दो सभ्यताओं का दुलारा बेटा

 

 1911 — 2006

 

वे एक सांस्कृतिक प्रकाश-स्तम्भ थे……जिन्होंने अरबी साहित्य को विश्व मानचित्र पर प्रतिष्ठित किया . प्रबोधन और सहिष्णुता के मूल्य को अपने लेखन के माध्यम से  रूपायित किया .

नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले अरबी लेखक नज़ीब महफ़ूज़ मिस्र(इजिप्ट) की राजधानी काहिरा की पृष्ठभूमि पर लिखी अपनी उपन्यास-त्रयी ‘कायरो ट्रिलजी’  के अंग्रेज़ी अनुवाद के बाद ही अरबी साहित्य की दुनिया के बाहर चर्चा में आ पाए . उन्नीस सौ बावन में लिखे गये ये उपन्यास : पैलेस वॉक(बैनुल-कसरैन),पैलेस ऑव डिज़ायर(कसरुस्शौक) तथा सुगर स्ट्रीट(अस्सुकरिय) , उन्नीस सौ छप्पन और सत्तावन में छपे और नवें दशक में इनका अंग्रेज़ी अनुवाद सामने आया . ये उपन्यास  बीसवीं सदी के शुरुआती दौर के मिस्र के इतिहास में रची-बसी अल-सईद अब्द अल-जवाद  के संयुक्त परिवार कहानी है .इन उपन्यासों में एक मुस्लिम व्यवसायी परिवार का लेखा-जोखा तो है ही मिस्र के तत्कालीन सामाजिक-राजनैतिक जीवन पर भी प्रबोधनकारी व्याख्याएं और विमर्श देखने को मिलता है .  इन उपन्यासों के प्रकाशन के बाद-से ही उनकी तुलना चार्ल्स डिकेंस और दोस्तोवस्की जैसे महान उपन्यासकारों से की जाने लगी .

1959 में प्रकाशित पुस्तक औलादो हार्रतुना (चिल्ड्रेन ऑफ गेबेलावी) की वजह से महफ़ूज़ विवादों के घेरे में आ गए . एक अखबार में धारावाहिक रूप से प्रकाशित इस पुस्तक को इस्लामी कानून का उल्लंघन करने और धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में यह कह कर ‘बैन’ कर दिया गया कि इसमें अल्लाह और उनके प्रोफ़ेट के बारे में अनुपयुक्त अन्योक्तिपरक  कथाएं  हैं . बाद में यह उपन्यास लेबनान में प्रकाशित हुआ और इसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया गया .

उन्नीस सौ चौरानबे में एक धार्मिक उन्मादी ने छुरा मार कर महफ़ूज़ को बुरी तरह घायल कर दिया .  सात सप्ताह तक अस्पताल में उनका इलाज चला और गर्दन की नसों के कट जाने से उनकी देखने और सुनने की शक्ति कमजोर हो गई . इसके बावजूद  वे यथा-सामर्थ्य लिखते रहे .

गत वर्ष अगस्त माह की तीस तारीख को चौरानबे वर्ष की आयु में अल्सर की बीमारी से काहिरा में नजीब महफ़ूज़ का  इन्तकाल हो गया .

नजीब महफ़ूज़ ने न केवल अरबी भाषा को नया उन्मेष दिया,उसमें एक किस्म  के  भाषिक-नवाचार को प्रतिष्ठा दी, बल्कि यथार्थवाद, प्रतीकात्मकता और अन्य नए प्रयोगों द्वारा अरबी उपन्यास में आधुनिकता के तत्व को समाहित किया . उन्होंने नई पीढी के  लेखकों के लिए एक ऐसी राह तैयार की जिस पर चल कर अरबी उपन्यास विश्व-साहित्य में प्रतिष्ठापूर्ण स्थान  पा सका .

महफ़ूज़ के बारे में और अधिक जानने के लिए कृपया रवि रतलामी के ब्लॉग रचनाकार पर जाकर विजय शर्मा का यह बेहतरीन लेख पढें जो  ठट्ट की ठट्ट पोस्टों के अम्बार में दबा रह गया : 

http://rachanakar.blogspot.com/2007/04/blog-post_12.html

 

गत वर्ष  महफ़ूज़ का एक उपन्यास ‘मिडक एली’ पढने का मौका मिला था और उस उपन्यास को पढ कर मैं विस्मित रह गया था .  भारत के किसी पुराने शहर के गली-कूचों  और मिस्र की राजधानी काहिरा की गलियों में मुझे कोई अंतर दिखाई नहीं दिया . इस अर्थ में वे मुझे भारतीय अनुभवों  के बहुत नजदीक लगे .

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(बहुत-से लोगों ने तस्वीर पर कयास लगाया था . ज्ञान जी ही सत्य के कुछ नजदीक निकले जिन्होंने इसे किसी साहित्यकार का चित्र बताया था . बाकी सबको यह चित्र आई.के. गुजराल साहब का लग रहा था .)

6 Responses to “दो सभ्यताओं का दुलारा बेटा”

  1. ज्ञानदत्त पाण्डेय Says:

    नजीब महफ़ूज़ जी के बारे में जानकारी के लिये आभार। उनके बारे में जान कर यह लगा कि विश्व कितना बड़ा है और ज्ञान कितना असीम! और हम कितना कम जानते हैं!

  2. अभय तिवारी Says:

    चलिये आप ने परिचय करा दिया.. अब प्रमोद भाई की डाँट का इंतज़ार है..

  3. atulkumaar Says:

    फ़ोटो देकर आपने खूब छकाया था.नजीब के बारे मै जानकारी के लिए धन्यवाद
    अतुल

  4. समीर लाल Says:

    नजीब महफ़ूज़ जी के बारे में जानकारी प्राप्त कर अच्छा लगा. आपका आभार.

  5. paramjitbali Says:

    अच्छी जानकारी दी है…धन्यवाद।

  6. मनीष Says:

    शुक्रिया महफ़ूज साहब के साहित्यिक सफ़र से हमें परिचित कराने का !

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