मैंने सात बार ……..
खलील जिब्रान का सुभाषित गद्यकाव्य
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मैंने सात बार अपनी आत्मा से घृणा की
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मैंने सात बार अपनी आत्मा से घृणा की :
प्रथम : जब मैंने उसे उच्चता-प्राप्ति की अभिलाषा में हतोत्साह पाया ;
द्वितीय : जब मैंने उसे अपंग के सामने लंगड़ाते पाया ;
तृतीय : जब उसे सरल या कठिन का चुनाव करना था और उसने
सरल को चुना ;
चतुर्थ : जब उसने एक पाप किया और यह सोचकर संतोष कर लिया
कि अन्य भी यह पाप करते हैं ;
पांचवीं बार : जब कमज़ोरी के प्रति उसने धैर्य दिखाया और अपनी इस
धैर्यशीलता को शक्ति का प्रतीक बताया ;
छठी बार : जब उसने एक चेहरे की विद्रूपता पर घृणा की दृष्टि डाली
और यह न समझा कि यह उसी का एक रूप है ;
और सातवीं बार तब : जब उसने प्रशंसा का एक गीत गाया और इसे
अपना ‘गुण’ व्यक्त किया ।
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खलील जिब्रान (१८८३-१९३१) : विश्वविख्यात लेखक,कवि,चित्रकार और दार्शनिक . सीरिया के माउंट लेबनान प्रांत में जन्म . अरबी और अंग्रेज़ी में लेखन . ‘दि प्रोफ़ेट’ उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना मानी जाती है . बलिष्ठ कल्पना-शक्ति के कवि खलील जिब्रान गद्य-काव्य की एक नई शैली के उन्नायक थे . वे उस परम्परा के कवि थे जिससे सूफ़ी-संत-मनीषी और ज्ञानी जन आते हैं .
July 13, 2007 at 3:57 pm
सभी आत्मसात और चिंतन योग्य संपूर्ण सुभाषित. आभार इन्हें पेश करने के लिये.