नियमावलियां

 

बच्चन की एक कविता

 

नियमावलियां

 

ये संस्थाएं हैं

ये नियमावलियों में बंधकर ही जीती हैं

पर जीवन ?

नियमावलियों में बंधकर मरेगा नहीं

तो रोगी होगा ।

मैंने नियमों को तोड़ा है

मुझे जेल में डाल दो ,  दरोगा ।

जेल की सलाखें

नियमावलियों से मुलायम होंगी

इसे जानते हैं सब भुक्तभोगी ।

मैं उन्हें तोड़कर निकलूंगा

और तंदुरस्त , और निरोगी ।

 

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3 Responses to “नियमावलियां”

  1. अभय तिवारी Says:

    भई वाह!

  2. समीर लाल Says:

    साधुवाद इस अनूठी रचना को पेश करने के लिये.

  3. Gyandutt Pandey Says:

    नियम तो सेल्फ इम्पोज्ड डिसिप्लिन होते हैं. अगर उनका पालन पुष्ट करता हो तो ठीक. अन्यथा तोड कर दूसरे नियम बनाने के लिये व्यक्ति स्वतंत्र है.
    ये जेल-दारोगा तो पता नहीं, पर रिजोल्यूशन हम ढ़ेरों बनाते-तोड़ते हैं! बच्चनजी जिन संस्थाओं की बात कर रहे होगे वे (या उस तरह की अन्य) अब तक मर चुकी होंगी.
    कवितायें आप बड़े काम की लाते हैं. धन्यवाद.

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