गालियों का शिक्षाशास्त्र

वरिष्ठ ब्लॉगर, मित्र और अफ़सर  ( अथवा अफ़सर और मित्र ; यह पदक्रम या हायरार्की , उनसे रू-ब-रू प्रथम साक्षात्कार के पश्चात तय की जाएगी ), और उससे भी ऊपर ओपन-एंडेड प्रसन्न गद्य के अनूठे लिखवैया अपने ज्ञान जी, एक बार  जब सब गाड़ियां ठीक-ठाक ‘रन’ कर रहीं थी, वीआईपीऔं का आवागमन कम था , गूजर आंदोलन की कोई सूंघ भी नहीं थी और घर की भवानी का मूड भी चकाचक था, ऐसे में जीवन के हंसी-खुशी और भावुकता से भरे अवकाश के कमज़ोर क्षणों में वे एक सामान्य ब्लॉगर की टिप्पणियों पर परम-प्रसन्न होते भए और उससे अपनी कलम बदलने की कृपापूर्ण और याचनापूर्ण घोषणा एकसाथ करते भये कि वह अपनी कलम उस ब्लागरिए से बदलेंगे .

ब्लॉगरिए को भला क्या ऐतराज़ था . उसकी दुअन्नी की कलम में कौन-से लाल लटक रहे थे .  बदले में उसे कम से कम एक अदद पार्कर पेन की सॉलिड उम्मीद थी . वह मानकर चल रहा था कि यह ज्ञानदत्त नामक अफ़सर कितना भी ईमानदार और बुड़बक टाइप होगा पर इतना गिरा हुआ न होगा कि ट्रेन कंट्रोलर, ड्राइवरों और गार्डों से पेन भी उपहार में  न लेता हो . सो निश्चिंत होकर वह मुदित-मन इस प्रॉफ़िटेबल डील पर विचार करने लगा .

पर जैसा कि होता है, ऐन मौके पर मक्खी छींक गई और उसे बेटैम का ईमानदारी का दौरा पड़ गया . अब तक उसे अस्थमा का दौरा ही हलकान किये था, इस नये दौरे ने तो जैसे उसके इस सुंदर सपने की  वाट ही  लगा दी . उसने ज्ञान जी को साफ़-साफ़ बताया कि वे अंधेरे में हैं . और हलफ़नामा देकर ज्ञान जी को आगाह किया कि आसामी के चरित्र और पूर्ववृत्त का सत्यापन किए बिना ऐसा ऑफ़र देने की गलती न किया करें . यह देश चोर-उचक्कों और बेईमानों से भरा पड़ा है. यहां हर एक अदद प्रियंकर के भीतर एक चौपटस्वामी छुपा हुआ है . ईमानदारी के उस उग्र दौरे में ज्ञान जी के ऑफ़र को स्वीकार करते हुए भी उसने उन्हें डील के ऐन पहले अपनी दूसरी पहचान और अपने मारक-सुधारक टाइप गद्य के बारे में लिख भेजा . इस आत्मस्वीकारोक्ति के साथ कि ” पहले बता देता हूं कि आप घाटे में रहेंगे . मेरे बारे में सबकी धारणा वैसी नहीं है जैसी आप रखते हैं . ”

पर क्या किया जाए . बुरा वक्त कोई कह कर थोड़े ही आता है . जब बुरा समय आता है तो सर्विस रूल्स का पाठ सुंदर काण्ड की तरह करने वाला अफ़सर भी  ऐसी गलती कर जाता है . उल्टे अपने प्रत्युत्तर में ’द ग्रेट अफ़सर’ यह और कहते भये  कि  इस कथित ब्लॉगरिए की टिप्पणियां उनकी स्वयं की पोस्टों से ज्यादा अच्छी हैं . ब्लॉगरिया बिना अपनी औकात बूझे प्रशंसा के हिंडोले में झूल रहा था . इधर इस तारीफ़ का प्रेषण-संप्रेषण हुआ . उधर गरब-गुमान में लिथड़े ब्लॉगरिये ने अपनी अज़ीब-ओ-गरीब लेखन-हरकतें और तेज कर दी .

 सो भाइयो और बहनो!

आज का यह लेख ‘गालियों का शिक्षा शास्त्र’ इन्हीं ज्ञान जी के उकसावे का विस्फ़ोट-प्रस्फ़ोट है . चौपटस्वामी का एहमा कौनौ दोष नाहीं है . अच्छा लगे तो तारीफ़ सीधे कलकत्ते के पते पर भेजिएगा . और जो जियरा में क्रोध की लपटें उठने लगें तो खाद-पानी इतना ही दीजिएगा के लपटें इलाहाबाद में गंगा तट तक जाकर रुक जाए . राहुल-टाहुल से भी ई पोस्ट का कौनो किसम का सम्बंध नाहीं है .टैम बहुतै खराब चल रहा है . नारद का जासूस ठिकाने-ठिकाने फ़ैला हुआ है .हमरा ‘कम्पलिन’ भी हो सकता है . सो सज्जनो! सतर्कता बरतने में ही भलाई है . भूमिका जरा लंबा गई है, सो माफ़ी मांगते हुए मुद्दे पर आता हूं .

 ज्ञान जी ने राहुल पर नारद के ‘प्यूनटिव एक्शन’ का समर्थन किया है . अफ़सर और अनुशासन का निकट का संबंध होता है . हर सफ़ल अफ़सर ‘अथॉरिटी’ और ‘कम्पैशन’ के द्वन्द्व में ‘अथॉरिटी’ को वरीयता देता है .सो कुर्सी पर बैठे  ’अफ़सर’  की अनुशासन का समर्थन करती टिप्पणी पर आश्चर्य प्रकट करने का कोई कारण नहीं बनता है . आश्चर्य तब होता जब वे ऐसा न करते .

पर समस्या यह है कि मेरा परिचय एक रसिक ज्ञानदत्त पांडेय से और है . एक ऐसा मौजिया जीव जो मेरी तरह काशीनाथ सिंह का फ़ैन है . जो नेट के औघड़ साधु-समाज से ‘काशी का अस्सी’ खरीद कर पढने की ताकीद करता है . जो एक सच्चे जिज्ञासु की तरह यह प्रश्न कर सकता है कि क्या गाली बनारस की रोज़मर्रा की भाषा का अंग है ? और यह जानकर संतुष्ट हो सकता है कि यह बनारस की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है . 

अतः इस मूरख-खल-कामी ब्लॉगरिये की बात की  प्रस्तावनास्वरूप रसिक अग्रज ज्ञान जी की एक टिप्पणी प्रस्तुत है :

“मित्रों, अच्छी भाषा आपको अच्छा मनई बनाती हो; यह कतई न तो नेसेसरी कण्डीशन है, न सफीशियेण्ट ही. आप अच्छी भाषा से अच्छे ब्लॉगर भले ही बन जायें!”

तो भाई लोगो!

हम जो भी उवाचूंगा, इसी टिप्पणी का आलोक-परकास में ही उवाचूंगा . आप लोग चाहे ओह! करें या आह! या वाह! . अंतिम की उम्मीद जरा कम है . पर उम्मीद पर दुनिया कायम है .

तो पंचो!

कुछ मुंह ऐसे होते हैं जिनसे निकली गालियां भी अश्लील नहीं लगती . और कुछ ऐसे होते हैं जिनका सामान्य सौजन्य भी अश्लीलता में आकंठ डूबा दिखता है . सो गालियों की अश्लीलता की कोई सपाट समीक्षा या शाश्वत किस्म की परिभाषा नहीं हो सकती . गाली के संदर्भगत व मनोसामाजिक आधार और उसके उद्देश्य को समझे बिना इस बारे में कोई भी टिप्पणी और कोई भी फ़ैसला बेमानी है .

 गालियों में जो जबर्दस्त ‘इमोशनल कंटेंट’ होता है उसकी सम्यक समझ और उसका विश्लेषण बहुत जरूरी है . गाली कई बार ताकतवर का विनोद होती है तो कई बार यह कमज़ोर और प्रताड़ित के खारे आंसुओं की सहचरी . वह शोषित की असहायता के बोध से भी उपजती है . कई बार यह दो प्रेमियों और कुछ मित्रों की प्रेमपूर्ण चुहल होती है तो बहुत बार गाली उदासीन-सी बातचीत  का  निरर्थक तकियाकलाम मात्र होती है .

काशीनाथ सिंह ( जिनके लेखन का मैं मुरीद हूं ) और राहुल (जिनका लिखा मुझे अरुचिकर लगा) दोनों के बहाने सही, पर जब बात उठी है तो कहना चाहूंगा कि गालियों पर अकादमिक शोध होना चाहिए. ‘गालियों का उद्भव और विकास’, ‘गालियों का सामाजिक यथार्थ’, ‘गालियों का सांस्कृतिक महत्व’, ‘भविष्य की गालियां’ तथा ‘आधुनिक गालियों पर प्रौद्योगिकी का प्रभाव’ आदि विषय इस दृष्टि से उपयुक्त साबित होंगे. उसके बाद निश्चित रूप से एक ‘गालीकोश’ अथवा ‘बृहत गाली कोश’ तैयार करने की दिशा में भी सुधीजन सक्रिय होंगे .

 नारद के संचालक और नियामक और सलाहकार जो इधर अतिसक्रिय दिख रहे हैं, वे कृपया इस परियोजना के लिए आवश्यक नैतिक और तकनीकी सहयोग प्रदान करने की कृपा करें . यह अत्यंत  ऐतिहासिक महत्व का काम होगा . हम इतिहास बनाने की ओर चल तो पड़े ही हैं .

 निवेदक

चौपटस्वामी

6 Responses to “गालियों का शिक्षाशास्त्र”

  1. arun Says:

    वाह क्या बेबात की बात है
    साधुवाद कोश के लिये

  2. Sanjeet Tripathi Says:

    सत्य!

    “कुछ मुहं ऐसे होते हैं जिनसे निकली गालियां भी अश्लील नहीं लगती . कुछ ऐसे होते हैं जिनका सामान्य सौजन्य भी अश्लीलता में आकंठ डूबा दिखता है . सो गालियों की अश्लीलता की कोई सपाट समीक्षा या परिभाषा नहीं हो सकती .”

    इस से तो मैं पूरे तौर पर सहमत हूं।

  3. अफ़लातून Says:

    मैं उलझन में हूँ ,कि आज अपनी पोस्ट में इस्तेमाल किया एक लफ़्ज़ गाली है या नहीं । अभयजी ने कहा यह सेमी अस्लील में सायद आए । यह बहस जरूरी है । साधुवाद ।

  4. ज्ञानदत्त पाण्डेय Says:

    भैया चौपटस्वामी जी, काहे को खींच रहे हो? अफसरी जाये चूल्हे में. मेरे पूरे ब्लॉग को खंगाल लो - नही दीखता परिस्थितियों का मारा एक परेशान आदमी जो ब्लॉगरी में अपनी अवसादग्रस्तता का रिफ्यूज ढ़ूंढ़ रहा हो?
    पर यह सही है - गालियां मानव को सभ्य बनाती हैं. गालियां उसे गर्त में भी ड़ालती हैं. यह गालियों के कारण नहीं; उस व्यक्ति की मानसिकता के कारण होता है. गालियां सिर्फ कैरियर हैं - यह आप पर है कि उनपर आप कैसे विचार लादते हैं.
    अकादमिक शोध जरूर होना चाहिये. वैसे भी, ब्लॉगरी का माहौल इस समय बहुत सटीक है उसके लिये!

  5. राजीव Says:

    देखिये, ये तो सही लिखा आपने। सभी कुछ संदर्भ और गालीवाचक की भावना और उवाच के लहज़े पर निर्भर करता है। कभी कभी यह आवेग को जीवंत रूप देने अथवा सम्यक तेज प्रदान करने, कभी मात्र वीभत्सता के लिये अथवा अन्य रूपों में जैसा आपने पहले ही लिखा है - अन्यान्य कारणों और रूपों में प्रयुक्त होती हैं। कुछ और भी बातें इनके बारे में , जो मेरे विचार से जान पड़ती हैं, जैसे कि कभी कभी इन के प्रस्तुतीकरण से ही निर्धारित हो पाता है कि इस का प्रयोजन क्या था, इसके प्रस्तुतिकरण के वॉल्यूम, धाराप्रवाहिकता आदि पैरामीटर तय करते हैं इनका मकसद और इनका वज़न। कभी कभी तो एक ही प्रकार की गाली, भिन्न अवसरों और / अथवा भिन्न व्यक्तियों के द्वारा प्रस्तुत करने पर कतई अलग तरीक़े से प्रभावशाली / प्रभावहीन होती हैं।

    रोचक पहलू में यह भी है कि कभी कभी ये इस प्रकार से प्रयुक्त होती हैं, अथवा प्रभाव डालती हैं कि उस प्रभाव / भाव को भरपूर जीवंतता से व्यक्त करने के लिये कई शब्द और वाक्य भी छोटे पड़ें। तो यह उनकी अंतर्निहित उपयोगिता का परिचायक है।न केवल यह उपयोग बल्कि यदि किसी मानसिक चिकित्सक / मनोरोग सलाहकार से जानें तो शायद वे गालियों के औषाधीय प्रभावों को भी न नकार सकें। कभी कभी भड़ास निकालने का ये उपयुक्त माध्यम भी हो सकती हैं और तनाव मुक्ति में सहायक भी (वैसे दुरुपयोग से इनके विपरीत परिणामों की भी संभावना होती है) । वैसे कुछ व्यक्ति इन्हें सामान्य बोलचाल की भाषा के अलंकार भी मानते हैं!

  6. सारथी चिट्ठा-अवलोकन: 5 | सारथी Says:

    [...] मजेदार ट्रिक्सभाषा जगतगालियों का शिक्षाशास्त्रगालियों [...]

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