नियमावलियां
बच्चन की एक कविता
नियमावलियां
ये संस्थाएं हैं
ये नियमावलियों में बंधकर ही जीती हैं
पर जीवन ?
नियमावलियों में बंधकर मरेगा नहीं
तो रोगी होगा ।
मैंने नियमों को तोड़ा है
मुझे जेल में डाल दो , दरोगा ।
जेल की सलाखें
नियमावलियों से मुलायम होंगी
इसे जानते हैं सब भुक्तभोगी ।
मैं उन्हें तोड़कर निकलूंगा
और तंदुरस्त , और निरोगी ।
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June 28, 2007 at 11:12 am
भई वाह!
June 28, 2007 at 1:01 pm
साधुवाद इस अनूठी रचना को पेश करने के लिये.
June 29, 2007 at 8:08 am
नियम तो सेल्फ इम्पोज्ड डिसिप्लिन होते हैं. अगर उनका पालन पुष्ट करता हो तो ठीक. अन्यथा तोड कर दूसरे नियम बनाने के लिये व्यक्ति स्वतंत्र है.
ये जेल-दारोगा तो पता नहीं, पर रिजोल्यूशन हम ढ़ेरों बनाते-तोड़ते हैं! बच्चनजी जिन संस्थाओं की बात कर रहे होगे वे (या उस तरह की अन्य) अब तक मर चुकी होंगी.
कवितायें आप बड़े काम की लाते हैं. धन्यवाद.