Archive for मई, 2007

कोलकाता का हिंदी रंगमंच-3

मई 31, 2007

1947 में ‘तरुण संघ’ की स्थापना के साथ कोलकाता में नवीन विषयवस्तु वाले नाटकों का प्रदर्शन प्रारंभ हुआ । क्रमश: पाश्चात्य रंगमंच के तत्वों को भी जगह मिलनी शुरू हुई । भंवरमल सिंघी, श्यामानंद जालान, सुशीला भंडारी, सु्शीला सिंघी और प्रतिभा अग्रवाल जैसे ऊर्जस्वी कलाकार कुछ नया व सार्थक करने की बेचैनी लेकर रंग परिदृश्य पर उभरे । ‘तरुण संघ’ ने विष्णु प्रभाकर, उपेंद्र नाथ अश्क, धर्मवीर भारती, जगदीशचंद्र माथुर व तरुण राय जैसे लेखकों के नाटक खेले । 1953 में राजेंद्र शर्मा द्वारा स्थापित संस्था ‘भारत भारती’ ने 1967 में खेले गए नाटक ‘डाउन ट्रेन’ के लिए इन्हें द्वितीय जनकीमंगल पुरस्कार प्राप्त हुआ ।  

 22 दिसंबर 1955 को ‘अनामिका’ की स्थापना के साथ कोलकाता के हिन्दी रंगमंच ने एक नए युग में प्रवेश किया । श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल, मन्नू भंडारी व तरुण संघ के उनके अन्य साथियों ने मिलकर इस संस्था का गठन किया । ‘अनामिका’ द्वारा प्रदर्शित कई नाटकों की अनुगूंज पूरे देश में सुनाई दी । इस संस्था ने पचास से भी अधिक नाटकों, कई एकांकियों व बाल नाटकों का मंचन किया । घर और बाहर ( रवींद्रनाथ ठाकुर के बांग्ला उपन्यास ‘घरे-बाइरे’ का प्रतिभा अग्रवाल कृत नाट्य रूपांतर), आर. जी. आनंद के ‘हम हिंदुस्तानी हैं’, विनोद रस्तोगी के ‘नया हाथ’, मोहन राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’ व ‘लहरों के राजहंस’ व बादल सरकार के नाटकों के मंचन के लिए अनामिका को खासी लोकप्रियता हासिल हुई । अधिकांश नाटकों का निर्देशन श्यामानंद जालान,विमल लाठ और डा. प्रतिभा अग्रवाल ने किया । प्रतिभा अग्रवाल ने नाटकों के अनुवाद व नाट्य रूपांतर करने की  दिशा में अत्यंत स्थायी महत्व का कार्य किया। 1964 में अनामिका ने एक नाट्य महोत्सव का आयोजन किया । उसमें देश के मशहूर लेखक, निर्देशकों व नाट्य समीक्षकों ने शिरकत की और उस अवसर पर आयोजित विचारगोष्ठियों में भाग लिया । इस नाट्य महोत्सव का उद्घाटन प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने किया था व इसमें थियेटर यूनिट, बंबई ने ‘अंधा युग’, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली ने ‘राजा ईडिपस’, अनामिका ने ‘छपते-छपते’, मूनलाइट ने ‘सीता बनवास’ व ‘रामलीला नौटंकी’, श्री आर्ट्स क्लब, दिल्ली ने ‘अंडर सेक्रेटरी’ व श्री नाट्यम, वाराणसी ने ‘गोदान’ का मंचन किया । इसी वर्ष कृष्णाचार्य के संपादन में ‘हिन्दी नाट्य  साहित्य’ का प्रकाशन हुआ । अनामिका को ‘नाट्य वार्ता’ नामक रंग पत्रिका के प्रकशन का भी श्रेय जाता है ।

  1963 से नाटकों के मंचन में सक्रिय ‘संगीत कला मंदिर’ नामक संस्था ने विभिन्न भाषाओं में पचास से अधिक प्रस्तुतियां की जिनमें ‘एक प्याला कॉफी’, ‘मृच्छकटिक’, ‘किसी एक फूल का नाम लो’, ‘एक गुलाम बीबी का’ व ‘एक और द्रोणाचार्य’ प्रमुख हैं । 1976 में इस संस्था ने मोहन राकेश को उनके नाटक ‘आधे-अधूरे’ के लिए मरणोपरांत पुरस्कृत किया ।

  अदाकार नाट्य दल को भी पचास से अधिक प्रस्तु्तियों का श्रेय है । यह दल ‘भूचाल’,’खामोश अदालत जारी है’ व ‘रिश्ते-नाते’ के उत्कृष्ट मंचन के लिए जाना जाता है । इसके निर्देशक-अभिनेता कृष्ण कुमार राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पाकर अहींद्र चौधरी से अभिनय का पाठ पढ़ने कोलकाता आए थे । अहींद्र चौधरी तब रवींद्र भारती में अभिनय कला के प्रोफेसर थे ।

  अनामिका में अधिक प्रयोगशील व ‘बोल्ड’ नाटकों के मंचन के लिए वांछित खुलेपन की गुंजाइश न पाकर श्यामानंद जालान ने 1972 में ‘पदातिक’ की स्थापना की और ‘गीधाड़े’ और ‘सखाराम बाइंडर’ जैसे नाटकों को सफलतापूर्वक खेला ।

 ‘पदातिक’ को ब्रेश्ट, मोलियर, इब्सन व सैमुअल बैकेट आदि विदेशी नाटककारों एवं मोहन राकेश, महा्श्वेता देवी,विजय तेंदुलकर, बादल सरकार, निर्मल वर्मा व जीपी देशपांडे जैसे भारतीय लेखकों के नाटकों को मंचित करने का श्रेय प्राप्त है । पदातिक ‘शुतुरमुर्ग’ ‘एवम इंद्रजीत’, ‘आधे-अधूरे’, ‘पगला घोड़ा’ व ‘सखाराम बाइंडर’ की प्रभावोत्पादक प्रस्तुतियों के लिए ख्यात है ।

 श्यामानंद जालान के अतिरिक्त विजय शर्मा और कुणाल पाथी ने पदातिक के नाटकों का निर्देशन किया है ।

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लफ़्फ़ाज़ी के खिलाफ़ एक कविता

मई 29, 2007

महत्वपूर्ण हिंदी कवि भवानीप्रसाद मिश्र अपनी कविता के  सरल-सहज शिल्प और उसमें बोल-चाल की अपनी  विशिष्ट शैली के लिए विख्यात हैं . भवानी भाई ने  देश के पढे-लिखे बौद्धिक वर्ग के छद्म को बहुत बारीकी से निरखा-परखा था . तभी तो वे कह पाए कि :

                ” रोना किसान के मज़दूर के दुखड़े को

                 शीशे में हज़ार बार देखना मुखड़े को ।”

ऐसे ही बुद्धिजीवियों की छद्म क्रांतिकारिता और उनके ‘पॉश्चर’ को उघाड़ कर सामने रखती उनकी कविता  ‘ तुम्हारा हाथ ‘  आपके समक्ष प्रस्तुत है  :

तुम्हारा हाथ

 

तुम्हारा हाथ

इतना ऊपर क्यों उठता है

बोलते वक्त

 

होश क्यों नहीं रहता तुमको

मुंह खोलते वक्त

 

आवाज़ तुम्हारी —

चीख में क्यों बदल जाती है

 

भले ही मत बोलो सच

 

मगर बनाकर

झूठ की एक फ़ेहरिश्त

 

किस्त दर किस्त मंचों से

उसे बार-बार दोहराना

अपने उन पूर्वजों का

नाम बार-बार गोहराना

जिनका तुमसे कुछ नहीं मिलता

 

तुम्हें

बहुत ज्यादा व्यक्त करता है

सीधी-सादी आंखों को

वह रक्त करता है

अपने को थोड़ा छुपाओ

 

अपनी सारी चालाकियों के साथ

इतने खुले में मत आओ

 

ऐसा क्षण आएगा

जब मज़दूर

 

‘दुनिया के मज़दूरों’  वगैरा के नारे

बर्दाश्त नहीं करेंगे

 

और तो और

ये पीढी दर पीढी

मज़दूरी और किसानी करनेवाले लोग

मज़दूरी नहीं करेंगे

काश्त नहीं करेंगे

 

मर जाएगी

तुम्हारे पाप से

धरती जो रही है

इनके बल पर श्यामला

 

इसी से कह रहे हैं हम

कि ओ भाई गरीब के हामी

अरे ओ भाई कोरे शब्दों के स्वामी

कुछ सच्चा भी कर

कुछ सच्चा भी कह

 

मत बाज़ारू बाज़ीगरों की तरह

झूठे दो-दो फुट ऊंचे

आम के पेड़ उगा

 

मत उनमें

साफ़-सुथरे एकदम नकली

तीन-तीन पाव के

आम जगा ।

 

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( परिवर्तन जिए , पृष्ठ : 54 )

हसन जमाल और ….

मई 8, 2007

आदमी गलती करता है . कई लोग तो यहां तक कहते हैं कि आदमी गलतियों का पुतला है. पर आदमी की खूबी यह है कि वह गलती का अहसास कर और उसे मान कर अपने को और भी उदात्त धरातल पर प्रतिष्ठित करने का माद्दा रखता है. पर चूंकि मनुष्य में मूर्खता को ‘मल्टीप्लाई’ करने की भी अभूतपूर्व क्षमता होती है सो अक्सर उदात्तता की बजाय मूर्खता की बहार ही दिखाई देती है.

इस छोटी-सी भूमिका के बाद पुनः हसन जमाल प्रकरण पर आता हूं . हसन जमाल की इंटरनेट-संबंधी टिप्पणी कैसी थी और  वे क्या कहना चाहते थे, यह पहले ही लिख चुका हूं सो दोहराने की ज़रूरत नहीं है.बस अपनी पोस्ट की अंतिम पंक्तियां सुलभ संदर्भ के लिए पुनः दे रहा हूं.

   ” हसन जमाल हमारे समय के बड़े संपादक हैं .  उनकी बात और उसके निहितार्थ पर समझदारी और सहानुभूति से विचार होना चाहिए , तदर्थवाद के तहत दांत चियारते हुए नहीं .”

आलोचना रवि रतलामी ने भी की थी.  और अच्छी-खासी की थी . पर उपहास नहीं किया था . मसिजीवी हसन जमाल का उपहास कर रहे थे. पोस्ट की बाकी सामग्री को  छोड़िए और उनकी पोस्ट के शीर्षक में छिपी हिकारत और  उपहास को देखिए :

Saturday, April 21, 2007

तू तक, तू तक, तू तिया….अई जमाल होए

 

 और उसके बाद पढिये पहला ही पैराग्राफ :

” जब कॉलेज में पढ़ते थे तो यह एक लोकप्रिय पंजाबी गीत था..तू तक, तू तक, तू तिया….अई जमाल होए। मुझे नहीं मालूम था आज भी नहीं मालूम कि इसका कोई अर्थ है कि नहीं। मुझे यह जोश में गाई निरर्थक ध्‍वनि ही लगता था। अब क्‍यों याद आई…जमाल से और इस निरर्थकता से।”

यानी मसिजीवी के अनुसार जमाल साहब की आलोचनात्मक टिप्पणी  एक ‘निरर्थक प्रलाप’  था . हसन साहब की आलोचना को वे दांत चियार कर प्रहसन का रूप दे रहे थे. अपनी पोस्ट के अंतिम  अनुच्छेद में वे हसन जमाल के बारे में रत्ती भर  भी जाने बिना उन्हें ‘सत्ता प्रतिष्ठानों के दुर्गों का किलेदार’ घोषित करते  हैं . विदेशी पैसे से चलने वाली संस्था में कुनबे के साथ  मलाई खा चुके और अब अच्छी खासी प्राध्यापकी कर रहे मसिजीवी तो हुए जनवादी-लोकवादी  और पुराने तपे हुए समाजवादी हसन जमाल हुए ‘सत्ता प्रतिष्ठान के किलेदार’. यह झूठ,ढोंग और बेशर्मी  से रची गई अज़ब-गज़ब  फ़ंतासी है जो स्वयं मसिजीवी के चाल-चलन और चरित्र पर अपेक्षित प्रकाश डालती है.

टैक्नोलोजी  की अपनी कोई दृष्टि  नहीं होती .मनुष्य उस पर मूल्यों का आरोपण करता है. अतः प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग की गुंजाइश बनी रहती है. इसीलिए जब जीतू आईटीसी के प्रकल्प ‘ईचौपाल’ का प्रशंसात्मक भाव से जिक्र करते हैं,अफ़लातून तुरंत प्रतिपक्ष प्रस्तुत करते हैं.

         “ई-चौपाल भारत के किसानों से बहुराष्ट्रीय कम्पनी द्वारा फसल            खरीदने की परियोजना है जिसका प्रादुर्भाव मण्डी-कानूनों को             बदल कर हुआ है। ऐसे योजना का प्रतिकार मप्र में  किसानो,           मण्डीकर्मियों और छोटे गल्ला व्यापारियों   सभी  ने किया।

यही कारण है कि आम भारतीय का पारंपरिक मन प्रौद्योगिकी को संदेह की नज़र से देखता है. प्रौद्योगिकी के घोड़े पर चढाने के पहले उसे थोड़ी-बहुत घुड़सवारी सिखानी होगी. उसके बारे में जागरूक करना होगा. उसे प्रौद्योगिकियों में  फ़र्क करना सिखाना होगा. टैक्नोलॉजी के अच्छे और बुरे  दोनों पक्षों से अवगत कराना होगा. हम इस सम्प्रभु देश के जिम्मेदार नागरिक हैं. हम कोई टेक्नोलॉजी के दलाल थोडे़ ही हैं. और वैसे भी एक आलोचक को सूली पर चढ़ाने से  तो समस्या हल होने वाली है नहीं .

अब कुछ बातें मसिजीवी और उनके जवाब पर . बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी.  तब वे व्यक्तिगत और सैद्धांतिक का प्रश्न उठाएंगे .और तब यह  प्रश्न भी  उठेगा कि विचार और व्यक्तिगत की सीमा रेखा की भंकस आखिर सबसे ज्यादा वे ही क्यों कर  करते हैं जिनके चरित्र अवसरवाद और गंदगी   में गले तक लिथड़े होते हैं.  क्या इसके पीछे कोई अपराधबोध काम करता है ?

पढ़कर कोई भी जान सकता है कि मेरी पोस्ट का केन्द्र-बिंदु हसन जमाल थे. नेट के मसिजीवी या दिल्ली के नीलाम्बुज सिंह या  झूमरी तलैया के लालकमल सिंह अगर इसमें हैं तो सिर्फ़ चलते-चलाते. यानी जितना ज़रूरी था उतने.  पर चूंकि गलती और पश्चाताप के किसी भी अहसास से परे मसिजीवी पुनः हमलावर हैं तो कुछ बातें मसिजीवी जी के अंतरजालीय (जाली नहीं) व्यक्तित्व के बारे में .

आपनी चित्र-विचित्र भाषा और कौतुक-भाव  के साथ वे हिंदी ब्लॉग-जगत के ‘गोविन्दा’ के रूप में नारद पर ठीक-ठाक से ही निभ रहे थे .  कुछ गम्भीर चिट्ठाकारों की पैनी नज़र को छोड़ दें तो उनकी उथली सूचनापरक पोस्टों का खोखलापन ढंका-मुंदा  सा था . जिसे वे कभी अपनी पीएचडी के ज़िक्र से और कभी नारीवाद  अथवा  चमत्कारवाद के चोगे में छिपाने का प्रयास करते रहते थे. पर चूंकि अब वे धमकी देने पर उतर आए हैं तो उनके लेखकीय व्यक्तित्व का थोड़ा-बहुत विश्लेषण ज़रूरी हो गया है.

 सबसे पहले मसिजीवी के नारी-विमर्श पर नज़र डालते हैं और उनके चिट्ठे के आधार  पर उनका नारी के प्रति नज़रिया समझने का प्रयास करते हैं. नारी-विमर्श के इस आत्ममुग्ध पैरोकार के खुद के भीतर के वीभत्स पुरुष अहं का विस्फोट देखिए उनके खुद के चिट्ठे पर :

 

“Friday, March 31, 2006

कहा मानसर चाह सो पाई

फिलहाल काफी पंकमय अनुभव कर रहा हूँ। लेक्‍चररी की एक छोटी सी लड़ाई लड़ रहा था- हार गया। पदमावती का रूप पारस था जो छूता सोना हो जाता और ……………. इस विश्‍वविद्यालयी दुनिया में काफी कीचड़ भरा है। इसे भी जो छूता है पंकमयी हो जाता है।……….”

 

यानी एक मामूली व्याख्याता के पद पर अपने बजाय एक स्त्री की नियुक्ति को  पुरुष-वर्चस्व के मद में डूबा यह आदमी पचा नहीं पा रहा है और उस स्त्री के ज्ञान को नहीं —  उसके रूप के पारस — उसकी सुंदरता को उसके चयन का आधार बता रहा है. उसके चरित्र को लांछित करने का घृणित काम कर  रहा है.  और समझ रहा है कि उसने कोई बड़ी भावपूर्ण साहित्यिक बात कही है. इसे क्या कहूं ‘मेल शॉविनिस्ट —-‘  . दूसरों को पंकमय कहने के पहले मसिजीवी अपने भीतर के पंक पर भी एक नज़र डाल लें . उस चयनित स्त्री के सौन्दर्य का इतने घटिया ढंग  से ज़िक्र करना मसिजीवी के भीतर की कुरूपता को — उनके पुरुषवादी अहं को — उघाड़ कर रख देता  है.

रही बात योग्यता की तो मसिजीवी की तमाम भाषाई चौंचलेबाज़ी और अजीबोगरीब शीर्षकों के चटखपन के बावजूद  भाषा उनसे सधती नहीं है. बड़े वाक्य उनसे संभलते नहीं हैं. खेत से चलते हैं और खलिहान में पहुंच जाते हैं. जेंडर से उनके संबंध वैसे ही कुछ ठीक नहीं हैं. सीखना वे चाहते नहीं .

अरे! कहीं और से नहीं तो कम-से-कम अपने चिट्ठाकार साथियों यथा प्रमोद,रवीश,फ़ुरसतिया, अनामदास और अभय को पढकर ही वे भाषा सीखने की कोशिश करें . वे नहीं सीख रहे हैं इसका भी मुझे इतना दुख नहीं है जितना इस बात का कि यही  आदमी, अपनी इसी लद्दड़ हिंदी और इसी छिछलेपन के साथ महाविद्यालय में बच्चों को हिंदी पढ़ाता होगा .

 नोम चौम्स्की और अमर्त्य सेन का नाम लिखने मात्र से बौद्धिक दरिद्रता दूर नहीं होती . अस्पष्ट सामाजिक समझ और फुटकर ज्ञान की केंचुली जब उतरती है तो आदमी महाता उनराओ की पसलीदार फोटो छापकर भी किसी भरे पेट वाले की टेक्नोलॉजी के पक्ष में बंदनवार की तरह लटक सकता है. जब आपमें रविकान्त जैसी मानविकी की समझ और सुधीश पचौरी जैसी खिलंदड़ी भाषा नहीं होती और आप वैसा बानक धरते हैं तो आप  निरे ‘फ़ो ग्रास’ या ‘फ़ुआ ग्रा’ हो जाते हैं.

अहं का फूला गुब्बारा मसिजीवी से ऐसे-ऐसे काम करवाता है कि आप  देख कर दंग रह जाएंगे . वे एक व्याख्याता (तदर्थ या स्थाई पता नहीं)  हैं, पर अपने प्रोफ़ाइल में वे अपने ‘ऑक्यूपेशन’ में लिखते हैं : Prof. ; मान गए ना भाई की छलांग को . रीडर भी नहीं सीधे प्रोफ़ेसर . यह है मसिजीवी की अहमन्यता और यह है उनका चरित्र .

 अपनी इतनी बड़ी पोस्ट में मैंने मसिजीवी के परिवार पर  कोई प्रत्यक्ष टिप्पणी नहीं की थी. पर चूंकि अपराधबोध और कुंठा से ग्रस्त मसिजीवी ने अपनी  पोस्ट में खुद ही यह मुद्दा एकाधिक बार उठाया है तो अब इस पर भी थोड़ी बात हो ही जानी चाहिए .

मसिजीवी,उनकी पत्नी नीलिमा और पत्नी की छोटी बहन नोटपैड उर्फ़ सुजाता(मसिजीवी की साली नहीं कहूंगा वरना वे इसे गाली के रूप में प्रचारित करेंगे) ब्लॉग जगत में सक्रिय हैं . जैसे अन्य चिट्ठाकारों का जिक्र हो सकता है वैसे ही इनका भी हो सकता है. नीलिमा और नोटपैड की क्षमता आश्वस्त करने वाली है. ये मसिजीवी की मदद के बिना भी अपनी जगह बनाने में सक्षम हैं. पर पुरुष-ग्रंथि से मजबूर मसिजीवी एक ओर इनको लगातार ‘प्रमोट’  करने का जतन करते  रहते हैं और दूसरी ओर इनसे अपने संबंधों को उजागर करने से बचते रहे हैं . पर इसके ठीक विपरीत ‘नी’ और ‘नो’ के चिट्ठे पर जैसे ही किसी  की थोड़ी-सी  भी प्रतिकूल टिप्पणी आती है, मसिजीवी वहां अपने कलम-बुत्तका के साथ ‘सपोर्ट’ के लिए पहुंच जाते हैं. टिप्पणी करते समय येन-केन-प्रकारेण उक्त चिट्ठाकारों की ‘पीएचडी’ के बारे में बताना भी नहीं भूलते हैं. उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान करने में मसिजीवी की इतनी  जबरदस्त आंतरिक व्यग्रता को देख-पहचान कर ही किसी बंदे ने उन्हें ‘कालिखजीवी’ की उपाधि प्रदान की  थी. अपने साधारण से लेखों के छपने पर  मसिजीवी-परिवार  गोलबंद होकर नारद को हुआ-हुआ के ऐसे  कोलाहल से भर देने की क्षमता रखता है कि मुर्दे भी उठ खड़े हों. 

स्त्री सशक्तीकरण के मुद्दे पर एक  बात  और  याद आई . आपने स्त्री सशक्तीकरण के अनेक उदाहरण देखे होंगे पर तमाम योग्यता के बावजूद स्त्रियों के सशक्तीकरण का ऐसा त्वरित उदाहरण इतिहास में विरल ही होगा  जहां कोई स्त्री फ़रवरी07 में ब्लॉग लिखना शुरु करे और  मार्च07 में, यानी एक माह के भीतर उसका सशक्तीकरण हो जाए और वह चिट्ठा-चर्चा के दल में शामिल हो जाए और पहली अप्रैल को  इस सशक्तीकरण के फ़ल भी मिलने लगें .  इतने ही कम समय में,इतने ही वेग से और इसी प्रक्रिया से नोटपैड जी का सशक्तीकरण हुआ . पर जो इसे परिवारवाद कहे उस पर भरोसा मत कीजिएगा. एक ही प्रतिभाशाली परिवार के एक साथ तीन-तीन सदस्य चिट्ठा जगत के कर्णधारों में शामिल हो जाएं तो इसे प्रतिभा का विस्फोट ही मानना चाहिए. जनता अविनाश के पीछे पड़ी रही और पता ही नहीं चला कि कब पर्दे के पीछे  यह सशक्तीकरण हो गया .

 अविनाश की तेजी-तुर्शी  देख कर  लोग उसके पीछे पड़ गए  और  यह भूल गए कि एक ‘गोगिया पाशा’ गुपचुप में अपना काम कर रहा है. एक-दो लेख छपे .एक दो लोगों की तस्वीरें छपीं . पहले नारद पर कुछ आरोप लगाकर दबाव में लाया गया फिर प्रिंट मीडिया में छपी कुछ रिपोर्टों की परिवार के चिट्ठों पर जबरदस्त ‘रिसाइकिलिंग’ की गई. एक बुजुर्ग चिट्ठाकार द्वारा इस ओर संकेत करने पर बड़ी निर्लज्जता और धृष्टता से उसे फिर दोहराया गया .  फिर सशक्तीकरण हुआ और सब कुछ ठीक-ठाक हो गया .

जो लोग बरसों से सक्रिय  और गंभीर हस्तक्षेप करने में समर्थ घुघुती बासुति, बेज़ी, प्रत्यक्षा, मनीषा,रत्ना,मान्या आदि को स्त्री सशक्तीकरण का प्रतीक मानते हों तो उन्हें उपर्युक्त उदाहरण देखकर स्त्री सशक्तीकरण के नए उप-मार्गों और नए बनते मानकों पर विचार करना चाहिए.

अवसरवाद को छोड़कर और क्या कारण हो सकता है कि सृजन शिल्पी और सागर और अविनाश जैसे खांटी लोगों के नारद से निकलने या निकाले जाने की स्थिति बनने लगे और एक परिवार  दोनों की कीमत पर अपनी गोटी फ़िट कर ले.  सृजन शिल्पी के प्रति मसिजीवी की हिकारत और अविनाश के प्रति उमड़ा प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. जिसे सही परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए.

मेरी पोस्ट ‘हसन जमाल के पक्ष  में’ पर बहुत सी प्रतिक्रियाएं हुई हैं और हो सकती हैं . पर वहां हिंदी-उर्दू मुद्दे पर कोई विवाद खड़ा करने का संकेत शायद ही किसी को दिखा हो . उर्दू साहित्य को देवनागरी में प्रस्तुत करने वाली पत्रिका  और  उसके सम्पादक के पक्ष में मैं  अपनी हिन्दी की ओर से खड़ा हूं और मसिजीवी उसमें ‘माइक्रोस्कोप’ लेकर हिंदी-उर्दू विवाद के बिंदु ढूंढ रहे हैं. ऐसा सोच तो किसी  षड़यंत्रकारी  दिल-दिमाग वाले कमज़र्फ़ इंसान का ही हो  सकता है .

सब कुछ लिखने के बाद मसिजीवी पुनः उवाचते हैं कि ‘हसन जमाल के तर्क फूहड़ थे’ और ‘वे चौपटस्वामी से अपनी वकालत करवा रहे हैं’. हसन जमाल से मेरा कोई व्यक्तिगत संबंध या सम्पर्क नहीं है. ना ही उन्होंने मेरी कोई रचना छापकर मुझे उपकृत किया है. ना ही कोई रचना छपवाने का विचार है . अगर छपास का ऐसा शौक होता तो दिल्ली की उन पत्रिकाओं/पत्रों के स्वनामधन्य संपादकों से मेरी इतनी मेल-मुलाकात और परिचय तो है ही , जहां लिखकर और छपकर कुछ ब्लॉगरों के  पांव  टेढ़े-टेढ़े पड़ रहे हैं. 

 मैं गत कई वर्षों से ‘शेष’ का नियमित पाठक हूं . उसी के माध्यम से हसन जमाल को जानता-समझता हूं . मुझे यह भी नहीं पता कि हसन जमाल नेट के इस विवाद से परिचित हैं भी या नहीं. यह तो हमारे समय के एक महत्वपूर्ण सम्पादक के प्रति प्रदर्शित मूढताजनित उपहास की घटना पर एक पाठक का हस्तक्षेप था और उसे  उतना भर ही समझना चाहिए.

मसिजीवी ने चेतावनी दी है कि वे और अधिक मज़बूत किले पर चढ़कर हमला बोलेंगे. सामंती संस्कार इसी तरह बाहर आते हैं. हसन जमाल को ‘किलेदार’ कहते-कहते मसिजीवी खुद अपनी ‘किलेबंदी’ में जुट गए. किसी भी तरह के समर  में उनका स्वागत है. मैं बिना किसी  किलेबंदी के ऐसे ही उनसे मिलूंगा.

 अपनी पोस्ट के एकदम अंत में “…भाषा इससे भी ज्‍यादा अश्‍लील होगी”  कह कर मसिजीवी ने अश्लील भाषा के  प्रयोग  की भी धमकी दी है. मुझे कोई आश्चर्य नहीं है मसिजीवी जी . जब आपके पास तर्क नहीं होंगे तो आपको अश्लीलता के उस स्तर पर भी उतरना ही होगा .

बहरहाल मेरे पास तर्क हैं और उन तर्कों के अनुकूल भाषा है . इसलिए मुझे ऐसा करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. मैंने सब कुछ किया है बस यही नहीं किया . और करूंगा तो पृथ्वी उलट-पुलट हो जाएगी.  इसलिए फ़ुरसतिया जी की प्रिय पुस्तक ‘राग दरबारी’ की भाषा में यह हमेशा याद रखना कि  जो   ‘आग खाओगे तो अंगार हगोगे’ .

प्रमोद भाई ने अत्यंत औदात्यपूर्ण सलाह देते हुए हम सब की ओर से हसन साहब को एक माफ़ीनामा भेजने का प्रस्ताव रखा है . इधर मसिजीवी अब भी हसन साहब के  तर्कों को ‘फूहड़’ कह कर अपनी युवकोचित(?) फूहड़ता पर अड़े हुए  हैं . ऐसे में क्या उचित होगा? नेट पर बैठे नारद समाज के विद्वज्जन कृपया अपनी राय से अवगत कराएं .

 

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हसन जमाल के पक्ष में

मई 4, 2007

शेष का ४३ वां अंक (जनवरी-मार्च २००७)  सामने है . मुखपृष्ठ पर हुसैन की एक सुंदर किंतु विचलित कर देने वाली पेन्टिंग है .

गोपीचंद नारंग की गु्ज़ारिश है . नामी उर्दू शायर और नक्काद बाकर मेहदी को खिराजे-अकीदत है. उर्दूदां ज्ञानचंद जैन की किताब ‘एक भाषा,दो लिखावट,दो अदब’ पर अलग-अलग पहलू प्रस्तुत करती दो समीक्षाएं हैं.

सीरिया के इस्लामी विद्वान मुस्तफ़ा अलसबाई का साक्षात्कार है. अफ़सानानिगार इकबाल मजीद से गुफ़्तगू है. मशहूर उपन्यासकार जोगेंदर पॉल के नाम लिखे देश-विदेश के विभिन्न साहित्यकारों के    पत्र हैं.

डॉक्टर हसन मंज़र का सफ़रनामा और यादनामा है. स्वतंत्रता-सेनानी मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली पर लिखा फ़ारूक अर्गली का लेख है , ‘इस्लाम और फ़ुकुयामा’ पर सुरेश पंडित का और ‘हिंदी पत्रकारिता में उर्दू शब्दों के गलत इस्तेमाल’ पर फ़ज़ल इमाम मल्लिक का लेख है.

परवीन शाकिर,नासिर अहमद ‘नासिर’,अहमद सुहैल और जयंत परमार की नज़्में हैं;मिराक मिर्ज़ा,तिलकराज पारस,गुलाम मोहिउद्दीन ‘माहिर’,अताउर्रहमान ‘अता’ की गज़लें; देवेन्द्र सिंह,अनिल गंगल,शम्भु बादल आदि-आदि की कविताएं हैं; साथ में नूर मुहम्मद ‘नूर’ के दोहे हैं.

नय्यर मसूद के किस्से हैं; भवानी सिंह आदि-आदि की कहानियां हैं और कई लघु कथाएं .  अंत में उर्दू-हिंदी की कई ताज़ा किताबों पर समीक्षाएं हैं.  और हैं पाठकों और रचनाकारों के पत्र .

शेष यानी दो ज़बानों की एक किताब . एक तिमाही इंतिखाब . 

इस समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में  उर्दू में  जो कुछ बेहतरीन  रचा जा रहा है उस तक देवनागरी के माध्यम से  पहुंचने का एकमात्र रास्ता .

उर्दू में सपने देखने वाली आंखों और उर्दू में सोचने वाले मन की गहराई की थाह पाने का, हम उर्दू न जानने वाले हिंदीभाषियों का एकमात्र जरिया .

खुदा न करे कभी यह पुल टूटे . ईश्वर ऐसा दिन न दिखाए . यह एक मात्र पुल है जो बरस-दर-बरस बारहो महीने आवा-जाही के लिए खुला रहता है.  सरकारी गाडियां और बसें भले ही चलती और बंद होती रहती हों .

उर्दू का सर्वश्रेष्ठ साहित्य यहां देवनागरी में सुलभ रहता है .  पर  ‘शेष’ उर्दू के लिए उर्दू लिपि का हामी है. उर्दू के लिए देवनागरी की वकालत करने वालों को वह उर्दू का खैरख्वाह नहीं मानता . ‘शेष’ मानता है कि लिपियां ज़बानों पर थोपी नहीं जातीं . लिपियां ज़बानों की हमज़ाद होतीं है.

 हसन जमाल की बेबाकी और साफ़गोई ऐसी है कि किसी भी गलत बात को वे बर्दाश्त नहीं कर सकते . और उसे अपनी तल्ख टिप्पणियों के बाण मार कर छलनी कर देते हैं . विनम्रता ऐसी कि लगभग दो दशकों से प्रकाशित हो रही, देश की इस अनूठी पत्रिका ‘शेष’ को वे सिर्फ़ अपनी पेशकश कहते हैं .वे अपने को इसका संपादक नहीं कहते . जबकि वे हैं .  और हिंदी की किसी भी महत्वपूर्ण पत्रिका के तुर्रम खां संपादक से बड़े संपादक हैं . चूंकि वे अधिकांश सामग्री इस समूचे उपमहाद्वीप से प्रकाशित होने वाली उर्दू पत्रिकाओं से लेकर और अनुवाद करवा कर सजाते हैं सो वे बड़ी विनम्रता से लिखते हैं; तर्जुमा और तर्तीब : हसन जमाल .

पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर जैसे दूरस्थ नगर में बैठे इस सामान्य आदमी का अथक परिश्रम, अद्भुत जीवट और बेलाग ईमानदारी इस पत्रिका ‘शेष’ के पन्ने-पन्ने से प्रकट होती है . उनका अपने एकल प्रयास से ‘शेष’ जैसी पत्रिका का प्रकाशन ;  अपनी पीठ ठोकने के व्यसन और अखाड़ेबाज़ी में लिप्त दिल्ली-केन्द्रित संपादकों के लिए एक मिसाल है . 

शेष के महत्व को सरकारी अनुदान से प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं और विदेशी पैसे से फलने-फूलने वाले एन.जी.ओ.वादी उपक्रमों के बरक्स रखकर भी परखना चाहिए .

हिंदी के प्रति हसन जमाल के मन में कुछ बद्धमूल विचार हैं . बावजूद इसके कि उनके जैसे हिंदीसेवी देश में बिरले ही होंगे . हिंदी के प्रति उनकी तल्ख टिप्पणियों से कई बार मन आहत भी हुआ है . जैसे कि वे उर्दू की बुरी दशा का जिम्मेदार हिंदी को ठहराने के आदी हैं. खैर, ऐसे वे अकेले तो नहीं हैं . अब तो हिंदी इलाके की सभी भाषाओं-उप भाषाओं-बोलियों की बुरी दशा के लिए हिंदी को दोष देना फ़ैशन-सा हो गया है. या कहूं,  लिंग्विस्टिक्स का एक किस्म का स्कूल चल निकला है. पर यह बात फिर कभी. अभी तो बात हसन साहब और शेष के मुतल्लिक  .

तो कई बार हसन जमाल मन आहत करते हैं . पर उससे मन में उनके प्रति सम्मान भाव कभी कम नहीं हुआ . अगर उनके कुछ बद्धमूल विचार हैं या पूर्वग्रह हैं तो ऐसे कुछ पूर्वग्रह हमारे भी होंगे. तभी तो कुछ भी सोच-विचार करने के पहले ही हमारा मन दुख जाता है .

तो ऐसे हैं हसन जमाल और ऐसी है उनकी ‘शेष’  नाम की यह पत्रिका . बाकी अंदाज़ा तो सिर्फ़ पत्रिका को देख-पढ कर ही  हो सकता है . पर यह बात सोलह आने पक्की है कि ‘शेष’  हिंदी की अनूठी पत्रिका है — भीड़ में अलग दिखने वाली– आपको समृद्ध करने वाली . बेहतरीन सामग्री से परिपूर्ण एक अंक बीस रुपये का और सालाना  अस्सी रुपये में चार अंक .

इधर हसन जमाल साहब कुछ गलत कारणों से चर्चा में  हैं . कुछ तो हसन साहब की नया ज्ञानोदय में छपी उस पत्रनुमा टिप्पणी में था . कुछ उस पत्रिका के संपादक के व्यक्तित्व में . कुछ उस टिप्पणी पर आई टिप्पणियों में  .

और फिर इंटरनेट पर तो जैसे विवाद की लाश पर मुफ़्तखोर गिद्धों के झुंड ही मंडराने लगे . ऐसे गिद्ध भी आए जो सामान्यतः विवादों से दूर रहते आए हैं. कुछ गिद्ध उत्साह के अतिरेक में हसन साहब को चपत जमाने ‘विद फ़ैमिली’ आ गए . और हसन जमाल को एक पिछड़ा हुआ अहमक,कूपमंडूक,तरस खाने योग्य और न जाने क्या-क्या साबित करने के चक्कर में भाव-विभोर होकर तूतक-तूतिया हो गये . यानी हसन को हड़काने की खुशी में ऐसा झूम के नाचे कि घुंघरू टूट गए .

रवि भाई ने हसन जमाल को उनकी ‘अंतर्जालीय कूपमंडूकता’ के लिए फटकारते हुए और उनके लत्ते लेते हुए कहा कि ‘उनके तर्क बेहद हास्यास्पद,बचकाना और इंटरनेट के प्रति उनकी नासमझी और अज्ञानता को दर्शाते हैं’ . थोड़ी अतिरंजना और छोटी-सी तथ्यात्मक गलती के साथ सराय के रविकांत ने भी कहा कि, “Jamal saheb got a taste of his own medicine when he got furious responses from the readers of his magazine.”

और इधर  तो साइबर-योद्धाओं की एक पूरी वाहिनी चल ही पड़ी थी   एक इंटरनेट-द्रोही लेखक के आखेट के लिए. भाई लोगों ने रवि भाई के गैरज़रूरी ‘अंतर्जालीय’ शब्द को ‘डिलीट’ कर दिया और ‘कूपमंडूकता’ शब्द को ले उड़े . और फिर हसन साहब की कूपमंडूकता के  इस कृत्रिम और कल्पित राग को  प्रौद्योगिकी-उन्माद की ताल पर  कई  सुरों में  गाया गया.

 चूंकि इंटरनेट को खराब कहने का मामला लगभग   ‘ब्लैस्फ़ैमी’ — ईशनिन्दा — जैसा मामला था,  इसलिए  कुछ इंटरनेट-प्रेमियों को रवि जी की यह भर्त्सना भी एकदम नाकाफ़ी और गैरज़रूरी विनय से भरी लगी . पूर्व इलैक्ट्रिकल इंजीनियर (हालांकि अभी किन्हीं नीरिजा ने उनके इंजीनियर होने पर सवालिया निशान लगा दिया है) और अब हिंदी के पी.एच.डी. मसिजीवी तो लगभग रवि जी द्वारा की गई इस विनयपूर्ण मजम्मत से बुरी तरह असंतुष्ट दिखे .  बिज़ली के इंजीनियर हैं चाहते होंगे बिज़ली के झटके देकर हसन जमाल नाम के इस अपराधी का ऐसा उपचार कर दिया जाए  कि  फिर कभी लौटकर इंटरनेट जैसी दिव्य प्रौद्योगिकी पर  ऐसी ओछी तोहमत लगाने का आपराधिक कृत्य न कर सके .

अब मनीषा जी का लेख तो ऐसा कुछ खास था नहीं  जिसके पक्ष में आवाज़ उठाई जाए . यह मैं नहीं कह रहा हूं . बकलम रवि भाई उसमें हिंदी ब्लॉगों के बारे में सरसरी और उथली जानकारी थी . (इस बारे में मसिजीवी जी भी रवि जी से पूरी तरह एकमत हैं). तो हसन जमाल ने ऐसा क्या विस्फोटक कह दिया  यह जान लेना बहुत ज़रूरी है .

इंटरनेट तात्कालिक उद्दीपक था. हसन साहब के दुख का असली कारण था ‘भारत का असंतुलित विकास’ जो देश के हर समझदार आदमी की ज़रूरी चिंता है . उनका मुद्दा था ‘हर विकास की पुश्त में दिखता विनाश’ . वे चाहते थे कि हम यह विचार करें कि नई तकनीक हमें क्या दे रही है और बदले में हमसे क्या कीमत वसूल कर रही है.

वे चाहते थे कि हम ज्ञान और सूचना में फ़र्क करना सीखें . वे कह रहे थे कि अनावश्यक सूचनाएं भय पैदा करती हैं और इंटरनेट सूचनाओं का जंगल है. वे कह रहे थे कि तकनीकी उपकरण मानवीय ऊष्मा का विकल्प नहीं हो सकते . वे कह रहे थे कि विकास के पहिए को नहीं रोका जा सकता और इंटरनेट का चलन बढ़ेगा,पर इसके ‘ऐडिक्शन’ से बचना ज़रूरी है . वे कह रहे थे कि किसी तकनीक की अत्यधिक व बेजा प्रशंसा करने के पहले उसके घातक परिणामों को भी खयाल में रखना चाहिए . कि तकनीकी उपभोक्ता को अपना गुलाम बना लेती है. वे कह रहे थे कि जब दूर से बिना किसी प्रत्यक्ष मेल-मुलाकात के चैटिंग होगी तो चीटिंग की गुंजाइश भी होगी. 

एक बड़े-बुजुर्ग के जीवनानुभव के आधार पर वे कह रहे थे कि जो सहजता और सुविधा परम्परा में है, वह नई तकनीक में संभव नहीं दिखाई देती. वे आगाह करते  हैं कि एकदिन इंटरनेट हमारा सुख-चैन,आराम व सुकून हर लेगा . और साथ ही  यह भी कहते हैं : मैं जानता हूं,यह निराशावादी दृष्टिकोण है, लेकिन अंजाम आईने की तरह साफ़ नज़र आ रहा है .

विश्वास न हो तो पढ़कर देख लीजिए . यही सब तो कह रहे  थे वे . (मैंने नया ज्ञानोदय के फ़रवरी अंक में पढ़ा था, पर अब तो रवि जी ने जन-सामान्य की सुविधा और हिंदी के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से  इसे नेट पर भी डाल दिया है) . हसन साहब कुछ वैसी ही घरोआ बात ‘इमोशनली चार्ज्ड’ होकर कह रहे थे जैसी एक परिवार या समुदाय का बुजुर्ग कहता है समझाइस के उद्देश्य से , घर के नौजवान के भले के लिए . उसे चेताने के लिए .

 यह  एक  पारम्परिक  दृष्टिकोण है जीवन का . विकास की आधुनिक संकल्पना का एक ‘क्रिटीक’ है जिसे व्यापक संदर्भों में देखा जाना चाहिए. वैसे ही जैसे हम बहस चलाते हैं कि पानी ज्यादा ज़रूरी है या कोक .  प्राथमिक शिक्षा ज्यादा ज़रूरी है या नए-नए आईआईटी . किसानों की जान बचाना ज्यादा ज़रूरी है या नए-नए एसईज़ेड बनाना. कलम ज्यादा ज़रूरी है या की-बोर्ड. एक कच्ची बस्ती के घर में शौचालय ज्यादा ज़रूरी है या इंटरनेट कनैक्शन वाला कम्प्यूटर . 

 कि देश के अधिकांश ग्रामीण इलाकों  में जहां बिजली है भी, वह सिर्फ़ कुछ घंटे मुंह दिखा कर चली जाती है. कि लगभग अस्सी करोड़ हिंदी बोलने-बरतने वाले लोगों में कुल जमा पांच-छह सौ ब्लॉगर हैं जो इस मुगालते में  दोहरे हुए जा रहे  हैं कि हिंदी का भविष्य उन्हीं के कंधों पर टिका है और इंटरनेट देश में बहुत आमफ़हम है . कि कागज़-कलम और छपी हुई पुस्तकों के दिन गिने-चुने हैं. 

जबकि इसके बरक्स यह तथ्य देखिए कि हिंदी पठन-पाठन के इस बुरे दौर में भी हिंदी के कुछ अखबार एक करोड़ से ज्यादा बिकते हैं . कवि-कहानीकार उदय प्रकाश टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के बिज़नेस पेज के हवाले से कह रहे हैं  कि पेन की बिक्री  76 प्रतिशत बढ़ी है .

 कोई प्रौद्योगिकी किसी भाषा के उत्थान में सहायक प्रतीत हो रही  हो,  पर भाषाभाषियों के साथ उसका रिश्ता द्वैध या संदेह का बन रहा हो या प्राथमिकता के हिसाब से उसका क्रम पीछे  की ओर हो . तब क्या उसकी पड़ताल एक ज़रूरी काम नहीं है . उसके आलोचकों की शंकाओं को दूर करना हमारी जिम्मेदारी है या उन्हें अहमक ठहराकर हमारा दायित्व पूरा हो जाता है . जीतू ने ज़रूर अपनी टिप्पणी में इस ओर इशारा किया है कि हसन जमाल का ब्लॉग बनवा दिया जाए .  बाकी तो उन्हें बहस के भी नाकाबिल मान रहे हैं .

बस यही ‘प्राथमिकता का प्रश्न’ था जो हसन जमाल उठा रहे थे . बदले में उन्हें क्या मिला . रुसवाई . उनकी  कई दशकों की तपस्या को , उनकी लंबी साहित्य सेवा को समझे बगैर नेट पर बैठे हवाबाज़ों ने उन्हें तरस खाने लायक मान लिया .

हिंदी के  हित रवि रतलामी के प्रौद्योगिकीय योगदान को मैं उतना ही मान देता  हूं जितना कि ‘शेष’ के जरिए  हिंदी की समृद्धि के लिए हसन जमाल साहब को . हसन साहब के प्रौद्योगिकी-विरोधी रवैये को मैं उसी तरह लेता हूं  जैसे रवि भाई के व्यंजलों को .  मैं मानता हूं कि अपनी ‘कोर कम्पीटेंस’ के  इलाके के बाहर जाने पर आदमी के निष्पादन में वह बात नहीं रह जाती जिसके लिए वह जाना जाता है .  पर इससे उसका अपने कार्य-क्षेत्र में किया गया काम कम महत्वपूर्ण  नहीं हो जाता . उसका व्यक्तित्व   गया-गुजरा  नहीं हो उठता . अतः कोई भी फ़ैसला सुनाने के पहले कम-से-कम उतनी समझदारी बरतना ज़रूरी है जितनी सर्फ़ की खरीददारी में काम आती है .

तो चाहे हसन जमाल हों या रवि रतलामी, वे हल्के ढंग से लेने के लायक नहीं हैं . अपने-अपने क्षेत्र के दो दिग्गजों की ‘कोर कम्पीटेंस’ में यदि ‘ओवरलैपिंग’ हो रही हो तो राहचलतों को बीच में कूदने या अपने भुट्टे सेंकने की बजाय कुछ सीख लेनी चाहिए .

ऐसों को तो और भी जो प्रिंट मीडिया में छपी अपनी किसी भी बुटकन-सी रिपोर्ट को लेकर मारे उत्तेजना और खुशी के  लहालोट हो जाते हैं .

हसन जमाल हमारे समय के बड़े संपादक हैं .  उनकी बात और उसके निहितार्थ पर समझदारी और सहानुभूति से विचार होना चाहिए , तदर्थवाद के तहत दांत चियारते हुए नहीं .

                                     

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कोलकाता का हिंदी रंगमंच-2

मई 3, 2007

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में व्यावसायिक व शौकिया रंगमंच समानांतर  चलते रहे ।  देश इस समय नवजागरण की लहर पर सवार  था । हिन्दी जाति के सांस्कृतिक अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट व पं. माधव शुक्ल जैसे अनेक बुद्धिजीवी और सुसंस्कृत देशवासी पारसी कंपनियों की लोकरुचि को दूषित करने वाली प्रस्तुतियों से क्षुब्ध थे । धीरोदात्त नायक दुष्यंत को खेमटेवालियों की तरह कमर मटका कर नाचते और ‘पतरी कमर बल खाय’  गाते हुए देखना इनके लिए   असह्य था । ये वे लोग थे जो भाषा और देश दोनों के लिए चिंतित थे । वे अपनी भाषा में सुसंस्कृत और साहित्यिक अभिरुचि वाले नाटक खेलना चाहते थे और जनता को स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करना चाहते थे ।

 1916 में प्रकाशित महाभारत (पूर्वार्ध) नाटक की भूमिका में शुक्ल जी ने स्पष्ट लिखा है कि “आजकल पारसी नाटकों का प्रधान्य है । उसके साज-सामान हाव-भाव बिल्कुल कृत्रिम होते हैं । क्योंकि उनके सारे कार्य अर्थोपार्जन के उद्देश्य पर ही संबद्ध हैं……।’ परंतु शुक्ल जी यह भी अनुभव कर रहे थे कि “संपूर्ण परिवर्तन के साथ-साथ नाट्यकला में भी आशातीत परिवर्तन हो रहा है । दर्शकों की इच्छा भाव और दृष्टि में बहुत अंतर आ गया है । अब लोग उदारतापूर्वक नाट्यशाला में जाते हैं और बड़े ही उत्सुकता से नाटक देखते हैं । शिक्षित समाज अब बहुत कम पारसी कंपनियों की ओर झुकता है ।” राष्ट्रीय जागरण में नाटक की भूमिका के प्रति वे विशेष सजग थे । महाभारत (पूर्वार्ध) नाटक में कुंती के मुंह से मानो भारत माता स्वयं आह्वान कर रही है :

    “स्वाभिमान नहिं तजो आत्म चिंता नहिं छोड़ो ।
     स्वाधिकार हित लड़ो सत्य से मुख नहिं मोड़ो ।।”

1911 में माधव शुक्ल कोलकाता पधारे । ‘हिन्दी नाट्य समिति’ तब भारतेंदु के नाटक ‘नीलदेवी’ के मंचन की प्रक्रिया में थी । शुक्ल जी के मार्गदर्शन से 1912 में भारत संगीत समाज के मंच पर ‘नीलदेवी’ का सफल मंचन हुआ । पर इसी दौरान कुछ मतभेद उभरे और भोलानाथ बर्मन व शुक्ल जी हिन्दी नाट्य समिति से अलग हो गए । हिन्दी नाट्य समिति ने ‘नीलदेवी’ के अतिरिक्त पं. राधेश्याम कथावाचक लिखित ‘वीर अभिमन्यु’ का सफल मंचन किया । पहले प्रदर्शन में ही इतनी धनराशि प्राप्त हुई कि प्रस्तुति का खर्च निकालकर चार हजार रुपये उड़ीसा के बाढ़पीड़ितों की सहायतार्थ दिए गए . 1920 में जमुनादास मेहरा ने ‘पाप परिणाम’ नामक नाटक के कई सफल मंचन किए । मेहरा जी द्वारा निर्देशित ‘भक्त प्रहलाद’ के भी लगभग दस मंचन हुए । इसके अतिरिक्त ‘हिन्दी नाट्य समिति’ के बैनर तले सत्यविजय, पांडव विजय, भारत रमणी, सती पद्मिनी, सम्राट परीक्षित और स्कूल की लड़की आदि नाटकों के सफल प्रदर्शन किए गए । 1939 के बाद यह संस्था कुछ विशेष या सार्थक नहीं कर सकी ।

 पं. माधव शुक्ल द्वारा ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की स्थापना के साथ हिन्दी रंगमंच का संबंध देशानुरागी भावनाओं से और प्रगाढ़ हो गया था । शुक्ल जी नाटकों के द्वारा जागृति लाकर   राष्ट्रीय आंदोलन को बल देना चाहते थे । परंतु अंग्रेज सरकार 1876 में ‘ड्रामैटिक पफ़ॉर्मेंस बिल’ पास कर चुकी थी और दीनबंधु मित्र का नाटक ‘नीलदर्पण’ जब्त कर लिया गया था। खाडिलकर का ‘कीचक वध’ और वृंदावन लाल वर्मा का ‘सेनापति ऊदल’ भी प्रतिबंधित कर दिया गया था । ऐसे समय में जब परिषद ने राधाकृष्ण दास का नाटक ‘महाराणा प्रताप’ खेलना चाहा तो अनुमति नहीं दी गई । अत: यह नाटक ‘भामाशाह की राजभक्ति’ नाम से खेला गया. इसी तरह अंग्रेज सरकार की आंख में धूल झोंककर ‘महाभारत’ नाटक ‘कौरव कलंक’ नाम से व ‘मेवाड़ पतन’ नामक नाटक  ‘विश्व  प्रेम’ नाम से खेला गया । इनके अतिरिक्त डी.एल.राय के ‘चंद्रगुप्त’ आदि नाटक सफलतापूर्वक खेले गए ।

 लगभग दो दशकों तक ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की कमान पं. माधव शुक्ल के हाथों में रही और रंगमंच पर राष्ट्रप्रेम की धारा अप्रतिहत बहती रही । आलम यह था कि शुक्ल जी के प्रयत्नों से महाकवि निराला जैसे साहित्यकार भी नाट्य लेखन और अभिनय की ओर प्रवृत्त हुए । पं. माधव शुक्ल के पश्चात परिषद का नेतृत्व पं. देवव्रत मिश्र व ललित कुमार सिंह ‘नटवर’ ने किया और नूरजहां, शाहजहां, उस पार, महात्मा ईसा, छत्रसाल व पुनर्मिलन (महानिशा) मंचित किए । ‘महानिशा’ नाटक का मंचन इस दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण था कि इसमें पहली बार स्त्री पात्रों की भूमिकाएं महिला कलाकारों द्वारा ही अभिनीत की गई थीं । इससे पहले पुरूष कलाकार ही स्त्री पात्रों की भूमिका में आते थे ।

1931 में कोलकाता से ही नरोत्तम व्यास के संपादन में ललित कला संबंधी सचित्र साप्ताहिक ‘रंगमंच’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ । इसका उददेश्य निम्नलिखित काव्य पंक्तियों के रूप में लिखा रहता था :


    ” हिन्दी माता के पुत्रों में कला-विवेक भाव भर दे
    जग में ये भी शीश उठाएं, इतना इनको अवसर दे ।।
    क्रम-क्रम से वे सब उठ जाएं, पड़े हुए हैं जो परदे ।
    कागज का यह ‘रंगमंच’, पैदा वह रंगमंच कर दे ।।”  

पं. माधव शुक्ल के महाभारत (पूर्वार्ध) में भी तो अर्जुन कुछ ऐसा ही उद्घोष करता है :             

          “आत्मदशा का ज्ञान नहीं जिस नर के भीतर ।
            उसकी भी क्या है मनुष्य में संज्ञा क्षिति पर ।।
  

हिन्दी नाट्य  परिषद के ही कुछ सदस्यों ने बाद में अलग होकर ‘बजरंग परिषद और ‘श्री कृष्ण परिषद’ जैसी नाट्य संस्थाएं गठित कीं । ‘बजरंग परिषद’ ने 1939 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बीसवें अधिवेशन में ‘श्रवण कुमार’ नाटक का मंचन किया जो सफल नहीं रहा। किंतु अगले दिन ‘भक्त प्रहलाद’ नाटक सफलतापूर्वक खेला गया । बजरंग परिषद द्वारा ‘सिंहनाद’, ‘भयंकर भूत’ और ‘जखमी पंजाब’ नाटक का भी मंचन किया गया । श्रीकृष्ण परिषद तो ‘कृष्ण-सुदामा’ नामक एक ही नाटक खेल सकी । बड़ाबाजार के ‘अपर इंडिया एसोसिएशन’ नामक क्लब ने ‘दुर्गादास’, ‘राजा हरिशचंद्र’ व ‘मधुर मिलन’ आदि नाटकों का मंचन किया । 1943 में स्थापित ‘बिड़ला क्लब’ ने 1945 से 1963 के बीच मिनर्वा, कालिका, कोरिंथियन, स्टार तथा विश्वरूपा आदि थियेटरों में डी.एल.राय के ‘मेवाड़ पतन’  ‘चंद्रगुप्त’ और ‘उस पार’ नाटकों का और उग्र के ‘महात्मा ईसा’ नाटक का मंचन किया । 1964 में ‘रुपया बोलता है’ का प्रदर्शन किया गया । 

                                                                          क्रमशः …