Archive for June, 2007

कोलकाता का हिंदी रंगमंच - 4

June 1, 2007

 1976 में रंगकर्मी ने कोलकाता के नाट्य परिदृश्य में ‘एंट्री’ ली और सबसे सक्रिय नाट्यदल के रूप में उभरकर आया । पिछले पच्चीस वर्षों में उषा गांगुली जैसे समर्पित रंग व्यक्तित्व और संगठनकर्ता के नेतृत्व में ‘महाभोज’, ‘लोक कथा’, ‘होली’, ‘वामा’, ‘कोर्ट मार्शल’, ‘रूदाली’, ‘खोज’ व ‘बेटी आई’ के प्रदर्शन के साथ यह राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण नाट्य दल के रूप में सराहा जाता है ।

‘हिम्मत माई’ व ‘शोभा यात्रा’ के मंचन के पश्चात उषा गांगुली ने न केवल एक समर्थ अभिनेत्री और सफल निर्देशक के रूप में वरन विशिष्ट नाट्य समालोचक एवं व्याख्याकार के रूप में भी अपने को स्थापित किया है । उषा गांगुली ने हिन्दी रंगमंच को अधिक जनोन्मुख तो बनाया ही, साथ ही बांग्ला रंगमंच की गौरवशाली परंपरा से गहरे जुड़े बांग्लाभाषी दर्शकों के बीच भी हिन्दी नाटकों को प्रतिष्ठा प्रदान की । अभी हाल ही में काशीनाथ सिंह की सुप्रसिद्ध रचना पर ‘काशीनामा’ और मंटो की कहानियों पर आधारित तीन नाटकों की श्रंखला के सफल मंचन द्वारा उन्होंने अपनी निर्देशकीय क्षमता को प्रदर्शित किया है ।  

कोलकाता की एक शताब्दी से चली आ रही हिन्दी रंग परंपरा के ध्वजवाहक के रूप में लगभग एक दर्जन नाट्य दल अपनी सक्रियता से इसे पुष्ट कर रहे हैं । महेश जायसवाल ने अपने नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से हिन्दीभाषी समाज को जन संस्कृति के वृहत्तर सरोकारों से जोड़ा है । विपरीत परिस्थितियों में भी प्रताप जायसवाल ने न केवल अपनी टोली ‘अभिनय’ को बचाए रखा, बल्कि ‘मिस्टर अभिमन्यु’,   ‘रावणलीला’ व ‘दुस्समय’ जैसी कई नाट्य प्रस्तु्तियों के माध्यम से हस्तक्षेप जारी रखा । स्पंदन, लिटिल थैस्पीयन, रंगकृति, प्रयास, कला सृजन अकादमी, नीलांबरकलाकार जैसी रंग संस्थाएं लगातार अपनी उपस्थिति का अहसास कराती रही हैं ।  

 सामूहिकता और सृजनात्मकता के लिए यह कठिन समय है । नाटक की तो संरचना ही सामूहिकता और सृजनात्मकता के पायों पर टिकी है । नाटक के होने का अर्थ है एकांतिकता और बंजरपन का न होना । एक समर्थ नाट्य आंदोलन जीवंत और गतिशील समाज की पहचान है ।

जिस भाषा में श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल और उषा गांगुली जैसे तपे हुए नाट्य व्यक्तित्व सक्रिय हों,जिसमें नाट्य शोध संस्थान जैसी अद्वितीय संस्था का अस्तित्व हो, जिसमें आज भी संसाधनों के अभाव के बावजूद  सामूहिकता के बल पर नाटकों का मंचन संभव हो तो गैरजरूरी हताशा का कोई कारण दिखाई नहीं देता ।

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                                                                              ( समाप्त)