धर्म,आतंक और समाज

धर्म के नाम पर लड़े गए युद्धों के विपरीत धर्म-आधारित आतंकवाद अपेक्षाकृत नई परिघटना है । इसे आतंकवादियों की भर्ती के प्रतिमानों में आए बदलाव और आतंकवादी समूहों की मनोवैज्ञानिक और समाज- शास्त्रीय गतिकी में दिख रहे नए रुझानों से समझा जा सकता है। यह 1970 की शुरुआत   में   सक्रिय    पारम्परिक आतंकवादी   समूहों  तथा व्यक्तियों  से    भिन्न प्रकृति का   आतंकवाद है    जिसके पीछे    धार्मिक कट्टरवाद एवं सामूहिक विनाश की भाषा बोलने वाले नए धार्मिक संगठनों तथा भूमंडलीकरण के चलते धर्म और बाजार के नए गठजोड़ की ताकत है । धर्म इस समय बाजार की शक्तियों से प्रभावित और परिचालित है । अमेरिकी साम्राज्यवाद तथा उसके सैनिक और आर्थिक आतंकवाद ने न केवल इस धार्मिक आतंकवाद को अपेक्षित ईंधन उपलब्ध करवाया है वरन् आतंकवादी समूहों को काफी हद तक औचित्य साधन के कारण भी उपलब्ध करवा दिए हैं ।  

आतंकवादी हमले अब अत्यंत संगठित, सुनियोजित और उच्च प्रौद्योगिकी पर आधारित हैं । उनकी प्रहार-दक्षता और मारक-क्षमता की परिशुद्धता का स्तर विस्मयकारी है । मनोवैज्ञानिकों द्वारा वर्णित आतंकवादियों के पारंपरिक मनोवैज्ञानिक प्रकार ( राष्ट्रवादी-अलगाववादी, धार्मिक कट्टरवादी, नव-धार्मिक तथा सामाजिक क्रांतिकारी आदि ) अब आतंकवाद के अध्ययन के लिए बहुत उपयोगी नहीं रह गए हैं । आतंकवादी समूहों में जैववैज्ञानिक, डॉक्टर, रसायनवैज्ञानिक, कम्प्यूटर विशेषज्ञ, भौतिकीविद्, संचार अभियंता आदि उच्च शिक्षित और व्यावसायिक दक्षता सम्पन्न व्यक्तियों की सक्रियता बहुत परेशान करनेवाला तथ्य है ।

 आराम का जीवन जी सकने की क्षमता रखने वाले इतने उच्च शिक्षित, सम्पन्न और सफल व्यक्ति आतंकवादी कैसे बन जाते हैं ? क्या आतंकवदियों में कोई लाक्षणिक समानता होती है ? क्या आतंकवादियों का व्यक्तित्व कुछ विशेष तरह का होता है ? दस्तोवस्की की भाषा में कहें तो — ” बुरा काम करनेवाले की भर्त्सना से आसान कुछ भी नहीं है और उसको समझने से मुश्किल कुछ भी नहीं है।” आतंकवाद पर किए गए तुलनात्मक अध्ययन किसी विशिष्ट आतंकवादी मस्तिष्क की ओर संकेत नहीं करते हैं और न ही इन्हें किसी विशेष नैदानिक श्रेणी में रखा जा सकता है । आतंकवादी संगठनों में नौजवान आतंकवादियों की भारी संख्या एक और खतरनाक लक्षण है । धार्मिक और विचारधारात्मक वाग्मिता से इन युवाओं का मानसिक प्रक्षालन कर इन्हें शहीदी बाना पहना दिया जाता है ।

 पिछले कुछ दशकों में भूमंडलीकरण के नाम पर अन्यायपूर्ण विश्व- व्यवस्था के अंधपोषण के चलते आतंकवाद की घटनाओं में वृद्धि हुई है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की आक्रामक विपणन शैली ने समाज को बाजार और नागरिक को उपभोक्ता में बदल दिया है । विकासशील और अविकसित देशों में   समाजीकरण की सहज प्रक्रिया    पटरी से उतर गई    है । समाज से उपेक्षित और बहिष्कृत व्यक्ति या तो साधू हो सकता है या आतंकवादी । आतंकवादी समूहों को ऐसे ही सुभेद्य शिकार चाहिए । इन्हें अपने दल में शामिल करने और अपने ढंग से इनका समाजीकरण करने के उपरांत इनका इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए किया जाता है ।

 

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2 Responses to “धर्म,आतंक और समाज”

  1. PRAMENDRA PRATAP SINGH Says:

    ठीक से दिखा नही इस लिये पढ़ नही सका

  2. अभय तिवारी Says:

    चौपटस्वामी जी.. आपकी पहली पोस्ट पर आपको बधाई..
    दोस्तोवस्की की बात मारक है.. उसे और आगे बढ़ाइये..
    लाल रंग थोड़ा चुभता है.. अगर कोई राजनैतिक आग्रह न हो तो इसे बदल दें..

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