बिलारहिं सिखवै मूसा

मूसा कहे बिलार सों……. 

 

मूसा कहे बिलार सों, सुन रे जूठ जुठैल ।

हम निकसत हैं सैर को, छांड़ि बैठ मेरी गैल

छांड़ि बैठ मेरी गैल, कचरि लातन सों जैहौ ।

तुम हौ निपट गरीब  कहा घर बैठे खैहौ ॥

 

कह गिरिधर कविराय, बात सुनियो रे हूसा ।

वाह दिनन  के फेर बिलारहिं सिखवै मूसा ॥

 

—   गिरिधर कविराय

 

******

 

(आभासी जगत में कुंडलियों के बेताज बादशाह उड़नतश्तरी उर्फ़ समीर लाल से अनुरोध कि  इसे उनके इलाके/क्षेत्राधिकार में घुसपैठ का प्रयास न माना जाए )

 

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2 Responses to “बिलारहिं सिखवै मूसा”

  1. समीर लाल Says:

    🙂 गिरिधर कविराय की कुण्ड़ली/ समकाल की प्रस्तुति-नमन है. वैसे तो है ही नहीम मगर अगर सच घुसपैठ भी करें तो भी मेरा ही सौभाग्य. आपकी कलम इसी बहाने मुझे याद करे. 🙂

    आनन्द आया मूसा का हूंसा पढ़ने में.

  2. Gyandutt Pandey Says:

    बहुत दिन बाद आये। स्वागत। और नये गिरधरावतार में आने पर बधाई।

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