हिंदी-१ : आत्मविश्लेषण का अवसर

संविधान की स्वर्णजयंती और फिर राजभाषा की स्वर्णजयंती . स्पष्ट है कि आधी शताब्दी पहले हमारा नेतृत्व जब जब देश को नया संविधान दे रहा था तब वह लोकशाही और लोकशाही की भाषा दोनों के बारे में समान रूप से चिंतनशील था .

देश का संविधान अर्पित करते समय संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने जिन दो बातों के लिए खेद व्यक्त किया था उनमें से एक यह थी कि वे संविधान को अपनी भाषा में — देश की भाषा में — प्रस्तुत नहीं कर पाये .आज जब हम अपनी भाषा को लेकर नई सहस्राब्दी में प्रवेश कर रहे हैं,खेद हमारा स्थाई भाव बन गया है . संविधान में तो निर्देश था कि ‘हिंदी का इस तरह विकास किया जाए कि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके ……’  परन्तु जो हुआ वह जगजाहिर है .

कहने को कहा जा सकता है कि हिंदी कम्प्यूटर की भाषा बन गई है . हमने भारतीय भाषाओं के लिए उत्कृष्ट सॉफ़्टवेयर विकसित कर लिए हैं . ई-मेल और इंटरनेट पर यह भाषा इस्तेमाल की जा रही है . नई-नई वेब साइटें  शुरु रही हैं . नए-नए पोर्टल बन रहे हैं और भाषा का प्रौद्योगिकी के साथ सहसंबंध उसे नई चाल में ढाल रहा है .

नवीन प्रौद्योगिकी के अश्व पर आरोहण आवश्यक है . पर उससे भी ज्यादा ज़रूरी है भाषा के पर्यावरण की रक्षा . भाषा का अपनी जड़ों से — अपनी अर्थ-परम्परा से —  जुड़ा रहना . आज हमारी भाषा पीली पड़ती जा रही है,छीजती जा रही है . भाषा की कोशिकाओं में जीवन रस कुछ सूख-सा चला है . चिकित्साविज्ञान की शब्दावली में कहूं तो हमारी भाषा की लाल रुधिर कणिकाएं मरती जा रही हैं . भाषा का हीमोग्लोबिन स्तर लगातार घट रहा है . भाषा का बोलियों से संबंध टूट रहा है और हिंदी ने अपनी बोलियों से पोषक रस पाना बंद कर दिया है .

न केवल हमने ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों से, विशेषकर विज्ञान और प्रौद्योगिकी संबंधी साहित्य से अपनी भाषा को समुचित समृद्ध नहीं किया बल्कि काफ़ी हद तक रचनात्मक साहित्य की भाषा को भी रस-गंधविहीन बना दिया . देशज मुहावरे  और व्यंजना  का ठाठ अब समाप्तप्राय है .

‘हिंदी दुर्दशा देखी न जाई’  के हताश करनेवाले हाहाकार और ‘कुछ बात है कि हिंदी मिटती नहीं हमारी’  की विलक्षण आत्ममुग्धता के दो अतिवादी शिविरों में बंटे बुद्धिजीवियों को समान संदेह से देखते, अंग्रेज़ी न जाननेवाले विशाल भारतीय समाज को भी इधर एक मिलावटी भाषा ‘हिंग्रेज़ी’ में उच्चताबोध का छायाभास होने लगा है .यह घालमेल सरसों में सत्यानासी के बीज (आर्जीमोन)  की मिलावट से भी अधिक घातक है .

यथार्थ आकलन और आत्मविश्लेषण के मध्यम मार्ग की जितनी आवश्यकता आज है पहले कभी नहीं थी .जड़ें सूख रही हैं और हम पत्तों को पानी देकर प्रसन्न हैं . अंग्रेज़ी के गढ़ लंदन में विश्व हिंदी सम्मेलन हो रहे हैं और देश के भीतर प्राथमिक शिक्षा का माध्यम उत्तरोत्तर अंग्रेज़ी होता जा रहा है . जब तक सच्चे और ईमानदार प्रयास नहीं होंगे, हिंदी के नाम पर प्रतीकवादी कर्मकांड चलता रहेगा और उससे उपजे ताने-तिसने भी जारी रहेंगे .

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(  लेखन/प्रकाशन काल : सितम्बर २००० )

                                                           

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One Response to “हिंदी-१ : आत्मविश्लेषण का अवसर”

  1. ज्ञानदत्त पाण्डेय Says:

    > हिंदी ने अपनी बोलियों से पोषक रस पाना बंद कर दिया है .
    सही. हिन्दी अटपटी सरकारी और ऊबाऊ होती जा रही है.

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