कोलकाता का हिंदी रंगमंच-3

1947 में ‘तरुण संघ’ की स्थापना के साथ कोलकाता में नवीन विषयवस्तु वाले नाटकों का प्रदर्शन प्रारंभ हुआ । क्रमश: पाश्चात्य रंगमंच के तत्वों को भी जगह मिलनी शुरू हुई । भंवरमल सिंघी, श्यामानंद जालान, सुशीला भंडारी, सु्शीला सिंघी और प्रतिभा अग्रवाल जैसे ऊर्जस्वी कलाकार कुछ नया व सार्थक करने की बेचैनी लेकर रंग परिदृश्य पर उभरे । ‘तरुण संघ’ ने विष्णु प्रभाकर, उपेंद्र नाथ अश्क, धर्मवीर भारती, जगदीशचंद्र माथुर व तरुण राय जैसे लेखकों के नाटक खेले । 1953 में राजेंद्र शर्मा द्वारा स्थापित संस्था ‘भारत भारती’ ने 1967 में खेले गए नाटक ‘डाउन ट्रेन’ के लिए इन्हें द्वितीय जनकीमंगल पुरस्कार प्राप्त हुआ ।  

 22 दिसंबर 1955 को ‘अनामिका’ की स्थापना के साथ कोलकाता के हिन्दी रंगमंच ने एक नए युग में प्रवेश किया । श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल, मन्नू भंडारी व तरुण संघ के उनके अन्य साथियों ने मिलकर इस संस्था का गठन किया । ‘अनामिका’ द्वारा प्रदर्शित कई नाटकों की अनुगूंज पूरे देश में सुनाई दी । इस संस्था ने पचास से भी अधिक नाटकों, कई एकांकियों व बाल नाटकों का मंचन किया । घर और बाहर ( रवींद्रनाथ ठाकुर के बांग्ला उपन्यास ‘घरे-बाइरे’ का प्रतिभा अग्रवाल कृत नाट्य रूपांतर), आर. जी. आनंद के ‘हम हिंदुस्तानी हैं’, विनोद रस्तोगी के ‘नया हाथ’, मोहन राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’ व ‘लहरों के राजहंस’ व बादल सरकार के नाटकों के मंचन के लिए अनामिका को खासी लोकप्रियता हासिल हुई । अधिकांश नाटकों का निर्देशन श्यामानंद जालान,विमल लाठ और डा. प्रतिभा अग्रवाल ने किया । प्रतिभा अग्रवाल ने नाटकों के अनुवाद व नाट्य रूपांतर करने की  दिशा में अत्यंत स्थायी महत्व का कार्य किया। 1964 में अनामिका ने एक नाट्य महोत्सव का आयोजन किया । उसमें देश के मशहूर लेखक, निर्देशकों व नाट्य समीक्षकों ने शिरकत की और उस अवसर पर आयोजित विचारगोष्ठियों में भाग लिया । इस नाट्य महोत्सव का उद्घाटन प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने किया था व इसमें थियेटर यूनिट, बंबई ने ‘अंधा युग’, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली ने ‘राजा ईडिपस’, अनामिका ने ‘छपते-छपते’, मूनलाइट ने ‘सीता बनवास’ व ‘रामलीला नौटंकी’, श्री आर्ट्स क्लब, दिल्ली ने ‘अंडर सेक्रेटरी’ व श्री नाट्यम, वाराणसी ने ‘गोदान’ का मंचन किया । इसी वर्ष कृष्णाचार्य के संपादन में ‘हिन्दी नाट्य  साहित्य’ का प्रकाशन हुआ । अनामिका को ‘नाट्य वार्ता’ नामक रंग पत्रिका के प्रकशन का भी श्रेय जाता है ।

  1963 से नाटकों के मंचन में सक्रिय ‘संगीत कला मंदिर’ नामक संस्था ने विभिन्न भाषाओं में पचास से अधिक प्रस्तुतियां की जिनमें ‘एक प्याला कॉफी’, ‘मृच्छकटिक’, ‘किसी एक फूल का नाम लो’, ‘एक गुलाम बीबी का’ व ‘एक और द्रोणाचार्य’ प्रमुख हैं । 1976 में इस संस्था ने मोहन राकेश को उनके नाटक ‘आधे-अधूरे’ के लिए मरणोपरांत पुरस्कृत किया ।

  अदाकार नाट्य दल को भी पचास से अधिक प्रस्तु्तियों का श्रेय है । यह दल ‘भूचाल’,’खामोश अदालत जारी है’ व ‘रिश्ते-नाते’ के उत्कृष्ट मंचन के लिए जाना जाता है । इसके निर्देशक-अभिनेता कृष्ण कुमार राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पाकर अहींद्र चौधरी से अभिनय का पाठ पढ़ने कोलकाता आए थे । अहींद्र चौधरी तब रवींद्र भारती में अभिनय कला के प्रोफेसर थे ।

  अनामिका में अधिक प्रयोगशील व ‘बोल्ड’ नाटकों के मंचन के लिए वांछित खुलेपन की गुंजाइश न पाकर श्यामानंद जालान ने 1972 में ‘पदातिक’ की स्थापना की और ‘गीधाड़े’ और ‘सखाराम बाइंडर’ जैसे नाटकों को सफलतापूर्वक खेला ।

 ‘पदातिक’ को ब्रेश्ट, मोलियर, इब्सन व सैमुअल बैकेट आदि विदेशी नाटककारों एवं मोहन राकेश, महा्श्वेता देवी,विजय तेंदुलकर, बादल सरकार, निर्मल वर्मा व जीपी देशपांडे जैसे भारतीय लेखकों के नाटकों को मंचित करने का श्रेय प्राप्त है । पदातिक ‘शुतुरमुर्ग’ ‘एवम इंद्रजीत’, ‘आधे-अधूरे’, ‘पगला घोड़ा’ व ‘सखाराम बाइंडर’ की प्रभावोत्पादक प्रस्तुतियों के लिए ख्यात है ।

 श्यामानंद जालान के अतिरिक्त विजय शर्मा और कुणाल पाथी ने पदातिक के नाटकों का निर्देशन किया है ।

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6 Responses to “कोलकाता का हिंदी रंगमंच-3”

  1. maithily Says:

    चौपटस्वामी जी; आज आपने मुझे अपने पिछले दिनों में पहुंचा दिया. धन्यवाद

  2. kakesh Says:

    वाह वाह मजा आ गया ..सभी जाने पहचाने नाम … आपके द्वारा बताये बहुत से नाटक किये हैं …सखाराम बाइंडर क्या नाटक है…मैने सिर्फ देखा है…विजय तैन्दुलकर का .. पर कुछ अभी छूटा सा लगा..अभी और लिखेंगे क्या???

    स्कन्दगुप्त , गांधारी.. ,फंदी, चरणदास चोर , टोपी शुक्ला कई हैं जी … लिखियेगा जरूर.

  3. प्रमोद सिंह Says:

    यह आप सचमुच बड़ा दुरुस्‍त संचयन कर रहे हैं. हमने ’84 या 85′ में कभी.. इलाहाबाद के बंगालियों द्वारा दुर्गा पूजा के अवसर पर सांस्‍कृतिक आयोजन के बतौर.. पहली दफा जालान साहब निर्देशित दो नाटक देखे- ‘आधे अधूरे’ और तेंदुलकर का ‘पंछी ऐसे आते हैं’- और एकदम-से धराशायी हो गए थे. इलाहाबाद के बंगला समाज के ही सौजन्‍य से अरुण मुखर्जी का ‘जगन्‍नाथ’ देखने का भी सुख प्राप्‍त हुआ.. बड़ी ही मार्मिक स्‍मृति है उसकी.. प्रोबिर गुहा (?) और बादल सरकार के नाटक भी देखे.. कुछ वैसा ही असर कुछ वर्षों बाद दिल्‍ली में नांदिकार का एक लोकप्रिय बंगला नाटक देखकर पड़ा था.. इन गरिष्‍ठ, परतदार अनुभवों के आगे दिल्‍ली रंगमंच के ढेरों नाटक (कुछ अपवाद ज़रूर रहे होंगे) हमेशा दो कौड़ी के लगते रहे.

  4. सुभाष मौर्य Says:

    नमस्‍कार चौपट स्‍वामी जी,

    आप तो हिंदी रंगमंच के रसिया और खासे जानकार मालूम होते हैं। मेरी भी हिंदी रंगकर्म में गहरी रूचि है। कोलकाता के हिंदी रंगमंच से संबंधित आपके लेख बहुत अच्‍छे रहे। लेकिन इनमें तथ्‍यात्‍मक जानकारी ज्‍यादा है। हालांकि यह अपने आप में बेहद महत्‍वपूर्ण है। मैं जेएनयू से ‘रंगालोचक नेमिचंद जैन और हिंदी रंगालोचना’ विषय पर शोध कर रहा हूं। मैंने एम फिल पृथ्‍वी थियेटर:उद्भव और विकास विषय पर किया है। रोजी रोटी के लिये पत्रकारिता से जुड़ा हूं। आपसे आगे बातचीत की आकांक्षा है।

  5. ज्ञानदत्त पाण्डेय Says:

    कोलकाता में वर्तमान क्या है? सीपीएम की रैली में “मार्क्सवाद जिन्दाबाद” नारे लगाते लोगों का ही रंगमंच बचा है या ललित कलायें फल फूल रही है? कभी बताइयेगा.

  6. vimal verma Says:

    नमस्कार,
    कोलकाता के हिंदी रंगमंच पर आपने तथ्यपरक जानकारी दी है जिससे पता चलता है कोलकाता मे हिन्दी रंगकर्म हमेशा मजबूत स्थिति मे रहा है.ऐसे दौर मे जब हमारे यहां पुरानी नाट्य संस्थाएं हमारे शहरों मे दम तोड़ रही थी ऐसे में कोलकाता का रंगमंच अपने पैरो पर मजबूती से टिका रहा ये तो वाकई बहुत सुखद है. जबकी हिन्दी मे स्तरीय नाटकों की कमी हमेशा खलती रही है..लेकिन पिछले १० वर्षो मे वहां किस तरह का रंगकर्म हो रहा है जानने की उत्सुक्ता है. धन्यवाद

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