दो अनुभव

 

भवानी भाई की एक कविता

 

दो अनुभव

 

विच्छिन्न करता हूं

अपने को जब

दूसरों से

 

तो खिन्न करता हूं

अपने को और

दूसरों को

 

अभिन्न करता हूं

अपने को

जब दूसरों से

 

ऊसरों से तब जैसे

हरीतिमा फूटती है

 

घास की पत्ती-पत्ती से

चांदनी छूटती है !

 

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