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	<title>Comments on: गालियों का शिक्षाशास्त्र-2</title>
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		<title>By: अनूप शुक्ल</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/06/26/priyankar-on-abuses2/#comment-137</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 01 Jul 2007 05:26:15 +0000</pubDate>
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		<description>अच्छा लिखा है। बहुत पहले मैंने &lt;a href=&quot;http://hindini.com/fursatiya/?p=55&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt;गालियों के सामाजिक महत्व&lt;/a&gt; के बारे में लिखा था। देखियेगा उसे भी अगर अभी तक न देखा हो। :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्छा लिखा है। बहुत पहले मैंने <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=55" rel="nofollow">गालियों के सामाजिक महत्व</a> के बारे में लिखा था। देखियेगा उसे भी अगर अभी तक न देखा हो। <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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		<title>By: अफ़लातून</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/06/26/priyankar-on-abuses2/#comment-126</link>
		<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 11:58:25 +0000</pubDate>
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		<description>आधा गाँव , झीनी-झीनी बीनी चदरिया,नाच्यौ बहुत गोपाल जैसी रचनाओं को पुरस्कार न मिलने का कारण भी क्या उनमें कही गयीं गालियाँ हैं ? अगर यह सच है, तब उस मानसिकता का खुद को मानकर नारद संचालक तुष्ट हों लें । राहुल में गरियाने की क्षमता को आप सिरे से खारिज न करें ।लिखी हुई अँग्रेजी में जैसे कुछ अक्षर &#039;साइलेन्ट&#039; होते हैं , वैसे ही शब्दों को साइलेन्ट रख भी गाली प्रस्तुत की जा सकती है । दमदार चिट्ठाकार अनामदास ने दिल्ली पर लिखी एक सुन्दर कविता में इस शैली का मौलिक प्रयोग किया है । मैंने उनसे नकल कर पिछले चुनाव में प्रयुक्त नारे को श्लील बनाने में अनामदास-विधि का प्रयोग किया है ।
गालियों पर चर्चा का एक साँस्कृतिक पक्ष भी काबिले चर्चा है ।अधिकतर गालियाँ स्त्री पर हमला करने वाली क्यों होती है? अक्सर पुरुष द्वारा पुरुष को दी जा रही हो फिर भी!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आधा गाँव , झीनी-झीनी बीनी चदरिया,नाच्यौ बहुत गोपाल जैसी रचनाओं को पुरस्कार न मिलने का कारण भी क्या उनमें कही गयीं गालियाँ हैं ? अगर यह सच है, तब उस मानसिकता का खुद को मानकर नारद संचालक तुष्ट हों लें । राहुल में गरियाने की क्षमता को आप सिरे से खारिज न करें ।लिखी हुई अँग्रेजी में जैसे कुछ अक्षर &#8216;साइलेन्ट&#8217; होते हैं , वैसे ही शब्दों को साइलेन्ट रख भी गाली प्रस्तुत की जा सकती है । दमदार चिट्ठाकार अनामदास ने दिल्ली पर लिखी एक सुन्दर कविता में इस शैली का मौलिक प्रयोग किया है । मैंने उनसे नकल कर पिछले चुनाव में प्रयुक्त नारे को श्लील बनाने में अनामदास-विधि का प्रयोग किया है ।<br />
गालियों पर चर्चा का एक साँस्कृतिक पक्ष भी काबिले चर्चा है ।अधिकतर गालियाँ स्त्री पर हमला करने वाली क्यों होती है? अक्सर पुरुष द्वारा पुरुष को दी जा रही हो फिर भी!</p>
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		<title>By: raviratlami</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/06/26/priyankar-on-abuses2/#comment-124</link>
		<dc:creator>raviratlami</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 11:24:29 +0000</pubDate>
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		<description>आपका कहना सही है.

मैं पहले भी कहीं पर यह टिप्पणी कर चुका हूं - मेरा बचपन ऐसे मुहल्ले में गुजरा है जहाँ बच्चा मां की गाली बोलना पहले सीखता है - बजाए मां बोलने के. फिर भी, मेरे मुँह से गाली नहीं निकलती....

और, प्रसंगवश, आज ही भास्कर में जयप्रकाश चौकसे का लेख छपा है जिसमें किसी गांधीवादी व्यक्ति का किस्सा उन्होंने बताया है कि वह ताउम्र मृदुभाषी था. मृत्यु शय्या पर कोमा में जाते जाते उस गांधी वादी व्यक्ति के मुँह से तमाम गंदी गालियों के अलावा कुछ नहीं निकला था....</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका कहना सही है.</p>
<p>मैं पहले भी कहीं पर यह टिप्पणी कर चुका हूं &#8211; मेरा बचपन ऐसे मुहल्ले में गुजरा है जहाँ बच्चा मां की गाली बोलना पहले सीखता है &#8211; बजाए मां बोलने के. फिर भी, मेरे मुँह से गाली नहीं निकलती&#8230;.</p>
<p>और, प्रसंगवश, आज ही भास्कर में जयप्रकाश चौकसे का लेख छपा है जिसमें किसी गांधीवादी व्यक्ति का किस्सा उन्होंने बताया है कि वह ताउम्र मृदुभाषी था. मृत्यु शय्या पर कोमा में जाते जाते उस गांधी वादी व्यक्ति के मुँह से तमाम गंदी गालियों के अलावा कुछ नहीं निकला था&#8230;.</p>
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		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/06/26/priyankar-on-abuses2/#comment-122</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 10:32:21 +0000</pubDate>
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		<description>राहुल एक खाते-पीते उच्च-मध्यवर्गीय परिवार का लड़का दिखता है . जिसने उस तरह की तकलीफ़ें नहीं देखीं-भोगीं जैसी तकलीफ़ें रोज़ी-रोटी के लिए लड़ते लाखों निम्न और निम्न-मध्यवर्ग के लड़के भोगते हैं . और इस व्यवस्था के लिए तीखी और मौलिक गालियां ईज़ाद करते हैं .राहुल इसीलिए गालियों की दृष्टि से फ़िसड्डी है .तभी तो नशे में भी उसे ‘गंदा नैपकिन’ जैसी कमज़ोर किस्म की गाली सूझी . यह भी कोई गाली हुई भला .....

ये हुई चर्चा की दिशा- अच्‍छी रचनाए गिनाईं पर &#039;उस वर्ग&#039; की रचनाएं छोड़ गए लगता है- मसलन कृष्‍ण वलदेव वैद की &#039;विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहॉं&#039; वहॉं मिलेंगी राहुल वाली गालियॉं और हॉं वहॉं भी वे प्रभावोत्‍पादकता बढ़ाती ही हैं, और मुझे राहत महसूस हो रही है कि आपने नैपकिन का अर्थ &#039;वो&#039; नैपकिन लिया - &#039;विमल...&#039; के बाद नैपकिन का अर्थ सेनीटरी नैपकिन हो जाता और समाजशास्‍त्र बदल जाता...नहीं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>राहुल एक खाते-पीते उच्च-मध्यवर्गीय परिवार का लड़का दिखता है . जिसने उस तरह की तकलीफ़ें नहीं देखीं-भोगीं जैसी तकलीफ़ें रोज़ी-रोटी के लिए लड़ते लाखों निम्न और निम्न-मध्यवर्ग के लड़के भोगते हैं . और इस व्यवस्था के लिए तीखी और मौलिक गालियां ईज़ाद करते हैं .राहुल इसीलिए गालियों की दृष्टि से फ़िसड्डी है .तभी तो नशे में भी उसे ‘गंदा नैपकिन’ जैसी कमज़ोर किस्म की गाली सूझी . यह भी कोई गाली हुई भला &#8230;..</p>
<p>ये हुई चर्चा की दिशा- अच्‍छी रचनाए गिनाईं पर &#8216;उस वर्ग&#8217; की रचनाएं छोड़ गए लगता है- मसलन कृष्‍ण वलदेव वैद की &#8216;विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहॉं&#8217; वहॉं मिलेंगी राहुल वाली गालियॉं और हॉं वहॉं भी वे प्रभावोत्‍पादकता बढ़ाती ही हैं, और मुझे राहत महसूस हो रही है कि आपने नैपकिन का अर्थ &#8216;वो&#8217; नैपकिन लिया &#8211; &#8216;विमल&#8230;&#8217; के बाद नैपकिन का अर्थ सेनीटरी नैपकिन हो जाता और समाजशास्‍त्र बदल जाता&#8230;नहीं।</p>
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		<title>By: मैथिली</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/06/26/priyankar-on-abuses2/#comment-121</link>
		<dc:creator>मैथिली</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 09:58:43 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;खाते-पीते उच्च-मध्यवर्गीय परिवार का लड़का, जिसने उस तरह की तकलीफ़ें नहीं देखीं-भोगीं जैसी तकलीफ़ें रोज़ी-रोटी के लिए लड़ते लाखों निम्न और निम्न-मध्यवर्ग के लड़के भोगते हैं . और इस व्यवस्था के लिए तीखी और मौलिक गालियां ईज़ाद करते हैं. इसीलिए वह गालियों की दृष्टि से फ़िसड्डी है . तभी तो नशे में भी उसे ‘गंदा नैपकिन’ जैसी कमज़ोर किस्म की गाली सूझी . यह भी कोई गाली हुई भला .&quot; 

आपके लेख के दोनों भाग बहुत अच्छे बन पड़े हैं.

और काकेश जी, आप भी रंगकर्मी रह चुके हैं!
</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;खाते-पीते उच्च-मध्यवर्गीय परिवार का लड़का, जिसने उस तरह की तकलीफ़ें नहीं देखीं-भोगीं जैसी तकलीफ़ें रोज़ी-रोटी के लिए लड़ते लाखों निम्न और निम्न-मध्यवर्ग के लड़के भोगते हैं . और इस व्यवस्था के लिए तीखी और मौलिक गालियां ईज़ाद करते हैं. इसीलिए वह गालियों की दृष्टि से फ़िसड्डी है . तभी तो नशे में भी उसे ‘गंदा नैपकिन’ जैसी कमज़ोर किस्म की गाली सूझी . यह भी कोई गाली हुई भला .&#8221; </p>
<p>आपके लेख के दोनों भाग बहुत अच्छे बन पड़े हैं.</p>
<p>और काकेश जी, आप भी रंगकर्मी रह चुके हैं!</p>
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		<title>By: Sanjeet Tripathi</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/06/26/priyankar-on-abuses2/#comment-120</link>
		<dc:creator>Sanjeet Tripathi</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 09:46:43 +0000</pubDate>
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		<description>शानदार!!

कहां से शुरु कर कहां अंत किया है, बहुत खूब!!

इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर उपरोक्त लेखकों के बताए गए उपन्यास से पात्रों की गालियां अगर हटा दिए जाए तो स्वाभाविकता खत्म होती सी प्रतीत होगी!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शानदार!!</p>
<p>कहां से शुरु कर कहां अंत किया है, बहुत खूब!!</p>
<p>इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर उपरोक्त लेखकों के बताए गए उपन्यास से पात्रों की गालियां अगर हटा दिए जाए तो स्वाभाविकता खत्म होती सी प्रतीत होगी!!</p>
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		<title>By: kakesh</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/06/26/priyankar-on-abuses2/#comment-119</link>
		<dc:creator>kakesh</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 08:50:51 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;आधा गांव&quot; मेरी फैवरैट रचनाओं में हैं.. मैने इसका जिक्र http://kakesh.wordpress.com/2007/03/18/aachar_sanheeta/ पर किया भी था.... राही मासूम रजा की जो अन्य रचनाऎं है वो भी उतनी ही प्रिय हैं चाहे वो टोपी शुक्ला हो या दिल एक सादा कागज .. मैला आंचल तो खैर है ही आंचलिकता के इतिहास में मील का पत्थर ..आपने रंगमंच वाले लेखों मं इसका जिक्र भी किया था कि श्यामानंद जालान इसी तरह का खुलापन ना मिल पाने के कारण कला मंदिर से अलग हुए थे.. मैने &quot;सखाराम बाइंडर&quot; का मंचन एक बार किया था ..वो भी अपने किस्म का बोल्ड नाटक है... उग्र जी की रचनाऎं कहां मिलेंगी ..उसका कोई ठिकाना बतायें...उन्हे अब तक नहीं पढ़ा ..मेरा दुर्भाग्य है...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;आधा गांव&#8221; मेरी फैवरैट रचनाओं में हैं.. मैने इसका जिक्र <a href="http://kakesh.wordpress.com/2007/03/18/aachar_sanheeta/" rel="nofollow">http://kakesh.wordpress.com/2007/03/18/aachar_sanheeta/</a> पर किया भी था&#8230;. राही मासूम रजा की जो अन्य रचनाऎं है वो भी उतनी ही प्रिय हैं चाहे वो टोपी शुक्ला हो या दिल एक सादा कागज .. मैला आंचल तो खैर है ही आंचलिकता के इतिहास में मील का पत्थर ..आपने रंगमंच वाले लेखों मं इसका जिक्र भी किया था कि श्यामानंद जालान इसी तरह का खुलापन ना मिल पाने के कारण कला मंदिर से अलग हुए थे.. मैने &#8220;सखाराम बाइंडर&#8221; का मंचन एक बार किया था ..वो भी अपने किस्म का बोल्ड नाटक है&#8230; उग्र जी की रचनाऎं कहां मिलेंगी ..उसका कोई ठिकाना बतायें&#8230;उन्हे अब तक नहीं पढ़ा ..मेरा दुर्भाग्य है&#8230;</p>
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