संकर भाषा के जन्म पर सोहर उर्फ़ डोंट टच माइ गगरिया मोहन रसिया - अंतिम भाग
हिंदी इस विशाल देश के बहुजातीय समाज की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का अखिल भारतीय माध्यम है . विभिन्न भारतीय भाषाओं और बोलियों की शब्द-सम्पदा से अनवरत पोषण पाने वाली हिंदी को आखिर अंग्रेज़ी शब्दों की क्या दरकार है ? भाषा की उदार ग्रहणशीलता और अबाध आदान-प्रदान की वकालत करते हुए जो इस संकर भाषा के पक्षपोषण में लगे हुए हैं, वे यह तथ्य छिपाते हैं कि अंग्रेज़ी शब्द जनबोलियों तथा उर्दू (अरबी-फ़ारसी) के रचे-पचे शब्दों को धकेल कर ही अपनी जगह बना रहे हैं .
सदाबहार वनों की भांति करोड़ों जीवन-रूपों को फलने-फूलने का अवसर देने वाला यह महादेश पस्त हाल है . इसकी भाषा छीज रही है . कोशिकाओं में जीवन रस सूख चला है . लाल रुधिर कणिकाएं कम से कमतर होती जा रही हैं . परम्परा से भाषा का रिश्ता टूट रहा है . हम एक समृद्ध भाषा को काम चलाने की भाषा,मनोरंजन की भाषा और बाज़ार की भाषा में बदलते देखने को अभिशप्त हैं . ऐसी मिलावटी भाषा में जो भावनाशून्य है,निर्मम है तथा जिसमें फुसलाने व बहकाने की असीम क्षमता है . यह ‘भाषा के मातृलोक’ से कटे स्मृतिहीन जन-समुदाय की भाषा है . यह उत्तरदायी नागरिकों की नहीं, विचारशून्य उपभोक्ताओं की भाषा है . बाज़ार की ज़रूरतों तथा संचार माध्यमों के दबाव के परिणामस्वरूप जन्मी यह संकर भाषा, भाषाओं के सुदीर्घ सहसंबंध का वैध प्रतिफलन न होकर घालमेल की अराजकता का अज़ब नमूना है . यह उन भ्रमित अस्मिताओं की बेतुकी भाषा है जो उत्तर-औपनिवेशिक यथार्थ और अंग्रेज़ी के साम्राज्य के साथ पटरी बैठाने की जुगत में हैं .
इस भाषा में कोई गंभीर विमर्श संभव नहीं है . दरअसल यह विचारशीलता का चक्का जाम करने वाली भाषा है . यह भाषा एमटीवी और केंचुकी फ़्राइड चिकन की अमरीकी खुराक पर पली छिन्नमूल श्वेता शेट्टियों और पार्वती खानों की खाने-कमाने की भाषा हो सकती है पर इस महादेश के सांस्कृतिक सरोकार और सामाजिक कारोबार की ‘जातीय’ भाषा नहीं .
भाषा महज अभिव्यक्ति का माध्यम भर है या इसका किसी जाति या समाज के मन-प्राण से, उसकी सामूहिक स्मृति से कोई गहरा और स्थायी रिश्ता होता है ? भाषा के संबंध विच्छेद क्या हमारी चित्तवृत्तियों में भी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है ? आचार्य शुक्ल ने 1912 में ही ‘भाषा की शक्ति’ पर विचार करते हुए नागरी प्रचारिणी पत्रिका के जनवरी अंक में लिखा था :
” भाषा ही किसी जाति की सभ्यता को सबसे अलग झलकाती है, यही उसके,हृदय के भीतरी पुरजों का पता देती है . किसी जाति को अशक्त करने का सबसे सहज उपाय उसकी भाषा को नष्ट करना है .”
होगा ! क्या करें ? सामने तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चकाचौंध है . इसकी पहुंच है,पैसा है . अनगिनत तात्कालिक लाभ हैं . और फिर समय के साथ भाषा तो बदलेगी ही . कब तक ‘मैया कबहुं बढेगी चोटी’ लिखते रहें ? अब तो बच्चों तक को दूध इस तरह पिलाया जाता है :
दूध , दूध ,दूध , दूध
पियो glassful
दूध , दूध ,दूध , दूध
दूध है wonderful
पी सकते हैं रोज़ glassful
दूध , दूध , दूध , दूध
गर्मी में डालो दूध में ice
दूध बन गया very nice
पियो daily once or twice
मिल जाएगा tasty surprise
पियो must in every season
पियो दूध for every reason
रहोगे फिर fit and fine
जिओगे past ninty nine
दूध , दूध , दूध , दूध
चारों ओर मच गया शोर
Give me more
Give me more
दूध , दूध , दूध , दूध
यह भारत के सबसे बड़े और सबसे सफल सहकारिता आंदोलन की भाषा है .
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July 31, 2007 at 5:24 am
बहुत सटीक विश्लेशण.
July 31, 2007 at 8:33 am
अंततक पूर्णत: सहमत. यह जरूर लगा रहा कि आप किसी न किसी “क्रमश:” में हम जैसों को लंगड़ी जरूर मारेंगे. पर वह नहीं हुआ.
और यह ट्टू वाली भाषा की दूध वाली कविता पर हम भी सोहर नहीं गाने जा रहे!
बहुत अच्छा लिखा है.
हां, मुझे यह यकीन है कि “दिल मांगे मोर” वाले हमारी भाषायी पहचान नष्ट नहीं कर पायेंगे.
July 31, 2007 at 9:14 am
मैथिली जी : आपको अच्छा लगा तो मेहनत सफल-सार्थक हुई . आपकी टिप्पणी विशेष महत्व रखती है .
ज्ञान जी : आज तो ब्लॉगरी-जीवन कृतार्थ हो गया आपका यह पूर्ण सहमति का उद्घोष सुनकर . तरस रहा था बहुत दिनों से . स्वभावतः मैं लंगड़ीमार नहीं हूं . बहुत ज़रूरी होने पर ही लंगड़ी मारता हूं . मीर की भाषा में कहूं तो :
अपना शेवा कजी नहीं,यूं तो
यार जी टेढे़ बांके हम भी हैं
आप दोनों के इस अनुमोदन-समर्थन को मैं आशीर्वाद की तरह ग्रहण करता हूं , वाज़िब विनम्रता के साथ .
July 31, 2007 at 12:26 pm
बढ़िया लेख.. मगर आप इस भाषा के पीछे क्यों पड़ गए हैं भाई.. मेरे कान्वेन्ट एडुकेटेड फ़्रेंड्स जो मीडिया में टॉप पोजीशन्स पर बैठे हैं.. कॉपीराइटर हैं.. स्क्रिप्टराइटर हैं.. डायलॉग राइटर हैं.. उनके प्रति रहम कीजिये.. वे बेचारे वंचित वर्ग के लोग हैं.. उनके घर में न भाषा बन रही है न मिठाई.. वो क्या करें कहाँ जाएं.. तो वे इस नई भाषा का अविष्कार कर रहे हैं.. और डरोफ़ाई करोफ़ाई लिख लिख कर वाहवाहे लूट रहे हैं.. पैसे बटोर रहे हैं… आप क्यों उनकी पार्टी में बम फेंक रहे हैं..
और ऐसा सिर्फ़ इसीलिए हो रहा है कि अब वो ज़माना नहीं रहा कि आप इंगलिश में नमक की तरह हिंदी/ उर्दू मिला कर देवयानी की तरह हिट हों जाय.. बड़े मीडिया की भाषा तो हिंदी ही है.. फ़िल्म/ टी वी/ विज्ञापन.. हिंदी में ही बनेंगे.. तो झक मार कर समीकरण को उलटाना पड़ा है.. और कोशिश है कि इतना नमक भर दो कि लोग कहें.. कि देवयानी वाली भाषा ही लाओ..
चाहता हूँ कि ज्ञान भाई की बात सही हो.. पर भविष्य ने क्या छिपा रखा है कौन जानता है..
July 31, 2007 at 12:53 pm
@ अभय तिवारी : ज्ञान जी की बात ही सही हो मेरे भाई . क्यों डराते हो ,वैसे ही अपन क्या कम डरे हुए हैं .
July 31, 2007 at 3:56 pm
बहुत सही लगी आपकी ये श्रृंखला ! अपनी बात करूँ तो..कभी कभी लिखते वक्त हिंदी शब्दों के प्रयोग के बजाए उसके ज्यादा प्रचलित अंग्रेजी संस्करण का इस्तेमाल करने का लोभ मन में चलता रहता है। आज ही अपने लेख में मुझे ये निर्णय लेने में कठिनाई हो रही थी की कक्षा या क्लॉस या फिर माध्यम की जगह मीडियम का प्रयोग करूँ।
August 1, 2007 at 5:01 am
@ मनीष : प्रिय भाई आपके संशय और लोभ सही हैं और आपकी आत्मस्वीकृति ईमानदार . हम सब इस प्रक्रिया से रोज़ाना गुज़रते हैं . जो शब्द ‘नैचुरलाइज़्ड’ हैं उनके इस्तेमाल में कोई बुराई नहीं है,बल्कि वे ज्यादा स्वाभाविक लगते हैं. पास,फ़ेल,रेल,जेल,बस,कार,इंजन, ड्राइवर, गार्ड, डॉक्टर, इंजीनियर आदि-आदि शब्द तो अब प्रयोग करते-करते इतने अपने हो गए हैं कि किसी दूसरी भाषा के लगते ही नहीं है .
विरोध शब्दों के आदान-प्रदान का नहीं है,बल्कि उस प्रक्रिया का है जिसके जरिये ऐसा किया जा रहा है . उस कार्यसूची का है जिसके तहत बड़े आक्रामक तरीके से इसे प्रायोजित किया जा रहा है . आदान-प्रदान समझदारी का मामला और द्विपक्षीय कार्य-व्यापार है,कोई इकतरफ़ा मामला नहीं है . इस आरोपित और मीडिया-प्रोत्साहित ‘कोड-मिक्सिंग’ से भाषाई सौन्दर्य और द्विभाषिकता की सामर्थ्य नष्ट हो रही है तथा संकरता बढ रही है .