साहित्यानुरागी

चौपटस्वामी की चौपट कविता

  

साहित्यानुरागी

 

 बाबा छाप या एक-सौ बीस

डालकर   देसी पत्ता

चुभलाते-चबाते हुए

— कचर-कचर

पीक इतै-उतै थूकते

बगराते   हुए

— पचर-पचर

चेलों की जमात से लगातार

बोलते-बतियाते हुए

— कचर-पचर

वे सुन रहे हैं कवि की कविता

अंगुली से चूना चाटते हुए

दोहरे हुए जाते हैं आनन्द में

बोलते हुए, ‘लचर-लचर’ ।

 

****

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5 Responses to “साहित्यानुरागी”

  1. ranjana singh Says:

    waah,kamal ki kavita hai.Bahut badhiya likha hai……

  2. प्रमोद सिंह Says:

    स्‍वामीजी का ध्‍यान आकर्षित करना चाहूंगा- ‘फचर-फचर’ का कहीं प्रयोग नहीं हो सका है.

  3. अफ़लातून Says:

    बहुत ख़ूब, स्वामीजी कुछ चेहरे सामने आ गए

  4. महामंत्री- तस्लीम Says:

    चौपट कविता भी बहुत कुछ कह गयी।

  5. (bhootnath)rajeev thepra Says:

    वाह-वाह-वाह-वाह……..कहने से रूक ही नहीं पा रहा….इत्ती अच्छी कविता लिख डाली ………!!

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