गालियों का शिक्षाशास्त्र-2
हिंदी साहित्य गालियों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है . पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ से लेकर फ़णीश्वरनाथ रेणु, राही मासूम रज़ा,जगदम्बाप्रसाद दीक्षित,काशीनाथ सिंह,अब्दुल बिस्मिल्लाह आदि ने अपने साहित्य में गालियों का भरपूर प्रयोग किया है . शुचितावादियों के गुल-गपाड़े के बावजूद इन अत्यंत महत्वपूर्ण लेखकों का विश्वसनीय पाठक-समुदाय रहा है .
पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की गर्म पकौड़ी पर तो उनकी शिकायत पं बनारसीदास चतुर्वेदी के माध्यम से गांधी जी तक पहुंची थी . चतुर्वेदी जी उग्र जी के साहित्य को घासलेटी साहित्य मानते थे . पर सौभाग्य से गांधी जी न केवल इस बात से सहमत नहीं हुए बल्कि उन्होंने अपने हाथ से उग्र जी के पक्ष में लिख कर दिया .
रेणु जी ने भी आंचलिकता का जादू रचने में अपशब्दों से परहेज नहीं किया . तभी तो वे मैला आंचल के बारे में लिखते हैं कि ‘इसमें धूल भी है और शूल भी . सुगंध भी है और दुर्गंध भी’ . उन्होंने किसी से भी अपना दामन नहीं बचाया है . रेणु की कहानियों को लें तो ‘नैना जोगन’ की रतनी बहुत भद्दी और अश्लील गालियां बकती है . पर उसके पीछे का मनोविज्ञान समझते ही वे गालियां हमें अश्लील नहीं लगतीं . रेणु जी ने ठीक ही लिखा है कि ” कोई जादू जानती है सचमुच रतनी! कोई शब्द उसके मुंह में अश्लील नहीं लगता।” जबकि इसके उलट ‘एक आदिम रात्रि की महक ‘ में घोष बाबू की गालियां सुनकर करमा का खून खौलने लगता है .
‘लाल पान की बेगम’ में बिरजू का पिता बैलों को भद्दी-भद्दी गालियां देता है पर गांव की पतोहुओं को देख उसे अपने खेत की झुकी हुई बालियां याद हो आती हैं . यह है दृष्टि की पवित्रता . ‘तीसरी कसम’ में यह गालियां देने वाला ग्राम-समाज किस तरह कंपनी की पतुरिया में अपनी सिया-सुकुमारी खोज लेता है यह गालियों की ऊपरी दृश्य सतह के परे जाकर उस पवित्र मन-मानस की अन्तःपरतों को सहानुभूति से समझने पर ही जान सकिएगा .
राही मासूम रज़ा का ‘आधा गांव’ गालियों के कारण बहुत चर्चा में रहा . हटाए जाने के पहले यह दो विश्वविद्यालयों (जोधपुर और मराठवाड़ा) के पाठ्यक्रम में भी रहा . इसका जवाब देते हुए राही मासूम रज़ा ने कहा था कि मेरे पात्र वही बोलेंगे जो वे आम ज़िंदगी में बोलते आये हैं . वे यदि गीता के श्लोक बोलेंगे तो मैं उनके मुंह से वह बुलवाऊंगा और यदि वे आम ज़िंदगी में गालियां देते हैं तो वे उपन्यास में भी गालियां देते ही दिखेंगे .
उन्होंने कहा कि ‘आधा गांव’ में बेशुमार गालियां हैं . पर यह उपन्यास जीवन की तरह पवित्र है . जबकि ‘टोपी शुक्ला’ में (उनका एक अन्य उपन्यास) एक भी गाली नहीं है. पर यह पूरा उपन्यास ही एक भद्दी गाली है जिसे मैं डंके की चोट बक रहा हूं . निश्चय ही राही साहब की बात के मर्म को समझा जाना चाहिए . गाली शब्द में नहीं नीयत में होती है .
अब्दुल बिस्मिल्लाह की ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ गरीब बुनकरों के जीवन-संघर्ष का अनूठा आख्यान है . निश्चित रूप से उसमें उनकी बोली-बानी आएगी ही . अब अगर गालियां उनकी रोज़मर्रा की बात-चीत का अभिन्न हिस्सा हैं तो लेखक उनसे कैसे बचेगा . और बचने पर वह क्या उस ‘लोकैल’ को हूबहू रच सकेगा . नागर जी जैसे समर्थ लेखक ने उक्त उपन्यास में अब्दुल बिस्मिल्लाह के गालियों के प्रयोग को जायज़ और स्वाभाविक ठहराया है .
आधा गांव में एक छोटे ज़मींदार हैं फ़ुन्नन मियां . खूब गालियां देने वाले अनपढ और खांटी आदमी . बात के पक्के आला दर्ज़े के आदमी और जबर्दस्त लठैत . देश विभाजन और पाकिस्तान के पक्ष में पढे-लिखे लोगों की दलीलों का अपनी अतुलनीय गाली-गलौज़ से भरी शैली में वे जो प्रत्यख्यान रचते हैं वैसा अन्यत्र दुर्लभ है .
तो साहिबानो! गाली शब्द में नहीं नीयत में होती है . गाली का एक वर्ग-चरित्र होता है . जैसे संजय को दी गई राहुल की गाली से उसका वर्ग-चरित्र पकड़ में आता है . राहुल एक खाते-पीते उच्च-मध्यवर्गीय परिवार का लड़का दिखता है . जिसने उस तरह की तकलीफ़ें नहीं देखीं-भोगीं जैसी तकलीफ़ें रोज़ी-रोटी के लिए लड़ते लाखों निम्न और निम्न-मध्यवर्ग के लड़के भोगते हैं . और इस व्यवस्था के लिए तीखी और मौलिक गालियां ईज़ाद करते हैं .राहुल इसीलिए गालियों की दृष्टि से फ़िसड्डी है .तभी तो नशे में भी उसे ‘गंदा नैपकिन’ जैसी कमज़ोर किस्म की गाली सूझी . यह भी कोई गाली हुई भला .
हम जिस वर्ग के आदमी हैं उसमें तो हम या हम जैसे अन्य लोग हाथ गंदे होने पर गांव में रहने पर राख या पड़ुआ माटी से और कस्बे-शहर में रहने पर हद-से-हद कार्बोलिक एसिड वाले लाल लाइफ़बॉय से अपने हाथ धो लेते हैं . बहुत हुआ तो शहर का नया हैल्थ-कांशस उपभोक्ता वर्ग डेटॉल साबुन का इस्तेमाल कर लेता है .
कभी-कभी पार्टी आदि में नैपकिन व्यवहार करने के बावज़ूद यह नैपकिन वाला वर्ग और है . फ़ाइव स्टार कल्चर की नकल में बनता हुआ वर्ग . उससे हमारा थोड़ा-बहुत साबका है . जब कभी हम अपने मध्यवर्गीय परिवेश की हदें पार कर उस वर्ग के बीच उठते-बैठते हैं तो हमारा सम्पर्क इस वर्ग और उसके चरित्र से होता है . पर अन्ततः यह पक्का है कि यह हमारा वर्ग नहीं है . यह नैपकिन वाली गाली इसी यूज़ एण्ड थ्रो कल्चर से उपजी गाली है . भगवान जाने गाली है भी या नहीं .
गाली रचने के लिए भी बहुत रचनात्मकता चाहिए होती है ,जिसकी संभावना मुझे राहुल में उसकी भाषा-शैली को देखते हुए कम ही दिखती है . राहुल की धर्मनिरपेक्षता पर मुझे कोई शक नहीं है,पर उसकी गाली देने की क्षमता अत्यंत संदिग्ध है . उसे इस दिशा में अभी और मेहनत करनी होगी .
June 26, 2007 at 8:50 am
“आधा गांव” मेरी फैवरैट रचनाओं में हैं.. मैने इसका जिक्र http://kakesh.wordpress.com/2007/03/18/aachar_sanheeta/ पर किया भी था…. राही मासूम रजा की जो अन्य रचनाऎं है वो भी उतनी ही प्रिय हैं चाहे वो टोपी शुक्ला हो या दिल एक सादा कागज .. मैला आंचल तो खैर है ही आंचलिकता के इतिहास में मील का पत्थर ..आपने रंगमंच वाले लेखों मं इसका जिक्र भी किया था कि श्यामानंद जालान इसी तरह का खुलापन ना मिल पाने के कारण कला मंदिर से अलग हुए थे.. मैने “सखाराम बाइंडर” का मंचन एक बार किया था ..वो भी अपने किस्म का बोल्ड नाटक है… उग्र जी की रचनाऎं कहां मिलेंगी ..उसका कोई ठिकाना बतायें…उन्हे अब तक नहीं पढ़ा ..मेरा दुर्भाग्य है…
June 26, 2007 at 9:46 am
शानदार!!
कहां से शुरु कर कहां अंत किया है, बहुत खूब!!
इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर उपरोक्त लेखकों के बताए गए उपन्यास से पात्रों की गालियां अगर हटा दिए जाए तो स्वाभाविकता खत्म होती सी प्रतीत होगी!!
June 26, 2007 at 9:58 am
“खाते-पीते उच्च-मध्यवर्गीय परिवार का लड़का, जिसने उस तरह की तकलीफ़ें नहीं देखीं-भोगीं जैसी तकलीफ़ें रोज़ी-रोटी के लिए लड़ते लाखों निम्न और निम्न-मध्यवर्ग के लड़के भोगते हैं . और इस व्यवस्था के लिए तीखी और मौलिक गालियां ईज़ाद करते हैं. इसीलिए वह गालियों की दृष्टि से फ़िसड्डी है . तभी तो नशे में भी उसे ‘गंदा नैपकिन’ जैसी कमज़ोर किस्म की गाली सूझी . यह भी कोई गाली हुई भला .”
आपके लेख के दोनों भाग बहुत अच्छे बन पड़े हैं.
और काकेश जी, आप भी रंगकर्मी रह चुके हैं!
June 26, 2007 at 10:32 am
राहुल एक खाते-पीते उच्च-मध्यवर्गीय परिवार का लड़का दिखता है . जिसने उस तरह की तकलीफ़ें नहीं देखीं-भोगीं जैसी तकलीफ़ें रोज़ी-रोटी के लिए लड़ते लाखों निम्न और निम्न-मध्यवर्ग के लड़के भोगते हैं . और इस व्यवस्था के लिए तीखी और मौलिक गालियां ईज़ाद करते हैं .राहुल इसीलिए गालियों की दृष्टि से फ़िसड्डी है .तभी तो नशे में भी उसे ‘गंदा नैपकिन’ जैसी कमज़ोर किस्म की गाली सूझी . यह भी कोई गाली हुई भला …..
ये हुई चर्चा की दिशा- अच्छी रचनाए गिनाईं पर ‘उस वर्ग’ की रचनाएं छोड़ गए लगता है- मसलन कृष्ण वलदेव वैद की ‘विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहॉं’ वहॉं मिलेंगी राहुल वाली गालियॉं और हॉं वहॉं भी वे प्रभावोत्पादकता बढ़ाती ही हैं, और मुझे राहत महसूस हो रही है कि आपने नैपकिन का अर्थ ‘वो’ नैपकिन लिया - ‘विमल…’ के बाद नैपकिन का अर्थ सेनीटरी नैपकिन हो जाता और समाजशास्त्र बदल जाता…नहीं।
June 26, 2007 at 11:24 am
आपका कहना सही है.
मैं पहले भी कहीं पर यह टिप्पणी कर चुका हूं - मेरा बचपन ऐसे मुहल्ले में गुजरा है जहाँ बच्चा मां की गाली बोलना पहले सीखता है - बजाए मां बोलने के. फिर भी, मेरे मुँह से गाली नहीं निकलती….
और, प्रसंगवश, आज ही भास्कर में जयप्रकाश चौकसे का लेख छपा है जिसमें किसी गांधीवादी व्यक्ति का किस्सा उन्होंने बताया है कि वह ताउम्र मृदुभाषी था. मृत्यु शय्या पर कोमा में जाते जाते उस गांधी वादी व्यक्ति के मुँह से तमाम गंदी गालियों के अलावा कुछ नहीं निकला था….
June 26, 2007 at 11:58 am
आधा गाँव , झीनी-झीनी बीनी चदरिया,नाच्यौ बहुत गोपाल जैसी रचनाओं को पुरस्कार न मिलने का कारण भी क्या उनमें कही गयीं गालियाँ हैं ? अगर यह सच है, तब उस मानसिकता का खुद को मानकर नारद संचालक तुष्ट हों लें । राहुल में गरियाने की क्षमता को आप सिरे से खारिज न करें ।लिखी हुई अँग्रेजी में जैसे कुछ अक्षर ‘साइलेन्ट’ होते हैं , वैसे ही शब्दों को साइलेन्ट रख भी गाली प्रस्तुत की जा सकती है । दमदार चिट्ठाकार अनामदास ने दिल्ली पर लिखी एक सुन्दर कविता में इस शैली का मौलिक प्रयोग किया है । मैंने उनसे नकल कर पिछले चुनाव में प्रयुक्त नारे को श्लील बनाने में अनामदास-विधि का प्रयोग किया है ।
गालियों पर चर्चा का एक साँस्कृतिक पक्ष भी काबिले चर्चा है ।अधिकतर गालियाँ स्त्री पर हमला करने वाली क्यों होती है? अक्सर पुरुष द्वारा पुरुष को दी जा रही हो फिर भी!
July 1, 2007 at 5:26 am
अच्छा लिखा है। बहुत पहले मैंने गालियों के सामाजिक महत्व के बारे में लिखा था। देखियेगा उसे भी अगर अभी तक न देखा हो।