मैंने सात बार ……..

खलील जिब्रान  का  सुभाषित गद्यकाव्य

**********************************

मैंने सात बार अपनी आत्मा से घृणा की

***********************************

मैंने सात बार अपनी आत्मा से घृणा की :

प्रथम  :    जब मैंने उसे उच्चता-प्राप्ति की अभिलाषा में हतोत्साह पाया ;

द्वितीय :  जब मैंने उसे अपंग के सामने लंगड़ाते पाया ;

तृतीय :   जब उसे सरल या कठिन का चुनाव करना था और उसने

                 सरल को चुना ;

चतुर्थ   :  जब उसने एक पाप किया और यह सोचकर संतोष कर लिया

               कि अन्य भी यह पाप करते हैं ;

पांचवीं बार :  जब कमज़ोरी के प्रति उसने धैर्य दिखाया और अपनी इस

                        धैर्यशीलता को शक्ति का प्रतीक बताया ;

छठी बार     :  जब उसने एक चेहरे की विद्रूपता पर घृणा की दृष्टि डाली

                        और यह न समझा कि यह उसी का एक रूप है ;

और सातवीं बार तब : जब उसने प्रशंसा का एक गीत गाया और इसे

                                        अपना ‘गुण’ व्यक्त किया ।

**************

खलील जिब्रान (१८८३-१९३१) : विश्वविख्यात लेखक,कवि,चित्रकार और दार्शनिक . सीरिया के माउंट लेबनान प्रांत में जन्म .  अरबी और अंग्रेज़ी में लेखन . ‘दि प्रोफ़ेट’ उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना मानी जाती है . बलिष्ठ कल्पना-शक्ति के कवि खलील जिब्रान गद्य-काव्य की एक नई शैली के उन्नायक थे . वे उस परम्परा के कवि थे जिससे सूफ़ी-संत-मनीषी और ज्ञानी जन आते हैं .

Advertisements

2 Responses to “मैंने सात बार ……..”

  1. समीर लाल Says:

    सभी आत्मसात और चिंतन योग्य संपूर्ण सुभाषित. आभार इन्हें पेश करने के लिये.

  2. RS SHARMA Says:

    Thanks for the thought provoking post.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s


%d bloggers like this: