हसन जमाल के पक्ष में

शेष का ४३ वां अंक (जनवरी-मार्च २००७)  सामने है . मुखपृष्ठ पर हुसैन की एक सुंदर किंतु विचलित कर देने वाली पेन्टिंग है .

गोपीचंद नारंग की गु्ज़ारिश है . नामी उर्दू शायर और नक्काद बाकर मेहदी को खिराजे-अकीदत है. उर्दूदां ज्ञानचंद जैन की किताब ‘एक भाषा,दो लिखावट,दो अदब’ पर अलग-अलग पहलू प्रस्तुत करती दो समीक्षाएं हैं.

सीरिया के इस्लामी विद्वान मुस्तफ़ा अलसबाई का साक्षात्कार है. अफ़सानानिगार इकबाल मजीद से गुफ़्तगू है. मशहूर उपन्यासकार जोगेंदर पॉल के नाम लिखे देश-विदेश के विभिन्न साहित्यकारों के    पत्र हैं.

डॉक्टर हसन मंज़र का सफ़रनामा और यादनामा है. स्वतंत्रता-सेनानी मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली पर लिखा फ़ारूक अर्गली का लेख है , ‘इस्लाम और फ़ुकुयामा’ पर सुरेश पंडित का और ‘हिंदी पत्रकारिता में उर्दू शब्दों के गलत इस्तेमाल’ पर फ़ज़ल इमाम मल्लिक का लेख है.

परवीन शाकिर,नासिर अहमद ‘नासिर’,अहमद सुहैल और जयंत परमार की नज़्में हैं;मिराक मिर्ज़ा,तिलकराज पारस,गुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’,अताउर्रहमान ‘अता’ की गज़लें; देवेन्द्र सिंह,अनिल गंगल,शम्भु बादल आदि-आदि की कविताएं हैं; साथ में नूर मुहम्मद ‘नूर’ के दोहे हैं.

नय्यर मसूद के किस्से हैं; भवानी सिंह आदि-आदि की कहानियां हैं और कई लघु कथाएं .  अंत में उर्दू-हिंदी की कई ताज़ा किताबों पर समीक्षाएं हैं.  और हैं पाठकों और रचनाकारों के पत्र .

शेष यानी दो ज़बानों की एक किताब . एक तिमाही इंतिखाब . 

इस समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में  उर्दू में  जो कुछ बेहतरीन  रचा जा रहा है उस तक देवनागरी के माध्यम से  पहुंचने का एकमात्र रास्ता .

उर्दू में सपने देखने वाली आंखों और उर्दू में सोचने वाले मन की गहराई की थाह पाने का, हम उर्दू न जानने वाले हिंदीभाषियों का एकमात्र जरिया .

खुदा न करे कभी यह पुल टूटे . ईश्वर ऐसा दिन न दिखाए . यह एक मात्र पुल है जो बरस-दर-बरस बारहो महीने आवा-जाही के लिए खुला रहता है.  सरकारी गाडियां और बसें भले ही चलती और बंद होती रहती हों .

उर्दू का सर्वश्रेष्ठ साहित्य यहां देवनागरी में सुलभ रहता है .  पर  ‘शेष’ उर्दू के लिए उर्दू लिपि का हामी है. उर्दू के लिए देवनागरी की वकालत करने वालों को वह उर्दू का खैरख्वाह नहीं मानता . ‘शेष’ मानता है कि लिपियां ज़बानों पर थोपी नहीं जातीं . लिपियां ज़बानों की हमज़ाद होतीं है.

 हसन जमाल की बेबाकी और साफ़गोई ऐसी है कि किसी भी गलत बात को वे बर्दाश्त नहीं कर सकते . और उसे अपनी तल्ख टिप्पणियों के बाण मार कर छलनी कर देते हैं . विनम्रता ऐसी कि लगभग दो दशकों से प्रकाशित हो रही, देश की इस अनूठी पत्रिका ‘शेष’ को वे सिर्फ़ अपनी पेशकश कहते हैं .वे अपने को इसका संपादक नहीं कहते . जबकि वे हैं .  और हिंदी की किसी भी महत्वपूर्ण पत्रिका के तुर्रम खां संपादक से बड़े संपादक हैं . चूंकि वे अधिकांश सामग्री इस समूचे उपमहाद्वीप से प्रकाशित होने वाली उर्दू पत्रिकाओं से लेकर और अनुवाद करवा कर सजाते हैं सो वे बड़ी विनम्रता से लिखते हैं; तर्जुमा और तर्तीब : हसन जमाल .

पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर जैसे दूरस्थ नगर में बैठे इस सामान्य आदमी का अथक परिश्रम, अद्भुत जीवट और बेलाग ईमानदारी इस पत्रिका ‘शेष’ के पन्ने-पन्ने से प्रकट होती है . उनका अपने एकल प्रयास से ‘शेष’ जैसी पत्रिका का प्रकाशन ;  अपनी पीठ ठोकने के व्यसन और अखाड़ेबाज़ी में लिप्त दिल्ली-केन्द्रित संपादकों के लिए एक मिसाल है . 

शेष के महत्व को सरकारी अनुदान से प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं और विदेशी पैसे से फलने-फूलने वाले एन.जी.ओ.वादी उपक्रमों के बरक्स रखकर भी परखना चाहिए .

हिंदी के प्रति हसन जमाल के मन में कुछ बद्धमूल विचार हैं . बावजूद इसके कि उनके जैसे हिंदीसेवी देश में बिरले ही होंगे . हिंदी के प्रति उनकी तल्ख टिप्पणियों से कई बार मन आहत भी हुआ है . जैसे कि वे उर्दू की बुरी दशा का जिम्मेदार हिंदी को ठहराने के आदी हैं. खैर, ऐसे वे अकेले तो नहीं हैं . अब तो हिंदी इलाके की सभी भाषाओं-उप भाषाओं-बोलियों की बुरी दशा के लिए हिंदी को दोष देना फ़ैशन-सा हो गया है. या कहूं,  लिंग्विस्टिक्स का एक किस्म का स्कूल चल निकला है. पर यह बात फिर कभी. अभी तो बात हसन साहब और शेष के मुतल्लिक  .

तो कई बार हसन जमाल मन आहत करते हैं . पर उससे मन में उनके प्रति सम्मान भाव कभी कम नहीं हुआ . अगर उनके कुछ बद्धमूल विचार हैं या पूर्वग्रह हैं तो ऐसे कुछ पूर्वग्रह हमारे भी होंगे. तभी तो कुछ भी सोच-विचार करने के पहले ही हमारा मन दुख जाता है .

तो ऐसे हैं हसन जमाल और ऐसी है उनकी ‘शेष’  नाम की यह पत्रिका . बाकी अंदाज़ा तो सिर्फ़ पत्रिका को देख-पढ कर ही  हो सकता है . पर यह बात सोलह आने पक्की है कि ‘शेष’  हिंदी की अनूठी पत्रिका है — भीड़ में अलग दिखने वाली– आपको समृद्ध करने वाली . बेहतरीन सामग्री से परिपूर्ण एक अंक बीस रुपये का और सालाना  अस्सी रुपये में चार अंक .

इधर हसन जमाल साहब कुछ गलत कारणों से चर्चा में  हैं . कुछ तो हसन साहब की नया ज्ञानोदय में छपी उस पत्रनुमा टिप्पणी में था . कुछ उस पत्रिका के संपादक के व्यक्तित्व में . कुछ उस टिप्पणी पर आई टिप्पणियों में  .

और फिर इंटरनेट पर तो जैसे विवाद की लाश पर मुफ़्तखोर गिद्धों के झुंड ही मंडराने लगे . ऐसे गिद्ध भी आए जो सामान्यतः विवादों से दूर रहते आए हैं. कुछ गिद्ध उत्साह के अतिरेक में हसन साहब को चपत जमाने ‘विद फ़ैमिली’ आ गए . और हसन जमाल को एक पिछड़ा हुआ अहमक,कूपमंडूक,तरस खाने योग्य और न जाने क्या-क्या साबित करने के चक्कर में भाव-विभोर होकर तूतक-तूतिया हो गये . यानी हसन को हड़काने की खुशी में ऐसा झूम के नाचे कि घुंघरू टूट गए .

रवि भाई ने हसन जमाल को उनकी ‘अंतर्जालीय कूपमंडूकता’ के लिए फटकारते हुए और उनके लत्ते लेते हुए कहा कि ‘उनके तर्क बेहद हास्यास्पद,बचकाना और इंटरनेट के प्रति उनकी नासमझी और अज्ञानता को दर्शाते हैं’ . थोड़ी अतिरंजना और छोटी-सी तथ्यात्मक गलती के साथ सराय के रविकांत ने भी कहा कि, “Jamal saheb got a taste of his own medicine when he got furious responses from the readers of his magazine.”

और इधर  तो साइबर-योद्धाओं की एक पूरी वाहिनी चल ही पड़ी थी   एक इंटरनेट-द्रोही लेखक के आखेट के लिए. भाई लोगों ने रवि भाई के गैरज़रूरी ‘अंतर्जालीय’ शब्द को ‘डिलीट’ कर दिया और ‘कूपमंडूकता’ शब्द को ले उड़े . और फिर हसन साहब की कूपमंडूकता के  इस कृत्रिम और कल्पित राग को  प्रौद्योगिकी-उन्माद की ताल पर  कई  सुरों में  गाया गया.

 चूंकि इंटरनेट को खराब कहने का मामला लगभग   ‘ब्लैस्फ़ैमी’ — ईशनिन्दा — जैसा मामला था,  इसलिए  कुछ इंटरनेट-प्रेमियों को रवि जी की यह भर्त्सना भी एकदम नाकाफ़ी और गैरज़रूरी विनय से भरी लगी . पूर्व इलैक्ट्रिकल इंजीनियर (हालांकि अभी किन्हीं नीरिजा ने उनके इंजीनियर होने पर सवालिया निशान लगा दिया है) और अब हिंदी के पी.एच.डी. मसिजीवी तो लगभग रवि जी द्वारा की गई इस विनयपूर्ण मजम्मत से बुरी तरह असंतुष्ट दिखे .  बिज़ली के इंजीनियर हैं चाहते होंगे बिज़ली के झटके देकर हसन जमाल नाम के इस अपराधी का ऐसा उपचार कर दिया जाए  कि  फिर कभी लौटकर इंटरनेट जैसी दिव्य प्रौद्योगिकी पर  ऐसी ओछी तोहमत लगाने का आपराधिक कृत्य न कर सके .

अब मनीषा जी का लेख तो ऐसा कुछ खास था नहीं  जिसके पक्ष में आवाज़ उठाई जाए . यह मैं नहीं कह रहा हूं . बकलम रवि भाई उसमें हिंदी ब्लॉगों के बारे में सरसरी और उथली जानकारी थी . (इस बारे में मसिजीवी जी भी रवि जी से पूरी तरह एकमत हैं). तो हसन जमाल ने ऐसा क्या विस्फोटक कह दिया  यह जान लेना बहुत ज़रूरी है .

इंटरनेट तात्कालिक उद्दीपक था. हसन साहब के दुख का असली कारण था ‘भारत का असंतुलित विकास’ जो देश के हर समझदार आदमी की ज़रूरी चिंता है . उनका मुद्दा था ‘हर विकास की पुश्त में दिखता विनाश’ . वे चाहते थे कि हम यह विचार करें कि नई तकनीक हमें क्या दे रही है और बदले में हमसे क्या कीमत वसूल कर रही है.

वे चाहते थे कि हम ज्ञान और सूचना में फ़र्क करना सीखें . वे कह रहे थे कि अनावश्यक सूचनाएं भय पैदा करती हैं और इंटरनेट सूचनाओं का जंगल है. वे कह रहे थे कि तकनीकी उपकरण मानवीय ऊष्मा का विकल्प नहीं हो सकते . वे कह रहे थे कि विकास के पहिए को नहीं रोका जा सकता और इंटरनेट का चलन बढ़ेगा,पर इसके ‘ऐडिक्शन’ से बचना ज़रूरी है . वे कह रहे थे कि किसी तकनीक की अत्यधिक व बेजा प्रशंसा करने के पहले उसके घातक परिणामों को भी खयाल में रखना चाहिए . कि तकनीकी उपभोक्ता को अपना गुलाम बना लेती है. वे कह रहे थे कि जब दूर से बिना किसी प्रत्यक्ष मेल-मुलाकात के चैटिंग होगी तो चीटिंग की गुंजाइश भी होगी. 

एक बड़े-बुजुर्ग के जीवनानुभव के आधार पर वे कह रहे थे कि जो सहजता और सुविधा परम्परा में है, वह नई तकनीक में संभव नहीं दिखाई देती. वे आगाह करते  हैं कि एकदिन इंटरनेट हमारा सुख-चैन,आराम व सुकून हर लेगा . और साथ ही  यह भी कहते हैं : मैं जानता हूं,यह निराशावादी दृष्टिकोण है, लेकिन अंजाम आईने की तरह साफ़ नज़र आ रहा है .

विश्वास न हो तो पढ़कर देख लीजिए . यही सब तो कह रहे  थे वे . (मैंने नया ज्ञानोदय के फ़रवरी अंक में पढ़ा था, पर अब तो रवि जी ने जन-सामान्य की सुविधा और हिंदी के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से  इसे नेट पर भी डाल दिया है) . हसन साहब कुछ वैसी ही घरोआ बात ‘इमोशनली चार्ज्ड’ होकर कह रहे थे जैसी एक परिवार या समुदाय का बुजुर्ग कहता है समझाइस के उद्देश्य से , घर के नौजवान के भले के लिए . उसे चेताने के लिए .

 यह  एक  पारम्परिक  दृष्टिकोण है जीवन का . विकास की आधुनिक संकल्पना का एक ‘क्रिटीक’ है जिसे व्यापक संदर्भों में देखा जाना चाहिए. वैसे ही जैसे हम बहस चलाते हैं कि पानी ज्यादा ज़रूरी है या कोक .  प्राथमिक शिक्षा ज्यादा ज़रूरी है या नए-नए आईआईटी . किसानों की जान बचाना ज्यादा ज़रूरी है या नए-नए एसईज़ेड बनाना. कलम ज्यादा ज़रूरी है या की-बोर्ड. एक कच्ची बस्ती के घर में शौचालय ज्यादा ज़रूरी है या इंटरनेट कनैक्शन वाला कम्प्यूटर . 

 कि देश के अधिकांश ग्रामीण इलाकों  में जहां बिजली है भी, वह सिर्फ़ कुछ घंटे मुंह दिखा कर चली जाती है. कि लगभग अस्सी करोड़ हिंदी बोलने-बरतने वाले लोगों में कुल जमा पांच-छह सौ ब्लॉगर हैं जो इस मुगालते में  दोहरे हुए जा रहे  हैं कि हिंदी का भविष्य उन्हीं के कंधों पर टिका है और इंटरनेट देश में बहुत आमफ़हम है . कि कागज़-कलम और छपी हुई पुस्तकों के दिन गिने-चुने हैं. 

जबकि इसके बरक्स यह तथ्य देखिए कि हिंदी पठन-पाठन के इस बुरे दौर में भी हिंदी के कुछ अखबार एक करोड़ से ज्यादा बिकते हैं . कवि-कहानीकार उदय प्रकाश टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के बिज़नेस पेज के हवाले से कह रहे हैं  कि पेन की बिक्री  76 प्रतिशत बढ़ी है .

 कोई प्रौद्योगिकी किसी भाषा के उत्थान में सहायक प्रतीत हो रही  हो,  पर भाषाभाषियों के साथ उसका रिश्ता द्वैध या संदेह का बन रहा हो या प्राथमिकता के हिसाब से उसका क्रम पीछे  की ओर हो . तब क्या उसकी पड़ताल एक ज़रूरी काम नहीं है . उसके आलोचकों की शंकाओं को दूर करना हमारी जिम्मेदारी है या उन्हें अहमक ठहराकर हमारा दायित्व पूरा हो जाता है . जीतू ने ज़रूर अपनी टिप्पणी में इस ओर इशारा किया है कि हसन जमाल का ब्लॉग बनवा दिया जाए .  बाकी तो उन्हें बहस के भी नाकाबिल मान रहे हैं .

बस यही ‘प्राथमिकता का प्रश्न’ था जो हसन जमाल उठा रहे थे . बदले में उन्हें क्या मिला . रुसवाई . उनकी  कई दशकों की तपस्या को , उनकी लंबी साहित्य सेवा को समझे बगैर नेट पर बैठे हवाबाज़ों ने उन्हें तरस खाने लायक मान लिया .

हिंदी के  हित रवि रतलामी के प्रौद्योगिकीय योगदान को मैं उतना ही मान देता  हूं जितना कि ‘शेष’ के जरिए  हिंदी की समृद्धि के लिए हसन जमाल साहब को . हसन साहब के प्रौद्योगिकी-विरोधी रवैये को मैं उसी तरह लेता हूं  जैसे रवि भाई के व्यंजलों को .  मैं मानता हूं कि अपनी ‘कोर कम्पीटेंस’ के  इलाके के बाहर जाने पर आदमी के निष्पादन में वह बात नहीं रह जाती जिसके लिए वह जाना जाता है .  पर इससे उसका अपने कार्य-क्षेत्र में किया गया काम कम महत्वपूर्ण  नहीं हो जाता . उसका व्यक्तित्व   गया-गुजरा  नहीं हो उठता . अतः कोई भी फ़ैसला सुनाने के पहले कम-से-कम उतनी समझदारी बरतना ज़रूरी है जितनी सर्फ़ की खरीददारी में काम आती है .

तो चाहे हसन जमाल हों या रवि रतलामी, वे हल्के ढंग से लेने के लायक नहीं हैं . अपने-अपने क्षेत्र के दो दिग्गजों की ‘कोर कम्पीटेंस’ में यदि ‘ओवरलैपिंग’ हो रही हो तो राहचलतों को बीच में कूदने या अपने भुट्टे सेंकने की बजाय कुछ सीख लेनी चाहिए .

ऐसों को तो और भी जो प्रिंट मीडिया में छपी अपनी किसी भी बुटकन-सी रिपोर्ट को लेकर मारे उत्तेजना और खुशी के  लहालोट हो जाते हैं .

हसन जमाल हमारे समय के बड़े संपादक हैं .  उनकी बात और उसके निहितार्थ पर समझदारी और सहानुभूति से विचार होना चाहिए , तदर्थवाद के तहत दांत चियारते हुए नहीं .

                                     

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10 Responses to “हसन जमाल के पक्ष में”

  1. अफलातून Says:

    जो चिट्ठेकारी से जुडे हैं और यह मान कर चलते हैं कि स्वच्छन्दता और सुख के साधन व्यापक पैमाने पर उपलब्ध हो गये हैं उन्हे हसन जमाल साहब द्वारा की गई आलोचना से जरूर मर्चा लगेगा | हमारे साथी अपने घरों या दफ्तरों से चिट्ठेकारी करते हैं , उन साइबर कैफे में जो रचनात्मक काम आम है , उस पर गौर करने की उन्हें फुरसत है ?
    सूचना और ज्ञान को पर्यायवाची मान लेना उन लोगों की विद्वत्ता का द्योतक है जो सूचना- एकत्रीकरण मात्र से अभिभूत हैं |

  2. प्रमोद सिंह Says:

    पहले तो मैं इस बात की आपको बधाई दे लूं कि इसी बहाने जमाल साहब की शख्‍सीयत और ‘शेष’ के बारे में जानकारी हुई. बंबई में रहते हुए लीक से हटकर तो क्‍या लीकी पत्रिकाएं भी हाथ से छूटी रहती हैं. ख़ैर. मनीषा वर्सेस हसन जमाल की भनक इधर-उधर देखता रहा था लेकिन विस्‍तार में जाने की सुध नहीं हुई, क्‍योंकि असमान विकास वाले बहुत सारे तर्क जो हसन जमाल साहब के हैं, उससे मन रोज़-रोज़ वैसे भी जूझता रहता है, और तीन-चार, पांच पत्रिकाओं, अख़बार और रेडियो शो पर हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की शान में जो पुर्चियां पढ़ी जाने का यह नया ढंग चलन में हैं, उससे फूलकर कुप्‍पा होने की हमको भी अभी तक कोई वजह उसी तरह नहीं दिखी जैसे आज के हिन्‍दुस्‍तान टाईम्‍स में 2025 तक भारतीय उपभोक्‍ता के विश्‍व में पांचवे स्‍थान पर चले आने के एक सर्वेक्षण को देखकर हो रही है. क्‍योंकि थोड़े से भारतीय उपभोक्‍ता पांच नहीं पहले स्‍थान पर भी क्‍यों न पहुंच जाएं, व्‍यापक देश की प्राथमिक शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और दूसरे इंफ्रास्‍ट्रक्‍चरल सुधार जबतक दुरुस्‍त नहीं होंगे, ये सारी उड़ानें बच्‍चों के खिलौना जहाज की उड़ानें हैं. दु:खद है कि अपनी गैर-जानकारी में भाई लोगों ने एक समर्पित बुज़ुर्गवार को ज़लील किया. सार्वजनिक तौर पर उन तक कोई माफ़ीनामा भेजा जा सके, जो भेजना चाहें, जो हिन्‍दी में नेट पर लिखाई कर रहे हैं, तो आप इकट्ठा करवाइये; छोटा सा काम है, जितने लोग कर सकें, कर दिया जाए. थोड़ी ग्‍लानि का भाव घटेगा.

  3. अभय तिवारी Says:

    आप ऎस‌ा कैसे क‌र रहे हैं.. चौप‌ट स्व‌ामी न‌ाम है और विच‌ार आप स‌ँभ‌ले और सुथ‌रे दे रहे हैं..क‌हीं ऎस‌ा तो न‌हीं कि आपने चौप‌ट हो ग‌ये लोगों प‌र अप‌न‌ा स्व‌ामित्व की घोष‌ण‌ा की है..य‌ा दूस‌रों को चौप‌ट क‌र देने की तैय‌ारी है.. मुझे तो आपके इस खेल में एक ग‌ह‌रे ष‌ड्य‌न्त्र की बू आ रही है.. खैर इस‌क‌ा स्प‌ष्टीक‌रण अपेक्षित‌ है..
    भ‌ई आप जो ब‌त‌ा रहे हैं उस से तो ह‌स‌न ज‌म‌ाल ब‌ड़े ही नेक त‌बिय‌त की श‌ख्सिय‌त‌ म‌ालूम दे रहे हैं.. ह‌में तो अभी त‌क स‌म‌झ आय‌ा थ‌ा कि वो कोई प्रतिक्रिय‌ाव‌ादी किस्म की त‌ाक‌त हैं जो आगे ब‌ढ़्ते हुए स‌म‌ाज को पीछे खींच रहे हैं.. और ह‌म‌ारी बेव‌कूफी देखिये ह‌म ने एक ब‌ार भी ठीक से स‌म‌‌झ‌ने की कोशिश त‌क न‌हीं की कि हैं कौन ये ज‌म‌ाल स‌ाब .. जिन‌के ज‌म‌ाल से चक‌ाचौंध हो के लोग उन्हे कुएं में ड‌ाल देन‌ा च‌ाह‌ते हैं.. ब‌ल्कि आप लेख देख‌ने के बीच में रवि जी की स‌ाइट प‌र दौड़ के ग‌य‌ा.. उन‌क‌ा लेख प‌ढ़‌ा .. म‌सिजीवी क‌ा तू त‌क तू तक भी ब‌ांच‌ा.. फिर व‌ाप‌स आ के आप को प‌ाती लिख रह‌ा हूँ …
    ह्म्म.. तो आप क‌ा क‌ह‌न‌ा है कि ये ज‌म‌ाल स‌ाब भ‌ले हैं.. हम‌ारे बुजुर्ग हैं.. और उन्हे प‌त्थ‌र म‌ारने में ह‌म‌ने ज‌ल्द‌ब‌ाजी क‌र दी.. ?
    भ‌ई एक ब‌ार ह‌म लोगों की ब‌ातों में आ ग‌ए.. इस ब‌ार ह‌म ज़‌रा सोच स‌म‌झ के अप‌नी राय ब‌न‌ायेंगे..

  4. अनूप शुक्ला Says:

    मैंने सारे लेख पढ़े हैं। मैं लिख नहीं पाया इस बारे में लेकिन सच तो यह है कि हसन जमाल जी की प्रतिक्रिया के चक्कर में मनीषा कुलश्रेष्ठ जी का अधकचरापन छिप गया। हसन जमालजी अगर कम्प्यूटर के बारे में कुछ नहीं जानते तो भी उनकी जो सोच है उसको व्यक्त करने का उनको अधिकार है। और दुनियादारी के हिसाब से भी जो वे महसूस करते हैं उन्होंने कहा। पहले मुझे यह लगता रहा कि शायद पत्रिका वालों को इस बारे में जानकारी नहीं होगी और उन्होंने जैसा रविरतलामी ने लिखा वैसा छाप दिया होगा। लेकिन जब रवि रतलामी का पत्र देखा तो काफ़ी कुछ सामने आया। रवि रतलामी के अंश नहीं छापे गये जिसमें उन्होंने मनीषा जी के लेख के बारे में सवाल उठाये थे। एक सामान्य पत्र , संतुलित से पत्र को ह्सन जमाल के खिलाफ़ पत्र बनाया गया। पत्रिका वाले शायद अपनी नियमित लेखिका की कमियां बताना नहीं चाहते होंगे। जगह के बहाने इस पत्र को काट-छांटकर इसी मजमून के दो और पत्र छापना यह बताता है कि पत्रिका वाले हसन जमाल को तकनीकी रूप से अज्ञानी साबित करना चाहते थे।

    आपने यह पोस्ट लिखकर बहुत अच्छा काम किया बधाई!

  5. masijeevi Says:

    हम चौपट स्‍वामीजी को कहीं गंभीरता से लेते रहे हैं। पर हसन जमाल प्रकरण में वे लिखे से ज्‍यादा पढ रहे हैं।
    हमने राय अपने चिट्ठे पर लिख दी है
    http://masijeevi.blogspot.com/2007/05/blog-post_04.html
    बाकी हमें आपकी भाषा बेहद आपत्तिजनक लगी है, किंतु चूंकि ये आपका चिट्ठा है, आप जितना चाहें इसे साफ या गैर साफ रखें, हम कर ही क्‍या सकते हैं।

  6. सृजन शिल्पी Says:

    यह सच है कि टेक्नोलॉजी की रफ्तार को रोका नहीं जा सकता और उसके विकास की दिशा को भी नियंत्रित कर पाना बहुत कठिन है। लेकिन यह निर्भर करता है कि इस बात पर कि उसका उपयोग करने वालों की सोच और मानसिकता क्या है। हर टेक्नोलॉजी के अच्छे और बुरे इस्तेमाल किए जा सकते हैं और हमेशा से होते भी रहे हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में प्रसिद्ध विचारक एल्डस हक्सले ने टेलीविजन के कारण मानव सभ्यता पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में टिप्पणी की थी:

    The most alarming dangers are those which menace it (civilization) from within, that threaten the mind rather than the body and estate of contemporary man.

    Countless audiences soak passively in the tepid bath of nonsense. No mental effort is demanded of them, no participation; they need only sit and keep their eyes open.

    टेलीविज़न और इंटरनेट ने सूचना और मनोरंजन के जनसंचार का एक अभूतपूर्व माध्यम मानव सभ्यता को अवश्य प्रदान किया है। लेकिन यह टेक्नोलॉजी ऐसी है जिसमें माध्यम संदेश या कथ्य से बड़ा और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। मार्शल मैक्लुहान ने अनायास ही नहीं कहा था, “Medium is the message.”
    कोई माने या न माने लेकिन यह एक हक़ीक़त है कि जनसंचार के ये नए माध्यम व्यक्ति या समाज को नियंत्रित करने लगे हैं, जबकि वास्तव में होना उल्टा चाहिए था। टेलीविज़न और कंप्यूटर के रेडिएशन से आँखों पर पड़ने वाले असर, नींद पर होने वाले असर, स्मरण शक्ति एवं अन्य तरह की मानसिक क्षमताओं पर पड़ने वाले असर तथा कुल मिलाकर समग्र स्वास्थ्य पर होने वाले असर का शोधपरक वैज्ञानिक अध्ययन किए जाने की आवश्यकता भी है। लेकिन जो बात अधिक महत्वपूर्ण है वह यह कि हम इन संचार माध्यमों से हासिल कितना कर रहे हैं और कितना खो रहे हैं। महात्मा गांधी ने पूरी जिंदगी में केवल एक फिल्म देखी थी, ‘राम-राज्य’ और वह भी उन्होंने आधी ही देखी थी, लेकिन उस आधी फिल्म को देखने का असर इतना गहरा पड़ा कि उनकी सोच और कर्म में क्रांतिकारी परिवर्तन आ गए। उन्होंने बचपन में एक नाटक देखा, ‘सत्य हरिश्चंद्र’ और उसके असर ने उनके पूरे चरित्र की बुनियाद रख दी।

    हालांकि टेलीविज़न पर भी आपके पास चैनल बदलने की सुविधा है और इंटरनेट पर भी आपको मनचाही सामग्री देखने-पढ़ने-सुनने का पूरा विकल्प मौजूद है। लेकिन कितने लोग हैं जो टेलीविज़न और इंटरनेट के सामने बैठने के बाद समय और जीवन की प्राथमिकताओं का विवेकपूर्ण ढंग से ध्यान रख पाते हैं? ईमानदारी से यदि हम इस पर विचार करें तो पाएंगे कि कहीं न कहीं हमने अपने स्वास्थ्य, पारिवारिक-सामाजिक संबंधों की सहज आत्मीयता और जीवन की अन्य प्राथमिकताओं में कुछ न कुछ ऐसी कटौती जरूर की है टेलीविज़न और इंटरनेट के लिए, जो हमें कभी-न-कभी खलेगी, मन को कचोटेगी। हसन जमाल साहब ने तस्वीर का दूसरा पहलू भर दिखाया है। वह उतना ही नितांत एकांगी दृष्टिकोण है जितना कि तकनीकीवादी दृष्टिकोण वाले हमारे साथियों की प्रतिक्रिया। हर व्यक्ति का व्यक्तिगत अनुभव अलग-अलग हो सकता है। रवि जी अपने बारे में बताते रहे हैं कि वे ऑफलाइनजीवी व्यक्ति हैं, इसलिए संभव है कि वह जरूरत भर के लिए ही इंटरनेट का नियंत्रित उपयोग करते हों और यह उनपर हावी नहीं होता होगा या उन्होंने उसपर नियंत्रण का अभ्यास कर लिया होगा, लेकिन ज्यादातर इंटरनेट प्रयोक्ताओं का अनुभव भिन्न होता है। लोग पहले नकारात्मक इस्तेमाल ज्यादा करते हैं और जब धीरे-धीरे ऊब होने लगती है तब वे सकारात्मक और नियंत्रित इस्तेमाल करते हैं।

    कुल मिलाकर, मेरे लिए समय का सदुपयोग और स्वस्थ चिंतन का माहौल अधिक महत्वपूर्ण है बनिस्पत टेलीविजन या इंटरनेट पर संचार की सुविधा से। फिर भी, इंटरनेट में कुछ ऐसी खूबियाँ हैं जिनकी टेलीविज़न में गुंजाइश बहुत कम थी। पहला, यह कि यह इंटरेक्टिव है और संचार और अभिव्यक्ति के साधन को लोकतांत्रिक बनाता है। और दूसरा, यह कि इसमें सकारात्मक बदलाव ला सकने की असीम संभावना निहित है। इसकी पहुंच कहीं अधिक गहरी है और इसका असर अधिक स्थायी है।

    साधनों, संसाधनों और सुविधाओं की विषमता हमारे समाज और देश की हक़ीक़त है, लेकिन इंटरनेट आने वाले समय में इस विषमता को दूर करने में काफी हद तक सहायक हो सकता है। लेकिन ध्यान रहे कि हमें संदेश को अधिक महत्वपूर्ण बनाना होगा, माध्यम से कहीं अधिक महत्वपूर्ण।

    आपका हस्तक्षेप बहुत सार्थक रहा। इसकी जरूरत थी।

  7. डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद. Says:

    लुत्फे मय तुझे क्या कहूँ ज़ाहिद
    हाय कमबख्त तू ने कभी पी ही नहीं.
    ज़ाहिद हसन जमाल साहब का भी कुछ कुछ यही हाल है.लेकिन उनकी तकलीफ कुछ अलग है.अब संपादकों का जादू टूट रहा है.अपने गिरोह के रचनाकारों की रचना प्रकाशित करना,फिर घिघियाना कुछ सदस्य बनाओ पत्रिका को जीवित रखो और लोगों की आदत मुफ्त में पढ़ने की.लायब्रेरी के जमाने लद गये साहब.एक और बात नेट के लिए दिमाग और धन की आवश्यकता होती है.ये लोग मटके की जगह फ्रिज, पैदल की जगह वाहन, नंग धड़ंग खुले में पड़े रहने की जगह पंखे का इस्तेमाल करेंगे पर इन्टर नेट का रोना रोयेंगे.खास बात तो यह है रवीजी इन सब संपादकों का जनाज़ा इनटरनेट ने बड़े धूम से निकाल दिया है यह उसी का रोना है अब रचनाकार स्वतंत्र है अपने बलॉग के माध्यम से वह खुद प्रकाशक है. उसे धड़ल्ले से पाठक मिल ही नहीं रहे अपनी प्रतिक्रिया भी तुरंत दे रहे हैं.जिस में शक्ति होगी वे टिकेंगें बाकी बह जायेंगे.लोगों की गरीबी की आड़ में अपनी खिचड़ी पकाना अब ढकोसला मात्र है.हसन जमाल का खेल भी वही है.
    डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.
    subhash_bhadauria@yahoo.com

    (डॉक्टर साहब आप टिप्पणी मुझे भेज रहे हैं और सम्बोधित रवि भाई को कर रहे हैं . क्या माज़रा है? गज़लों का थोड़ा रदीफ़-काफ़िया ठीक कीजिए तब हसन जमाल भी आपको छापेंगे . — चौपटस्वामी )

  8. श्रीश शर्मा Says:

    भईया सब ने जमाल साहब की अंतर्जालीय कूपमंडूकता पर ही सवाल उठाया, उन पर अन्य कोई आक्षेप किसने लगाया, उनकी बाकी विद्वता पर किसने शक किया। लेकिन हम अब भी कहेंगे कि जमाल साहब को इंटरनैट की आलोचना करने से पहले कम से कम ये बला क्या है इसकी जानकारी ले लेनी चाहिए।

    (श्रीश भाई! किसी भी दृष्टिकोण की समग्रता में आलोचना होनी चाहिए, उपहास नहीं . मसिजीवी उपहास कर रहे थे. हसन जमाल हमारे समय के बड़े सम्पादक हैं . उनकी बात कुछ मायने रखती है . — चौपटस्वामी )

  9. Gyandutt Pandey Says:

    इंटर्नेट के बारे में तो मैने अपनी पीड़ा व्यक्त की है. वह अपने तरह की है – जमाल जी जैसी नहीं. पर हसन जी के व्यक्तित्व के बारे में जो धारणा बनी थी वह थी हार्डलाइनर मुस्लिम की. क्या वह सही नहीं है? हमारे हिन्दू होने में अगर कोई असहजता नहीं है उन जैसे व्यक्ति को (ऐसा है?) तो हमने भी शायद गलत सूचना पर वक्र लिखा है.
    अलग से बताइयेगा.

  10. मोबाइल का नया रिंगटोन और जलोटा जी के जालिम भजन : चिट्ठा चर्चा Says:

    […] अपन भी चल पड़े पटरी बदलने। बहरहाल अपन न हसन जमाल के पक्ष में हैं न विपक्ष में, कभी कभी बेपेंदी का […]

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