चौपटस्वामी की चौपट कविता
साहित्यानुरागी
बाबा छाप या एक-सौ बीस
डालकर देसी पत्ता
चुभलाते-चबाते हुए
– कचर-कचर
पीक इतै-उतै थूकते
बगराते हुए
– पचर-पचर
चेलों की जमात से लगातार
बोलते-बतियाते हुए
– कचर-पचर
वे सुन रहे हैं कवि की कविता
अंगुली से चूना चाटते हुए
दोहरे हुए जाते हैं आनन्द में
बोलते हुए, ‘लचर-लचर’ ।
****
July 4, 2008 at 7:32 am |
waah,kamal ki kavita hai.Bahut badhiya likha hai……
July 4, 2008 at 7:39 am |
स्वामीजी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा- ‘फचर-फचर’ का कहीं प्रयोग नहीं हो सका है.
July 4, 2008 at 7:44 am |
बहुत ख़ूब, स्वामीजी कुछ चेहरे सामने आ गए