हसन जमाल और ….

आदमी गलती करता है . कई लोग तो यहां तक कहते हैं कि आदमी गलतियों का पुतला है. पर आदमी की खूबी यह है कि वह गलती का अहसास कर और उसे मान कर अपने को और भी उदात्त धरातल पर प्रतिष्ठित करने का माद्दा रखता है. पर चूंकि मनुष्य में मूर्खता को ‘मल्टीप्लाई’ करने की भी अभूतपूर्व क्षमता होती है सो अक्सर उदात्तता की बजाय मूर्खता की बहार ही दिखाई देती है.

इस छोटी-सी भूमिका के बाद पुनः हसन जमाल प्रकरण पर आता हूं . हसन जमाल की इंटरनेट-संबंधी टिप्पणी कैसी थी और  वे क्या कहना चाहते थे, यह पहले ही लिख चुका हूं सो दोहराने की ज़रूरत नहीं है.बस अपनी पोस्ट की अंतिम पंक्तियां सुलभ संदर्भ के लिए पुनः दे रहा हूं.

   ” हसन जमाल हमारे समय के बड़े संपादक हैं .  उनकी बात और उसके निहितार्थ पर समझदारी और सहानुभूति से विचार होना चाहिए , तदर्थवाद के तहत दांत चियारते हुए नहीं .”

आलोचना रवि रतलामी ने भी की थी.  और अच्छी-खासी की थी . पर उपहास नहीं किया था . मसिजीवी हसन जमाल का उपहास कर रहे थे. पोस्ट की बाकी सामग्री को  छोड़िए और उनकी पोस्ट के शीर्षक में छिपी हिकारत और  उपहास को देखिए :

Saturday, April 21, 2007

तू तक, तू तक, तू तिया….अई जमाल होए

 

 और उसके बाद पढिये पहला ही पैराग्राफ :

” जब कॉलेज में पढ़ते थे तो यह एक लोकप्रिय पंजाबी गीत था..तू तक, तू तक, तू तिया….अई जमाल होए। मुझे नहीं मालूम था आज भी नहीं मालूम कि इसका कोई अर्थ है कि नहीं। मुझे यह जोश में गाई निरर्थक ध्‍वनि ही लगता था। अब क्‍यों याद आई…जमाल से और इस निरर्थकता से।”

यानी मसिजीवी के अनुसार जमाल साहब की आलोचनात्मक टिप्पणी  एक ‘निरर्थक प्रलाप’  था . हसन साहब की आलोचना को वे दांत चियार कर प्रहसन का रूप दे रहे थे. अपनी पोस्ट के अंतिम  अनुच्छेद में वे हसन जमाल के बारे में रत्ती भर  भी जाने बिना उन्हें ‘सत्ता प्रतिष्ठानों के दुर्गों का किलेदार’ घोषित करते  हैं . विदेशी पैसे से चलने वाली संस्था में कुनबे के साथ  मलाई खा चुके और अब अच्छी खासी प्राध्यापकी कर रहे मसिजीवी तो हुए जनवादी-लोकवादी  और पुराने तपे हुए समाजवादी हसन जमाल हुए ‘सत्ता प्रतिष्ठान के किलेदार’. यह झूठ,ढोंग और बेशर्मी  से रची गई अज़ब-गज़ब  फ़ंतासी है जो स्वयं मसिजीवी के चाल-चलन और चरित्र पर अपेक्षित प्रकाश डालती है.

टैक्नोलोजी  की अपनी कोई दृष्टि  नहीं होती .मनुष्य उस पर मूल्यों का आरोपण करता है. अतः प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग की गुंजाइश बनी रहती है. इसीलिए जब जीतू आईटीसी के प्रकल्प ‘ईचौपाल’ का प्रशंसात्मक भाव से जिक्र करते हैं,अफ़लातून तुरंत प्रतिपक्ष प्रस्तुत करते हैं.

         “ई-चौपाल भारत के किसानों से बहुराष्ट्रीय कम्पनी द्वारा फसल            खरीदने की परियोजना है जिसका प्रादुर्भाव मण्डी-कानूनों को             बदल कर हुआ है। ऐसे योजना का प्रतिकार मप्र में  किसानो,           मण्डीकर्मियों और छोटे गल्ला व्यापारियों   सभी  ने किया।

यही कारण है कि आम भारतीय का पारंपरिक मन प्रौद्योगिकी को संदेह की नज़र से देखता है. प्रौद्योगिकी के घोड़े पर चढाने के पहले उसे थोड़ी-बहुत घुड़सवारी सिखानी होगी. उसके बारे में जागरूक करना होगा. उसे प्रौद्योगिकियों में  फ़र्क करना सिखाना होगा. टैक्नोलॉजी के अच्छे और बुरे  दोनों पक्षों से अवगत कराना होगा. हम इस सम्प्रभु देश के जिम्मेदार नागरिक हैं. हम कोई टेक्नोलॉजी के दलाल थोडे़ ही हैं. और वैसे भी एक आलोचक को सूली पर चढ़ाने से  तो समस्या हल होने वाली है नहीं .

अब कुछ बातें मसिजीवी और उनके जवाब पर . बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी.  तब वे व्यक्तिगत और सैद्धांतिक का प्रश्न उठाएंगे .और तब यह  प्रश्न भी  उठेगा कि विचार और व्यक्तिगत की सीमा रेखा की भंकस आखिर सबसे ज्यादा वे ही क्यों कर  करते हैं जिनके चरित्र अवसरवाद और गंदगी   में गले तक लिथड़े होते हैं.  क्या इसके पीछे कोई अपराधबोध काम करता है ?

पढ़कर कोई भी जान सकता है कि मेरी पोस्ट का केन्द्र-बिंदु हसन जमाल थे. नेट के मसिजीवी या दिल्ली के नीलाम्बुज सिंह या  झूमरी तलैया के लालकमल सिंह अगर इसमें हैं तो सिर्फ़ चलते-चलाते. यानी जितना ज़रूरी था उतने.  पर चूंकि गलती और पश्चाताप के किसी भी अहसास से परे मसिजीवी पुनः हमलावर हैं तो कुछ बातें मसिजीवी जी के अंतरजालीय (जाली नहीं) व्यक्तित्व के बारे में .

आपनी चित्र-विचित्र भाषा और कौतुक-भाव  के साथ वे हिंदी ब्लॉग-जगत के ‘गोविन्दा’ के रूप में नारद पर ठीक-ठाक से ही निभ रहे थे .  कुछ गम्भीर चिट्ठाकारों की पैनी नज़र को छोड़ दें तो उनकी उथली सूचनापरक पोस्टों का खोखलापन ढंका-मुंदा  सा था . जिसे वे कभी अपनी पीएचडी के ज़िक्र से और कभी नारीवाद  अथवा  चमत्कारवाद के चोगे में छिपाने का प्रयास करते रहते थे. पर चूंकि अब वे धमकी देने पर उतर आए हैं तो उनके लेखकीय व्यक्तित्व का थोड़ा-बहुत विश्लेषण ज़रूरी हो गया है.

 सबसे पहले मसिजीवी के नारी-विमर्श पर नज़र डालते हैं और उनके चिट्ठे के आधार  पर उनका नारी के प्रति नज़रिया समझने का प्रयास करते हैं. नारी-विमर्श के इस आत्ममुग्ध पैरोकार के खुद के भीतर के वीभत्स पुरुष अहं का विस्फोट देखिए उनके खुद के चिट्ठे पर :

 

“Friday, March 31, 2006

कहा मानसर चाह सो पाई

फिलहाल काफी पंकमय अनुभव कर रहा हूँ। लेक्‍चररी की एक छोटी सी लड़ाई लड़ रहा था- हार गया। पदमावती का रूप पारस था जो छूता सोना हो जाता और ……………. इस विश्‍वविद्यालयी दुनिया में काफी कीचड़ भरा है। इसे भी जो छूता है पंकमयी हो जाता है।……….”

 

यानी एक मामूली व्याख्याता के पद पर अपने बजाय एक स्त्री की नियुक्ति को  पुरुष-वर्चस्व के मद में डूबा यह आदमी पचा नहीं पा रहा है और उस स्त्री के ज्ञान को नहीं —  उसके रूप के पारस — उसकी सुंदरता को उसके चयन का आधार बता रहा है. उसके चरित्र को लांछित करने का घृणित काम कर  रहा है.  और समझ रहा है कि उसने कोई बड़ी भावपूर्ण साहित्यिक बात कही है. इसे क्या कहूं ‘मेल शॉविनिस्ट —-‘  . दूसरों को पंकमय कहने के पहले मसिजीवी अपने भीतर के पंक पर भी एक नज़र डाल लें . उस चयनित स्त्री के सौन्दर्य का इतने घटिया ढंग  से ज़िक्र करना मसिजीवी के भीतर की कुरूपता को — उनके पुरुषवादी अहं को — उघाड़ कर रख देता  है.

रही बात योग्यता की तो मसिजीवी की तमाम भाषाई चौंचलेबाज़ी और अजीबोगरीब शीर्षकों के चटखपन के बावजूद  भाषा उनसे सधती नहीं है. बड़े वाक्य उनसे संभलते नहीं हैं. खेत से चलते हैं और खलिहान में पहुंच जाते हैं. जेंडर से उनके संबंध वैसे ही कुछ ठीक नहीं हैं. सीखना वे चाहते नहीं .

अरे! कहीं और से नहीं तो कम-से-कम अपने चिट्ठाकार साथियों यथा प्रमोद,रवीश,फ़ुरसतिया, अनामदास और अभय को पढकर ही वे भाषा सीखने की कोशिश करें . वे नहीं सीख रहे हैं इसका भी मुझे इतना दुख नहीं है जितना इस बात का कि यही  आदमी, अपनी इसी लद्दड़ हिंदी और इसी छिछलेपन के साथ महाविद्यालय में बच्चों को हिंदी पढ़ाता होगा .

 नोम चौम्स्की और अमर्त्य सेन का नाम लिखने मात्र से बौद्धिक दरिद्रता दूर नहीं होती . अस्पष्ट सामाजिक समझ और फुटकर ज्ञान की केंचुली जब उतरती है तो आदमी महाता उनराओ की पसलीदार फोटो छापकर भी किसी भरे पेट वाले की टेक्नोलॉजी के पक्ष में बंदनवार की तरह लटक सकता है. जब आपमें रविकान्त जैसी मानविकी की समझ और सुधीश पचौरी जैसी खिलंदड़ी भाषा नहीं होती और आप वैसा बानक धरते हैं तो आप  निरे ‘फ़ो ग्रास’ या ‘फ़ुआ ग्रा’ हो जाते हैं.

अहं का फूला गुब्बारा मसिजीवी से ऐसे-ऐसे काम करवाता है कि आप  देख कर दंग रह जाएंगे . वे एक व्याख्याता (तदर्थ या स्थाई पता नहीं)  हैं, पर अपने प्रोफ़ाइल में वे अपने ‘ऑक्यूपेशन’ में लिखते हैं : Prof. ; मान गए ना भाई की छलांग को . रीडर भी नहीं सीधे प्रोफ़ेसर . यह है मसिजीवी की अहमन्यता और यह है उनका चरित्र .

 अपनी इतनी बड़ी पोस्ट में मैंने मसिजीवी के परिवार पर  कोई प्रत्यक्ष टिप्पणी नहीं की थी. पर चूंकि अपराधबोध और कुंठा से ग्रस्त मसिजीवी ने अपनी  पोस्ट में खुद ही यह मुद्दा एकाधिक बार उठाया है तो अब इस पर भी थोड़ी बात हो ही जानी चाहिए .

मसिजीवी,उनकी पत्नी नीलिमा और पत्नी की छोटी बहन नोटपैड उर्फ़ सुजाता(मसिजीवी की साली नहीं कहूंगा वरना वे इसे गाली के रूप में प्रचारित करेंगे) ब्लॉग जगत में सक्रिय हैं . जैसे अन्य चिट्ठाकारों का जिक्र हो सकता है वैसे ही इनका भी हो सकता है. नीलिमा और नोटपैड की क्षमता आश्वस्त करने वाली है. ये मसिजीवी की मदद के बिना भी अपनी जगह बनाने में सक्षम हैं. पर पुरुष-ग्रंथि से मजबूर मसिजीवी एक ओर इनको लगातार ‘प्रमोट’  करने का जतन करते  रहते हैं और दूसरी ओर इनसे अपने संबंधों को उजागर करने से बचते रहे हैं . पर इसके ठीक विपरीत ‘नी’ और ‘नो’ के चिट्ठे पर जैसे ही किसी  की थोड़ी-सी  भी प्रतिकूल टिप्पणी आती है, मसिजीवी वहां अपने कलम-बुत्तका के साथ ‘सपोर्ट’ के लिए पहुंच जाते हैं. टिप्पणी करते समय येन-केन-प्रकारेण उक्त चिट्ठाकारों की ‘पीएचडी’ के बारे में बताना भी नहीं भूलते हैं. उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान करने में मसिजीवी की इतनी  जबरदस्त आंतरिक व्यग्रता को देख-पहचान कर ही किसी बंदे ने उन्हें ‘कालिखजीवी’ की उपाधि प्रदान की  थी. अपने साधारण से लेखों के छपने पर  मसिजीवी-परिवार  गोलबंद होकर नारद को हुआ-हुआ के ऐसे  कोलाहल से भर देने की क्षमता रखता है कि मुर्दे भी उठ खड़े हों. 

स्त्री सशक्तीकरण के मुद्दे पर एक  बात  और  याद आई . आपने स्त्री सशक्तीकरण के अनेक उदाहरण देखे होंगे पर तमाम योग्यता के बावजूद स्त्रियों के सशक्तीकरण का ऐसा त्वरित उदाहरण इतिहास में विरल ही होगा  जहां कोई स्त्री फ़रवरी07 में ब्लॉग लिखना शुरु करे और  मार्च07 में, यानी एक माह के भीतर उसका सशक्तीकरण हो जाए और वह चिट्ठा-चर्चा के दल में शामिल हो जाए और पहली अप्रैल को  इस सशक्तीकरण के फ़ल भी मिलने लगें .  इतने ही कम समय में,इतने ही वेग से और इसी प्रक्रिया से नोटपैड जी का सशक्तीकरण हुआ . पर जो इसे परिवारवाद कहे उस पर भरोसा मत कीजिएगा. एक ही प्रतिभाशाली परिवार के एक साथ तीन-तीन सदस्य चिट्ठा जगत के कर्णधारों में शामिल हो जाएं तो इसे प्रतिभा का विस्फोट ही मानना चाहिए. जनता अविनाश के पीछे पड़ी रही और पता ही नहीं चला कि कब पर्दे के पीछे  यह सशक्तीकरण हो गया .

 अविनाश की तेजी-तुर्शी  देख कर  लोग उसके पीछे पड़ गए  और  यह भूल गए कि एक ‘गोगिया पाशा’ गुपचुप में अपना काम कर रहा है. एक-दो लेख छपे .एक दो लोगों की तस्वीरें छपीं . पहले नारद पर कुछ आरोप लगाकर दबाव में लाया गया फिर प्रिंट मीडिया में छपी कुछ रिपोर्टों की परिवार के चिट्ठों पर जबरदस्त ‘रिसाइकिलिंग’ की गई. एक बुजुर्ग चिट्ठाकार द्वारा इस ओर संकेत करने पर बड़ी निर्लज्जता और धृष्टता से उसे फिर दोहराया गया .  फिर सशक्तीकरण हुआ और सब कुछ ठीक-ठाक हो गया .

जो लोग बरसों से सक्रिय  और गंभीर हस्तक्षेप करने में समर्थ घुघुती बासुति, बेज़ी, प्रत्यक्षा, मनीषा,रत्ना,मान्या आदि को स्त्री सशक्तीकरण का प्रतीक मानते हों तो उन्हें उपर्युक्त उदाहरण देखकर स्त्री सशक्तीकरण के नए उप-मार्गों और नए बनते मानकों पर विचार करना चाहिए.

अवसरवाद को छोड़कर और क्या कारण हो सकता है कि सृजन शिल्पी और सागर और अविनाश जैसे खांटी लोगों के नारद से निकलने या निकाले जाने की स्थिति बनने लगे और एक परिवार  दोनों की कीमत पर अपनी गोटी फ़िट कर ले.  सृजन शिल्पी के प्रति मसिजीवी की हिकारत और अविनाश के प्रति उमड़ा प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. जिसे सही परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए.

मेरी पोस्ट ‘हसन जमाल के पक्ष  में’ पर बहुत सी प्रतिक्रियाएं हुई हैं और हो सकती हैं . पर वहां हिंदी-उर्दू मुद्दे पर कोई विवाद खड़ा करने का संकेत शायद ही किसी को दिखा हो . उर्दू साहित्य को देवनागरी में प्रस्तुत करने वाली पत्रिका  और  उसके सम्पादक के पक्ष में मैं  अपनी हिन्दी की ओर से खड़ा हूं और मसिजीवी उसमें ‘माइक्रोस्कोप’ लेकर हिंदी-उर्दू विवाद के बिंदु ढूंढ रहे हैं. ऐसा सोच तो किसी  षड़यंत्रकारी  दिल-दिमाग वाले कमज़र्फ़ इंसान का ही हो  सकता है .

सब कुछ लिखने के बाद मसिजीवी पुनः उवाचते हैं कि ‘हसन जमाल के तर्क फूहड़ थे’ और ‘वे चौपटस्वामी से अपनी वकालत करवा रहे हैं’. हसन जमाल से मेरा कोई व्यक्तिगत संबंध या सम्पर्क नहीं है. ना ही उन्होंने मेरी कोई रचना छापकर मुझे उपकृत किया है. ना ही कोई रचना छपवाने का विचार है . अगर छपास का ऐसा शौक होता तो दिल्ली की उन पत्रिकाओं/पत्रों के स्वनामधन्य संपादकों से मेरी इतनी मेल-मुलाकात और परिचय तो है ही , जहां लिखकर और छपकर कुछ ब्लॉगरों के  पांव  टेढ़े-टेढ़े पड़ रहे हैं. 

 मैं गत कई वर्षों से ‘शेष’ का नियमित पाठक हूं . उसी के माध्यम से हसन जमाल को जानता-समझता हूं . मुझे यह भी नहीं पता कि हसन जमाल नेट के इस विवाद से परिचित हैं भी या नहीं. यह तो हमारे समय के एक महत्वपूर्ण सम्पादक के प्रति प्रदर्शित मूढताजनित उपहास की घटना पर एक पाठक का हस्तक्षेप था और उसे  उतना भर ही समझना चाहिए.

मसिजीवी ने चेतावनी दी है कि वे और अधिक मज़बूत किले पर चढ़कर हमला बोलेंगे. सामंती संस्कार इसी तरह बाहर आते हैं. हसन जमाल को ‘किलेदार’ कहते-कहते मसिजीवी खुद अपनी ‘किलेबंदी’ में जुट गए. किसी भी तरह के समर  में उनका स्वागत है. मैं बिना किसी  किलेबंदी के ऐसे ही उनसे मिलूंगा.

 अपनी पोस्ट के एकदम अंत में “…भाषा इससे भी ज्‍यादा अश्‍लील होगी”  कह कर मसिजीवी ने अश्लील भाषा के  प्रयोग  की भी धमकी दी है. मुझे कोई आश्चर्य नहीं है मसिजीवी जी . जब आपके पास तर्क नहीं होंगे तो आपको अश्लीलता के उस स्तर पर भी उतरना ही होगा .

बहरहाल मेरे पास तर्क हैं और उन तर्कों के अनुकूल भाषा है . इसलिए मुझे ऐसा करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. मैंने सब कुछ किया है बस यही नहीं किया . और करूंगा तो पृथ्वी उलट-पुलट हो जाएगी.  इसलिए फ़ुरसतिया जी की प्रिय पुस्तक ‘राग दरबारी’ की भाषा में यह हमेशा याद रखना कि  जो   ‘आग खाओगे तो अंगार हगोगे’ .

प्रमोद भाई ने अत्यंत औदात्यपूर्ण सलाह देते हुए हम सब की ओर से हसन साहब को एक माफ़ीनामा भेजने का प्रस्ताव रखा है . इधर मसिजीवी अब भी हसन साहब के  तर्कों को ‘फूहड़’ कह कर अपनी युवकोचित(?) फूहड़ता पर अड़े हुए  हैं . ऐसे में क्या उचित होगा? नेट पर बैठे नारद समाज के विद्वज्जन कृपया अपनी राय से अवगत कराएं .

 

                                    *************

 

Advertisements

13 Responses to “हसन जमाल और ….”

  1. धुरविरोधी Says:

    समकाल भाई आप भी तो विचार और व्यक्तिगत की सीमा रेखा की भंकस कर रहे हैं!
    जिन मुद्दों पर आप मसिजीवी जी का विरोध कर रहे हैं, क्या आपका लिखा उन सब पर खरा उतरता है?
    मसिजीवी जी का परिवार उनका व्यक्तिगत मामला है. क्या इसे उछालना उचित है ?
    “स्त्रियों के सशक्तीकरण का ऐसा त्वरित उदाहरण इतिहास में विरल ही होगा जहां कोई स्त्री फ़रवरी07 में ब्लॉग लिखना शुरु करे और मार्च07 में, यानी एक माह के भीतर उसका सशक्तीकरण हो जाए और वह चिट्ठा-चर्चा के दल में शामिल हो जाए और पहली अप्रैल को इस सशक्तीकरण के फ़ल भी मिलने लगें . इतने ही कम समय में,इतने ही वेग से और इसी प्रक्रिया से नोटपैड जी का सशक्तीकरण हुआ ”
    आपतो नोटपैड जी की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह के साथ साथ नारद संचालक मंडल पर भी प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं.

    मैं आपकी बात का विरोध इसलियेकर रहा हूं कि आपने नेट पर बैठे नारद समाज के विद्वज्जन से अपनी राय मांगी है. भले ही आप मुझे विद्वज्जन न समझें, राय तो हाजिर ही है जनाब.और मेरा तो काम ही गलत बात का विरोध करना है.

    (भाई धुरविरोधी जी,
    जो आपको लगा है वह ठीक ही लगा होगा . आप वरिष्ठ चिट्ठाकार हैं, क्योंकर गलत बात कहेंगे . हां! किसी की योग्यता पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया है . नारद पर प्रश्नचिह्न लगाने का तो कोई सवाल ही नहीं है. उसे हमारा ‘अनकन्डीशनल सपोर्ट’ है . हमेशा .
    नहीं! आप विद्वज्जनों में शामिल हैं . बिल्कुल शामिल हैं . गलत बात का विरोध करते रहें .
    इसी आकांक्षा के साथ,
    सादर,
    आपका
    चौपटस्वामी )

  2. kakesh Says:

    मेरे विचार से हमको व्यक्तिगत टिप्पणीयोँ से बचना चाहिये और इस तरह का व्यवहार दोनों पक्षोँ की ओर से लाजमी है. यह परम्परा सम्पूर्ण हिन्दी चिट्ठा जगत को गर्त की ओर ले जायेगी और ये दुखमय होगा.

    बाँकी आप स्वयँ समझदार हैँ.

    ( हां ! काकेश भाई!, यह दुखमय तो है . अतः संयम ज़रूरी है . पर यह चेन रिएक्शन के तहत होता है . जैसा कि सृजन शिल्पी ने लिखा है .
    पर ऐसा न हो तो अच्छा है . — चौपटस्वामी )

  3. प्रमोद सिंह Says:

    चौपट स्‍वामी जी, ऊपर दो बार अपने नाम के ज़ि‍क्र से यूं भी आपके पाले में खड़ा होने और इसके और उसके खिलाफ़ दिखने का खतरा हो गया है. हसन जमाल साहब को इस समूचे प्रकरण से कैसी, कितनी ठेस पहुंची है, इसका भी मुझे ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं. लेकिन अगर वह दुखी हुए हैं, तो मुझे अभी भी लगता है कि जिस भी सूरत में संभव हो उन तक यह बात कन्‍वे होनी चाहिये कि इस मूखर्तापूर्ण फजीहत में वे अकेले नहीं खड़े हैं, और सवा सौ की इस भीड़ में ऐसे लोग हैं जिनकी सम्‍वेदना उनके साथ है, और उनके कुछ तर्कों से सहमति न हो तो काफी सारे तर्कों से सहमति है भी. रही बात बाबू मसिजीवी जी व उनकी लिखाई व तथाकथित ‘पारिवारिक’ खेमेबंदी की, तो हमें लगता है भाई साहब, हम सभी टूटे पायों पर खड़े लोकतंत्र को जीने के अभ्‍यासी हैं. कभी उसमें कुछ बुरा होता है. कभी बहुत’बहुत बुरा होता है. क्‍या किया जाए ऐसा ही लोकतंत्र हमारे हिस्‍से आया है. चाहे किसी के अपने ब्‍लॉग पर हो, या फिर चिट्ठा चर्चा में, आदमी दुरुस्‍त लेखन नहीं करेगा तो उसे पढ़नेवाले भी एक सीमा तक ही भाव देंगे. इससे ज्‍यादा उस पर ऊर्जा खरचना, मेरी समझ से, उक्‍त लेखन का नहीं आपकी ऊर्जा का अपव्‍यय है. मन इतना कड़वा न करें. बच्‍चे हैं, बच्‍चों को ठुमका लगाने दें. आपके जोर-जोर से बरजने से यहां किसी के मूल विचार बदलने नहीं वाले. जिसको तकलीफ पहुंची है हम उसकी ज्‍यादा चिंता करें.

    ( प्रिय प्रमोद भाई,
    लगता है मैंने अनचाहे आपको विषम स्थिति में डाल दिया . आप किसी के पक्ष या खिलाफ़ में नहीं हो सकते . मैं आपको अपने खिलाफ़ कभी नहीं समझूंगा . आप तो वही कहते रहे हैं जो आपको ठीक लगता है और वही कहना भी चाहिए . क्या कहूं! संवेदना बची है तो सब बचा है . आपकी बात समझ रहा हूं . हम ऐसे ही समय में रहने को अभिशप्त हैं . जितना अंतर कर और रख सकते हैं उतना रखते-करते हुए . ऊर्जा के अपव्यय के संबंध में आपके विचार ध्यान रखने योग्य हैं . बच्चे ठुमका लगाएं कोई दिक्कत नहीं है . हम भी प्रमुदित होंगे . बस किसी बुज़ुर्ग की खोपड़ी पर ठोल न लगाएं .

    बाकी तो फिर ‘मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना’ .

    सादर आपका

    चौपटस्वामी )

  4. अभय तिवारी Says:

    मेरी पहली बात मसिजीवी से है.. भाई आप जो भी करें जो भी लिखें.. एक बार माथा ठण्डा कर लें.. और लेट कर सोचें.. फिर लिखें.. मुहम्मद साहब ने एक बड़ी प्यारी बात कही है.. कि अगर किसी को गुस्सा आये और अगर वह खड़ा है तो बैठ जाय और फिर भी गुस्सा ना जाय तो लेट जाय..
    दूसरी बात स्वामी जी से.. आप एक बार अपने विश्लेषण पर पुनर्विचार करें.. क्या आपका विश्लेषण अतिरेक में इकतरफ़ा नहीं हो गया.. और हो सके तो पश्चलेख छापें..

    तीसरी बात जमाल साब से.. हमें माफ़ कर दें.. हम से गलती हुई है..

    ( प्रिय अभय भाई,
    पश्चलेख लिखूं या मसिजीवी जी की टिप्पणी पर मेरी प्रतिक्रिया को ही पश्चलेख मान लेंगे ? आप कह रहे हैं तो बात में कुछ तो सच्चाई होगी ही .
    — चौपटस्वामी )

  5. अफ़लातून Says:

    चौपटस्वामीजी ,
    हल्के-फुल्के लगातार हल्लुक होते रहेंगे । चिट्ठेकारी टिकेगी , चिट्ठेबाजी उड़ जाएगी । विदेशी धन लेने वाली संस्थाओं और बौद्धिक साम्राज्यवाद से उनके सम्बन्ध पर चर्चा की जमीन तैयार हो गयी है,शुक्रिया ।

    *******

    (भाई अफ़लातून जी,
    आपने बहुत सही लिखा है कि चिट्ठेकारी टिकेगी , चिट्ठेबाज़ी उड़ जाएगी . विदेशी धन का असर इस देश के युवाओं के मन पर दिखने लगा है . इस पर चर्चा होनी चाहिए .
    सादर,
    चौपटस्वामी )

  6. arun Says:

    लिखने को बहुत कुछ है अगर लिखने पे आते
    हमे अभि यही रहना है वर्ना आपसे आभार जताते
    खुद को बताते है सागर,हैन्ड पम्प का नही है दम
    देख रहे है आज तमाशा,किनारे से हम

  7. सृजन शिल्पी Says:

    चिट्ठा जगत में विचार-विश्लेषण और बहस की प्रक्रिया के दौरान व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार से यथासंभव बचने की कोशिश की जाए – इस आशय के प्रस्ताव का मुखर रूप से विरोध करने वालों में मसिजीवी अग्रणी रहे हैं। वह इसे चिट्ठाकारी के मिजाज का अंग मानते हैं और इसे दस्तूर की तरह निभाने का यत्न भी करते रहे हैं। जाहिर है कि वह अकेले ऐसे नहीं हैं, कुछ और साथी भी जब-तब हद की रेखा पार करते रहे हैं।

    जिस तरह कांटे को निकालने के लिए कांटे का इस्तेमाल और जहर के असर के शमन के लिए जहर का इस्तेमाल करना पड़ता है, उसी तरह का इस्तेमाल हिन्दी चिट्ठाकारी में भी कभी-कभी करना अपरिहार्य हो जाता है। लेकिन जैसा कि प्रमोद जी कहते हैं कि “आपके जोर-जोर से बरजने से यहां किसी के मूल विचार बदलने नहीं वाले”, यह बात कई साथियों के लिए वाकई सही है।

  8. masijeevi Says:

    किनारे खड़े नहीं थे,…ऊह तो कानपुर में थे इसलिए खबर मिलने के बाद भी मुआफी उआफी मांग सकने की गुंजाइश नहीं थी। नेट सहजता से उपलब्‍ध नहीं था।

    तो सर चौपटसुआमी जी, काहे टटके के मसिजीवी, कालिखजीवी, विध्‍नजीवी को भाव देते हैं, अरे बरसात के मेंढक हैं, टर्राएंगे ही फिर दम नहीं होगा तो चुप हो जाएंगे। आपने नाहक ही इतनी वयस्‍क समीक्षाई ऊर्जा इन नामालूम शख्सियत के लिए जाया की, और जब आप इतना श्रम कर रहे थे तब न जाने कितने लोग अपने चिट्ठे में वर्तनी की गलतियॉं कर बैठे, पुल्लिंग के साथ ईकारान्‍त विशेषण लगा बैठे, रदीफ-कादिए की गलतियॉं कर बैठे उन्‍हें देखें।
    इतने पहुँचे लोगों को जो इतने पहुँचे लागों के इतने निकट हों, इन लोगों के मुँह लगना नहीं चाहिए। मटिआइए इन्‍हें।

    आप नाहक ही इन्‍हें ‘बड़े कलेजे’ (फो ग्रा) का घोषित कर रहे हैं और जैसा ये कह रहे थे कि आपकी भाषा अश्‍लील हो जाएगी, देखो आपने कर दिखाया।

    हम फिर भी कहते हैं छोडि़ए मटिआइए….बाकि दिल न भरा हो तो उनको ईमेल कर और गलिया लीजिए काहे अपने चिट्ठे को और गंधा देने पर तुले हैं, आखिर आदमी की पहचान यहॉं तो उसकी भाषा से ही होगी।

    ***********

    ( प्रिय भाई मसिजीवी,

    हसन जमाल साहब के प्रति अपने रुख में आप थोड़े उदार दिख रहे हैं . यह अच्छी बात है . गलतियां हम सब करते हैं . पर मान लेने या खेद व्यक्त करने से कोई छोटा नहीं हो जाता . बल्कि कद ऊंचा होता है. हां! आपने ठीक इशारा किया है . गलतियां देखता-दिखाता रहा हूं . आपको नागवार गुज़रा हो तो कहिएगा, बंद कर दूंगा . बेहद सामान्य आदमी हैं हम . किसी की निकटता से कोई बड़ा नहीं होता . जो बड़ा या छोटा होता है, वह अपने ही कारण . झूठ नहीं बोलूंगा . ऊर्जा तो लगती है पर आप इतने नामालूम भी नहीं हैं . भाई आपके चिट्ठे के जरिए आपको जानते हैं हम . आपने भी थोड़ा अहसास किया . लो हमने भी झगड़ा मटिया दिया .

    पर आप जो वहां कह रहे थे भाषा के बारे में , अब यहां कुछ और ही कह रहे हैं . एक ओर जब मटियाने को कह रहे है तो फिर प्रपंच काहे कर रहे हैं.अश्लील भाषा की धमकी आपने दी थी . हमने तो अपनी समझ के हिसाब से कुछ भी अश्लील नहीं कहा . हम किस लायक हैं जो कुछ कर दिखाएंगे . यह तो ‘तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा’ के भाव से किया था . फिर भी यदि पंचों को लगता हो तो हम भूल सुधार के लिए भी तैयार हैं. रही बात गंधने-गंधाने की तो अपनी भाषा-शैली और स्वर की चिंता कीजिए . हम अपनी चिंता कर लेंगे . तथापि सुझाव और हितचिंता के लिए आभार!

    दिल में ऐसा कुछ नहीं है . पढिए-लिखिए और मौज करिए . हां! बड़े-बुज़ुर्गों के बारे में थोड़ा सोच-समझ कर बोलिए . हम जो काम आज कर रहे हैं उसमें उन्होंने एक उम्र दी है . उनकी गलत बात का विरोध करते समय भी हमें उनके योगदान को नहीं भूलना चाहिए . कृतज्ञता का थोड़ा-बहुत अहसास ज़रूरी है .

    हां! थोड़े सुधार के साथ आपकी इस बात से सहमत हूं कि आदमी की पहचान उसकी भाषा से होती है और होगी. खाली यहां या वहां नहीं बल्कि हर जगह .

    फिर भी यदि किसी बात से आपको बहुत ठेस पहुंची हो तो खेद व्यक्त करने में भी मुझे कोई संकोच नहीं होगा . ई-मेल क्यों भाई . हम तो जो कुछ कह रहे हैं सबके सामने कह रहे हैं .

    स्नेह सहित,

    आपका

    चौपटस्वामी

  9. sujata Says:

    पहले तो कुछ नही लिखना चाहती थी पर आपकी हर टिप्पणी पर दी गयी प्रतिक्रिया देख लगा आपका चित्त शांत है ।
    1. चिट्टःआचर्चा करके मेरा सशक्तिकरण हुआ है ? यह बात हास्यस्पद है । आप को भी निमंत्रण मिला था चर्चा करने का । आप नही करते तो क्या किया जाए ।
    2. मै चर्चा किए बिना , ब्लॉग बनाने से पहले भी सशक्त ही थी । ब्लॉगिंग कर सकने वाली हर स्त्री सशक्त है चाहे बेजी हो ,प्रत्यक्षा, घुघुती-बसूती या मान्या हो या नीलिमा । वे चर्चा क्यो नही कर्ती , यह मेरी रुचि का प्रश्न तो नही पर आप्ने मुझमे ज़्यादा रुचि दिखा दी है । क्या कहना चाहते है आप ?
    3. हसन जमाल पर मैने कोई बहस- तिप्पणी नही की , तो इस सारे मुआमले मे मसिजीवी के साथ मुझे और नीलिमा को आपने अनावश्यक क्यो घसीटा ? रस लेने के लिए ?किसी पुरुष के परिवार की स्त्रियो पर हमला करना खुन्दक निकालने का सबसे घटिया तरीका है । मै इसे अश्लील ,अभद्र मानती हूँ । हाँ यदि मैने हसन जी के बारे मे कुछ कहा होता तो आप मुझ पर भी प्रश्न लगाते ।
    4. आपने और सृजन जी ने कहा – यह तो चेन रिएक्शन है – माने मसिजीवी हमला बोलेंगे तो जवाबी हमला होगा ही -जो दुखद भी है ।
    मुझे बताया जाए मसिजीवी ने हसन जी के , आपके या सृजन जी के परिवार को लेकर कहँ टिप्पणी की है या पूरी पोस्ट लिखी है ।
    5. और फिर सृजन जी आप से भी मेरी कभी कोई बात -सम्वाद नही हुआ । क्या आप भी चौपट जी की सोच में शामिल है । यदि नही जनते कि मसिजीवी की मै साली हू तो क्या आप लोग मुझे अनावश्यक बीच मे लाते ?यह देखिये मसिजीवी के एक लेख की टिप्पणियो में मेरा अनावश्यक ज़िक्र-Anonymous said…
    समीर जी ,सही राय है अब मीटिंग कर ही लो नोट पैड के साथ

    6:50 AM

    मेरा ई पन्ना said…
    anonymous jee
    नोटपैड की बडी याद रखते हो ?
    क्या चक्कर है?

    9:26 AM

    सूदखोर said…
    चह है कि साथ मे नोट पैड होगी तो दोनों का दिल बहला रहेगा। 🙂
    .

    10:15 PM

    6 क्या मै इस सोच को आप सब सज्जनों की प्रतिनिधि सोच मानूँ ?

    ****************

    ( सुजाता जी,

    मन शांत ही है . ऐसा अशांत पहले भी नहीं था . पर एक बुज़ुर्ग के अवांछित मान-मर्दन और उपहास से व्यथित अवश्य था . समकाल पर मैं चौपटस्वामी हूं . मुखौटा मुझे मसिजीवी जितना आज़ाद करता है कि नहीं पता नहीं पर थोड़ी-बहुत वस्तुनिष्ठता और आज़ादी तो देता ही है .

    १. यह महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है कि मुझे चर्चा का निमंत्रण मिला था या नहीं . मैं ऐसा करना चाहता हूं या नहीं , यह भी शायद इस संदर्भ में प्रासंगिक नहीं है .

    २. आपकी क्षमता पर कहां प्रश्नचिह्न लगाया है ? . शायद आपने ठीक से पढा नहीं . कृपया पुनः पढें . मैंने तो स्पष्ट लिखा है कि :
    नीलिमा और नोटपैड की क्षमता आश्वस्त करने वाली है. ये मसिजीवी की मदद के बिना भी अपनी जगह बनाने में सक्षम हैं.”
    मैं बहुत जानता नहीं आपके बारे में पर जब आप इतने विश्वास से कह रही हैं तो निश्चित रूप से आप सशक्त होंगी . चिट्ठा-चर्चा से आपको कोई माइलेज़ नहीं मिला है यह भी जब आप कह रही हैं तो सच ही कह रही होंगी . आपकी इस बात पर भी कोई ऐतराज़ नहीं है कि ‘ब्लॉगिंग करने वाली हर स्त्री स्वतंत्र है’ . आप कह रही हैं तो होगी — ज़रूर होगी . जहां तक मेरी रुचि की बात है तो पुनः आपको अपनी पोस्ट की ओर ले चलूंगा जहां लिखा है :‘ जैसे अन्य चिट्ठाकारों का जिक्र हो सकता है वैसे ही इनका भी हो सकता है ‘ . अगर रुचि की बात करेंगी तो बस मेरी उतनी-सी ही रुचि थी . न उससे कम और न ज्यादा . और उस बड़ी-सी पोस्ट में बस उतना ही ज़िक्र हुआ है जितना उस घटनाक्रम/प्रसंग को बताने के लिए आवश्यक था . दरअसल हसन जमाल पर वह उपहास और हिकारत से भरी पोस्ट लिखने और पुनः उसे जस्टीफ़ाई करने के पश्चात मेरी रुचि मसिजीवी में थी . आप तो मसिजीवी की रुचि के नाते इस कड़ी में आ जुड़ीं . बस यही कहना है .

    ३. हसन जमाल को कूपमंडूक और फूहड़ कह रहे मसिजीवी की थोड़ी-बहुत खबर ली थी . पर आपको और नीलिमा जी को तो कुछ भी अन्यथा नहीं कहा (बल्कि,आप दोनों की सामर्थ्य की तो तारीफ़ ही की है ) सिवाय इसके कि एक-साथ एक ही परिवार के तीन लोगों का शामिल होना संदेह पैदा करता है . इससे गुटबंदी पैदा होने की भी आशंका थी . आखिर हम ही लोग राजनीति में परिवारवाद को कोसते हैं . सो आप लोगों को घसीटा नहीं, आप लोग एक पैकेज़ के रूप में साथ आए थे . बल्कि मुझे तो यह ज्यादा अश्लील,अभद्र और आपकी क्षमताओं को ‘अन्डरमाइन’ करने वाला लगता है कि आप और नीलिमा जैसे समर्थ व्यक्तित्व, जिन्हें मदद की कोई दरकार नहीं है, उनके पीछे मसिजीवी बिलावजह ‘रक्षा-कवच’ और ‘सहायता-यंत्र’ लिए घूमते रहते हैं . सो यहां हम दोनों की व्याख्या में फ़र्क है . इस पर कभी फ़ुरसत से लम्बी बहस करेंगे .

    ४. एक बार फिर से पढिएगा . पहली पोस्ट पूरी की पूरी हसन जमाल पर है . मसिजीवी उसमें उतने भी नहीं हैं जितना आटे में नमक होता है . दूसरी पोस्ट मसिजीवी पर ही थी . वे उसके ‘हीरो’ थे . तो वे तो केन्द्र में होंगे ही . आपका नामोल्लेख सिर्फ़ उस पैराग्राफ में है जहां गुटबंदी और परिवारवाद की ओर संकेत है . परिवारवाद के मुद्दे पर चर्चा हो और परिवार के किसी व्यक्ति का नाम न आए ऐसा सम्भव नहीं दिखता . यह वैसे ही है जैसे कहा जाए कि स्त्रियों के भ्रष्टाचार पर चर्चा न करना वरना तुम्हें स्त्री-विरोधी मान लिया जाएगा . हां अभद्र और अश्लील टिप्पणी नहीं होनी चाहिए . जहां तक चेन रिएक्शन की बात है . वह बुरा है,पर होता है . इस यथार्थ को आप और मसिजीवी जैसे यथार्थवादियों से बेहतर भला और कौन समझेगा .

    ५. सृजन शिल्पी की बात सृजन शिल्पी से कीजिएगा . मैं उनका प्रवक्ता नहीं हूं .

    ६. ये anonymous jee ,समीर जी , मेरा ई-पन्ना और सूदखोर कौन हैं और आपसे और मसिजीवी जी से क्या चाहते हैं, मैं नहीं जानता . उनसे मेरा किसी किस्म का कोई वास्ता नहीं है .

    ७. आप मुझे सज्जन या दुर्जन जो भी मानें , पर इस सोच का प्रतिनिधि कतई न मानें बस इतनी गुज़ारिश है .

    आपकी बात का संयत और ईमानदार जवाब देने का यथासंभव प्रयास किया है . तथापि यदि किसी बात से मन को कष्ट पहुंचा हो तो खेद प्रकट करता हूं .

    शुभकामनाओं सहित,

    चौपटस्वामी )

  10. फुरसतिया » कानपुर में ब्लागर मिलन Says:

    […] आज जब इस पोस्ट को दुबारा पढ़ा तो मुझे अफसोस हुआ और […]

  11. arun Says:

    अब हम का बॊले इहा तो झगडा ही समाप्त हो गया हम तो सोचते थे कि हम समझौता करायेगे और कुछ पार्टी वार्टी भी मिलेगी

  12. सृजन शिल्पी Says:

    @ सुजाता जी,

    4. आपने और सृजन जी ने कहा – यह तो चेन रिएक्शन है – माने मसिजीवी हमला बोलेंगे तो जवाबी हमला होगा ही -जो दुखद भी है ।
    मुझे बताया जाए मसिजीवी ने हसन जी के , आपके या सृजन जी के परिवार को लेकर कहँ टिप्पणी की है या पूरी पोस्ट लिखी है ।

    मैं गड़े मुर्दे उखाड़ना नहीं चाहता था। यह सवाल आपकी बजाय मसिजीवी पूछते तो मेरा उन्हें सीधा जवाब देना सही रहता।

    मैंने अपनी पहले वाली टिप्पणी में आपका कोई जिक्र नहीं किया है, इसलिए आप मुझसे यह सवाल क्यों कर रही हैं, यह मैं समझ नहीं पाया। ख़ैर, मेरे परिवार के संबंध में किसी को टिप्पणी करने की कोई गुंजाइश इसलिए भी नहीं है क्योंकि मेरे परिवार में मेरे अलावा कोई चिट्ठाकारी में सक्रिय नहीं है। वैसे, एक परिवार में कई लोगों का चिट्ठाकारी में सक्रिय होना कोई बुरी बात नहीं, बल्कि कई दृष्टिकोणों से बहुत अच्छी बात है। और, यही बात जब पहली बार मैंने ब्लॉगर मीट पर अपनी रिपोर्ट वाली पोस्ट में अत्यंत प्रसन्नता और निर्दोष भाव से उल्लेख की थी कि उसमें मसिजीवी जी सपरिवार शामिल हुए थे तो मसिजीवी जी ने उस पोस्ट पर सरेआम टिप्पणी करके वह बात लिखने पर मुझे मानहानि का मुकदमा झेलने के लिए तैयार रहने की धमकी दी थी। उस पोस्ट पर मसिजीवी का यह टिप्पणी करने का आखिर क्या आशय था कि नीलिमा के
    साथ उनके जैसे ‘औघड़’ का नाम पति के रूप में जोड़ना उन्हें तो बुरा नहीं लगेगा, लेकिन नीलिमा को इतना बुरा जरूर लग सकता है कि वह मेरे ऊपर मुकदमा करने के लिए सोच सकती हैं? क्या वह मुझे आपकी दीदी के साथ किसी गैर-मर्द के रूप में अपना नाम जोड़ने के अपराध के लिए धमकी दे रहे थे? आप पूछिए अपने जीजाश्री से।

    मैंने नीलिमा जी और आपकी मर्यादा एवं सम्मान के विरुद्ध कभी कुछ नहीं लिखा है। नीलिमा जी तो ख़ैर वैसे भी मसिजीवी जी की खुराफातों में शामिल नहीं रही हैं, लेकिन शायद आप किसी हद तक शामिल जरूर रही हैं। फिर भी मैंने जब भी टिप्पणी की, उन मुखौटों के संबंध में की जिन्हें समय-समय पर धारण करके मेरे संबंध में टिप्पणियां की गईं, न कि आपके संबंध में, जिनसे मैं प्रत्यक्ष मिल भी चुका हूं। किसी भी महिला चिट्ठाकार के खिलाफ अप्रिय टिप्पणी करने की हिम्मत भला मैं कैसे कर सकता हूं! 🙂 भले ही सौ मसिजीवियों और हजार अविनाशों से मैं सरेआम टक्कर मोल ले लूँ, लेकिन किसी महिला चिट्ठाकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की हिमाकत करना मेरे बूते के बाहर है। 🙂 इसमें चौपटस्वामी जैसे औघड़ ही किसी हद तक समर्थ होंगे। 🙂

    मसिजीवी सैद्धांतिक तौर पर व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार को चिट्ठाकारी का स्वाभाविक अंग मानते रहे हैं और मुखौटावाद के तो वह प्रवर्तक ही हैं। लेकिन यह तो उनकी प्रतिक्रिया से जाहिर हो चुका है कि दूसरों की तरह उन्हें भी अपने ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपों पर आपत्ति होती है और मुखौटा धारण करने के संकट से भी वह परेशान हो चुके हैं। उनके साथ मेरा विरोध भी सैद्धांतिक ही रहा है और मैंने जो भी कुछ कहा है वह खुलेआम कहा है, जिस अंदाज में उन्होंने पहला वार किया है, उसी अंदाज में मैंने पलटवार किया है। वैसे भी, पहला वार मैं कभी किसी के विरुद्ध नहीं करता, लेकिन जो कोई हमला करता है उसका मुंहतोड़ उत्तर मैं जरूर देता हूं। शब्दों की इस लड़ाई से मुझे परहेज नहीं है, क्योंकि शब्दों की लड़ाई के अखाड़े में ही मुझे रोजाना घंटों गुजारने पड़ते हैं।

    5. और फिर सृजन जी आप से भी मेरी कभी कोई बात -सम्वाद नही हुआ । क्या आप भी चौपट जी की सोच में शामिल है । यदि नही जनते कि मसिजीवी की मै साली हू तो क्या आप लोग मुझे अनावश्यक बीच मे लाते ?

    जी हां, आपके साथ मेरा संवाद पिछले ब्लॉगर मीट के बाद से नहीं हुआ है। लेकिन नीलिमा जी और मसिजीवी जी के साथ संवाद अक्सर होता रहा है और आप उन्हीं से पूछिए कि चौपटस्वामी जी ने यहां जो प्रतिक्रिया व्यक्त की है उस सोच में मैं शामिल हूँ या नहीं। चौपटस्वामी जी, आप भले ही मेरे प्रवक्ता न हों, लेकिन सुजाता जी के इस सवाल पर इतना स्पष्टीकरण तो दे ही सकते हैं कि आपने अपनी पोस्ट में जो कुछ लिखा है, उस सोच में किसी भी रूप में मेरी प्रेरणा या प्रभाव शामिल नहीं है।

    लेकिन सुजाता जी, आप अपने प्यारे जीजाश्री से यह जरूर पूछिएगा कि उनकी पिछली धमकी के साथ-साथ निम्नलिखित ताज़ा धमकी का क्या आशय है-

    हम फिर वही कह रहे हैं कि ऐसे ही और इससे भी अधिक टटकी तर्कपद्धति से लेकिन अधिक मजबूत किलेबंदी से सवाल उठाए जाएंगे…भाषा इससे भी ज्‍यादा अश्‍लील होगी।

    मेरा ख्याल है कि यदि मसिजीवी जी ने यह पंक्ति न लिखी होती तो चौपटस्वामी इतने घातक प्रहार के साथ अपनी यह पोस्ट न लिखे होते, और फुरसतिया जी को भी अपनी भतीजी की शादी के व्यस्ततम और पावनतम अवसर के बीच इस तरह की अप्रिय बातों को समझने और हस्तक्षेप करने का गैर-जरूरी और स्तरहीन कार्य नहीं करना पड़ता।

  13. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI Says:

    badon badon के beech में हम क्या bole ?

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s


%d bloggers like this: