेड वीकली के तत्कालीन सम्पादक खुशवंत सिंह को जाता है .

इस संदर्भ में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भाषिक संकरता के बावज़ूद यह हिंदी में अंग्रेज़ी की नहीं,बल्कि अंग्रेज़ी में हिंदी की मिलावट थी,वह भी आटे में नमक जितनी.  भारतीय भाषाओं के विराट समाज की उपस्थिति में बोली जाने वाली अंग्रेज़ी के लिए यह बहुत अस्वाभाविक भी नहीं था .

इस संस्कारित भाषा में इसकी एक प्रचारक देवयानी चौबाल की मृत्यु पर इसके दूसरे झण्डाबरदार खुशवंत सिंह की श्रद्धांजलि की बानगी गौर फ़रमाइए :

 ” देवयानी’ज़ ग्रेटेस्ट कंट्रीब्यूशन वॉज़ द डिलाइटफ़ुल वे शी मिक्स्ड बॉम्बे उर्दू(हिंदी) विद इंग्लिश .  फ़्रॉम हर आई लर्न्ट ‘लाइन मारना’ , ‘भाव’ एण्ड ‘लफ़ड़ा’ . एण्ड नाउ शी हरसेल्फ़ इज़ ‘खलास’ .”

हिंदी पर अंग्रेज़ी का प्रभाव पहले वाक्य-विन्यास तक सीमित था . तत्पश्चात शहरी और कस्बाई मध्यवर्ग की आत्मसम्मानहीनता और मानसिक शिथिलता के चलते बात अंग्रेज़ी शब्दों, विशेषकर संज्ञा और विशेषण,के अबाधित इस्तेमाल तक पहुंची . अब तो स्थिति क्रियापदों के विरूपण तक जा पहुंची है . विज्ञापन जगत तथा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की अधकचरी हिंदी के साथ अंग्रेज़ी के संयोग से एक अज़ीब-ओ-गरीब कबाइली भाषा प्रचलन में आ रही है .

भारत में अंग्रेज़ी प्रभुवर्ग की भाषा है . विज्ञापन और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर काबिज  अधिकांश लोग इसी पृष्ठभूमि से आए हैं . उनका हिंदी ज्ञान न केवल स्तरीय नहीं है,बल्कि बहुत छिछला है .

चूंकि हिंदी एक बड़े उपभोक्ता समाज की भाषा है अतः उसकी उपेक्षा भी संभव नहीं है . ऐसे में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में विज्ञापन तथा संचार माध्यमों के लिए लेखन की कोई स्वस्थ परम्परा विकसित न कर पाने की स्थिति में मिलावटी हिंदी का प्रयोग एक मज़बूरी है . यानी उनकी मज़बूरी इस नई भाषा को गढ रही है .

 इससे भी दुखद तथ्य यह है कि यह संकर भाषा, अंग्रेज़ी न जानने वाले ऐसे विशाल उपभोक्ता वर्ग को जिसके भाषिक संस्कार भ्रष्ट हो चुके हैं, आत्मतुष्टि का छायाभास देने लगी है .

 

क्रमशः

संकर भाषा के जन्म पर सोहर उर्फ़ डोंट टच माइ गगरिया मोहन रसिया – भाग ३

जुलाई 27, 2007

भाग १भाग २ 

संकर भाषा के जन्म पर सोहर

उर्फ़

डोंट टच माइ गगरिया मोहन रसिया – भाग ३

 

इस बात से भला किसे इंकार हो सकता है कि ‘भाषा के क्षेत्र में शुद्धतावाद एक यूटोपियाई संकल्पना है .’ यह भी सही है कि भाषाएं आपसी अंतर्क्रिया और ग्रहणशीलता से ही समृद्ध होती हैं . यह एक सहज स्वाभाविक प्रक्रिया है . शब्द एक भाषा से दूसरी भाषा में बेरोकटोक आते-जाते हैं और अनायास ही भाषियों के भाषिक संस्कार का हिस्सा हो जाते हैं . परंतु यह कार्य किसी दबाव से या किसी कार्यसूची के तहत योजनाबद्ध रूप से नहीं किया जा सकता . ऐसे असफल प्रयासों के उदाहरण सामने हैं .

राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद ने ऐसा ही एक प्रयास किया था . आचार्य शुक्ल ने ठीक ही लक्षित किया है कि ‘राजा शिवप्रसाद खिचड़ी हिंदी का स्वप्न ही देखते रहे कि भारतेन्दु ने स्वच्छ हिंदी की शुभ्र छटा दिखाकर लोगों को चमत्कृत कर दिया .’ सहज स्वाभाविक रूप से दूसरी भाषाओं के जितने शब्द हिंदी में आएं उनका स्वागत है . वे वरेण्य हैं . पर उनका सायास आरोपण अन्ततः भाषा के स्वाभाविक  प्रवाह  को बाधित करना है .

भाषा के साथ खिलवाड़ के खिलाफ़ ऐसी ही एक चेतावनी हमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने दी थी . उन्होंने कहा :

“भाषा आत्मीयता का आधार होती है, वह मनुष्य की जैविक प्रवृत्ति से ज्यादा गहरी चीज़ होती है . … भाषा नाम की जो चीज़ है उसका जीवन-धर्म होता है . उसको सांचे में ढालकर, मशीन में डालकर फ़र्माइश के अनुसार नहीं गढा जा सकता . उसके नियम को स्वीकार करके ही उसका पूरा फल मिलता है . उसके विरुद्ध दिशा में चलने पर वह बांझ हो जाती है .”

परंतु वर्तमान इतना लुभावना है कि हमने परम्परा की ओर पीठ कर ली है .

 

क्रमशः

संकर भाषा के जन्म पर सोहर उर्फ़ डोंट टच माइ गगरिया मोहन रसिया – भाग २

जुलाई 26, 2007

भाग – १ यहां पढें

संकर भाषा के जन्म पर सोहर

उर्फ़

डोंट टच माइ गगरिया मोहन रसिया – भाग २

 

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि तीसरी दुनिया सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध है . इसकी भाषा,साहित्य,संगीत,कला,वेशभूषा,खान-पान एवं स्थापत्य आदि की सांस्कृतिक समृद्धि और विविधता इसके नागरिकों की आवश्यकताओं,आकांक्षाओं और रचनात्मकता से विकसित हुई है . यह न केवल उनकी स्थानीय स्थितियों के लिए अनुकूल है बल्कि उनकी आधारभूत मानवीय आवश्यकताओं के लिए भी आवश्यक है .

संचार के साधनों पर कुंडली मारकर बैठी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कुदृष्टि इन देशों की भाषा,संस्कृति और जीवन पद्धति पर है . अतः बहुत ही आक्रामक ढंग से जीवनशैली को प्रभावित किया जा रहा है . परम्परागत सांस्कृतिक वैविध्य और सामुदायिक सहभागिता को नष्ट कर एक मानकीकृत उपभोक्ता संस्कृति लादी जा रही है जो मात्र तीसरी दुनिया के अभिजात्य वर्ग और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ही फ़ायदा पहुंचाएगी . 

न केवल एक एकरूप उपभोक्ता-उन्मुख बाज़ारू संस्कृति को लादने के सारे सरंजाम जुटा दिये गये हैं वरन समाज के एक बड़े वर्ग,विशेषकर युवाओं को परम्परागत मूल्यबोध से काटकर खतरनाक हद तक सांस्कृतिक बिलगाव पैदा कर दिया गया है . भाषा की अर्थ-परम्परा तथा उसकी अन्तर्वस्तु से अलगाव इसी सांस्कृतिक पार्थक्य की कार्यसूची का एक हिस्सा है . 

जातीय दुनिया का यह आत्मविसर्जन — यह लोप — खान-पान से लेकर भाषा के क्षेत्र तक फैल गया है . जीवन की पहली पाठशाला — घर — में न मिठाइयां बनती हैं, न भाषा . दोनों बाहर से आ रही हैं . जब भाषा घर और समाज में नहीं बनेगी तो बाज़ार में बनेगी . दुर्भाग्य से बन भी रही है .

इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों के चौंधियाने वाले रंगीन दृश्य-श्रव्य विज्ञापनों ने भाषा को बाज़ार में इस्तेमाल की चीज़ में बदल दिया है . हिंग्रेज़ी उर्फ़ लॉलीपॉप हिंदी  हिंदुस्तान के अपरिपक्व विज्ञापन जगत के हाथों का ऐसा ही एक खिलौना है  जिसे बाज़ार के लिए, बाज़ार के द्वारा, बाज़ार में गढा जा रहा है और उपग्रह टेलीविज़न के जरिये हिंदुस्तान के दूर-दराज़ के गांवों,ढाणियों और कस्बों में ‘नए आदमी’ की भाषा के रूप में — सामाजिक गतिशीलता की भाषा के रूप में — प्रचारित किया जा रहा है .

यह एक छद्म भाषा है जिसका एकमात्र उद्देश्य एक जीवंत भाषा को नज़रबंद करना है . 

 

क्रमशः