संजय (बेंगानी) के नाम एक पत्र
कोलकाता
13 जून 2007
प्रिय संजय ,
आपकी शिकायत पर नारद ऐडवाइज़री बोर्ड ने उस फ़ूहड़ पोस्ट को हटा दिया है जो किन्हीं राहुल की थी . यह ठीक ही हुआ है . इस निर्णय से मैं सहमत हूं . बहुत सी टिप्पणियों और अभय की पोस्ट से मुझे अभी पता चला है कि उक्त चिट्ठाकार का नाम राहुल है . मैं उन्हें जानता नहीं हूं पर उस पोस्ट की भाषा उचित नहीं थी, यह मानता हूं . शायद यह पोस्ट लिखते हुए राहुल सही मनःस्थिति में नहीं थे . अतः पोस्ट का हटाया जाना मुझे उचित जान पड़ता है .
पर इधर इरफ़ान भाई के ब्लॉग पर नारद की घोषणा पढ़कर और कुछ टिप्पणियों को पढने के बाद मेरा ध्यान इस तथ्य की ओर गया कि उस ब्लॉग को ही नारद से हटा दिया गया है . क्या आपको नहीं लगता सज़ा अपराध से कुछ ज्यादा हो गई है . क्या उन्हें एक चेतावनी देना उचित न होता ? न मानने पर पहले कुछ समय के लिए निलंबन या ‘सस्पेंशन’ और तब यह हटा देने का निर्णय हुआ होता तो शायद प्राकृतिक न्याय का कुछ हद तक पालन हो पाता . और तब सलाहकार मंडल की वह गरिमा भी बनी रहती जिसका वो हकदार है .
कई बार तो मुझे लगता है (और इसके पुख्ता कारण हैं) कि राहुल को पहले के ब्लॉगरों द्वारा किए गए उन अपराधों की सजा भी मिली है जिन पर नारद की सलाहकार मंडली किन्हीं वजहों से त्वरित निर्णय नहीं ले सकी . समय पर निर्णय न ले पाना और असमय की त्वरा अज़ीब-ओ-गरीब परिस्थितियों का निर्माण कर सकती है .
चूंकि इस घटना में ‘अग्रीव्ड’ पार्टी आप हैं और आपकी शिकायत पर ही नारद ऐडवाइज़री बोर्ड द्वारा यह निर्णय लिया जाना प्रतीत होता है, क्या आप नारद सलाहकार समिति को राहुल की उक्त पोस्ट को हटा देने के लिए धन्यवाद देते हुए यह अनुरोध करेंगे कि राहुल को इस बारे में एक चेतावनी दी जाए और उसके साथ उसे अपनी बात रखने का मौका दिया जाए . और उसके ब्लॉग को इकतरफ़ा निर्णय के तहत न हटाया जाए . अदालत बड़े-से-बड़े अपराध के लिए भी मुज़रिम को अपनी बात कहने और अपने बचाव का मौका देती है .
क्या पता राहुल को भी इस पोस्ट को लेकर अफ़सोस हो . क्या उन्हें सफ़ाई का एक मौका नहीं मिलना चाहिए . हालांकि एक आदमी के जाने से नारद के इस निर्णय की ताल में खड़ताल बजा रहे नारदमोहाविष्टों को कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला है . पर इस इकतरफ़ा निर्णय से नारद की आत्मा पर जो खरौंच आएगी वह कभी भरी नहीं जा सकेगी . नारद को अभी एक लंबा सफ़र तय करना है . हिंदी के हित एक ऐतिहासिक भूमिका निबाहनी है . अतः इस निर्णय पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है .
चाहे वे देवाशीष हों या जीतू या अनूप शुक्ल, उनकी सदाशयता और निर्णय क्षमता और उससे भी बढकर उस निर्णय पर पुनर्विचार के उनके साहस पर मेरा पूरा भरोसा है . पर अन्याय आपके प्रति हुआ है इसलिए पहल आपको करनी पड़ेगी . और आप ऐसी पहल करेंगे इस पर मेरा भरोसा इसलिए है क्योंकि मानव के भीतर की क्षमा कर देने की अनूठी शक्ति से मेरा विश्वास अभी उठा नहीं है .
धर्मांधता और धर्मनिरपेक्षता की बहस ने भारत में एक ऐसा अज़ब-सा ‘पोलराइजेशन’ — एक धूर्त किस्म का ध्रुवीकरण — रच दिया है कि कभी-कभी तो यह समूची बहस ही बेमानी-सी प्रतीत होने लगती है . रामचंद्र गुहा का एक लंबा लेख पिछले दिनों पढा था जो ‘ह्यूमनिज़्म’ के लोप पर एक ‘विदा गीत’ सा लगा था . और मेरा मन लौट-लौट कर गांधी की सिखावन की तरफ़ जाता था . आज की परिस्थिति में शायद उसी मानवतावाद पर ध्यान केन्द्रित करना ज्यादा उपयोगी हो . गांधी एक ऐसे धार्मिक व्यक्ति थे जिनकी धर्मनिरपेक्षता पर कम-से-कम मुझे तो कोई शंका नहीं है . विश्वास करता हूं कि औरों को भी नहीं होगी . उनका विश्वास धर्मनिरपेक्षता में था, धर्मनिरपेक्षता की तोतारटंत में नहीं . उनका का रास्ता ‘ह्यूमनिज़्म’ का खरा रास्ता था .
जो साम्प्रदायिक हैं उनसे तो क्या कहूं और वे क्योंकर सुनेंगे . पर जो धर्मनिरपेक्ष होने का दम भरते हैं उनके भी ‘ह्यूमनिज़्म’ पर जितना कम बोला जाए उतना ठीक होगा . ऐसे में मुझे हिंदी के एक युवा कवि की वे पंक्तियां याद हो आती हैं जो पेशेवर साम्प्रदायिकों और पेशेवर धर्मनिरपेक्षों पर समीचीन टिप्पणी करती प्रतीत होती हैं :
इस वहशत में
जब दंगाइयों को देख भय
पैदा होता है
और सेक्यूलरों को देख
घबराहट
एक रास्ता है
जो असर कर सकता है
मज़लूमों की आपसी साझेदारी ।
(स्मृति के आधार पर उद्धृत)
तमाम मतभिन्नताओं के बावजूद अगर एक बड़े ध्येय के लिए साथ रहना और साथ चलना है तो हमें रास्ता तो समझदारी और आपसी साझेदारी का ही चुनना होगा .
भले ही जीवन की बहुत सी स्थितियों-परिस्थितियों के बारे में मेरे विचार आपसे मेल न खाते हों पर आपके सौजन्य और शिष्टता से मैं अप्रभावित नहीं हूं . तभी तो आपको यह पत्र लिख रहा हूं . क्योंकि आपके सौम्य झलक मारते चेहरे में मुझे वह तत्व दिखाई देता है जो इस पुनर्विचार के लिए आवश्यक है . ऐसा करके आप संजय बेंगानी नाम के एक साधारण व्यक्ति को ही उच्च धरातल पर प्रतिष्ठित नहीं करेंगे,बल्कि समग्र रूप में मनुष्य के भीतर की उस ‘मनुष्यता’ को भी उच्च धरातल पर प्रतिष्ठित करेंगे जो हम सबके भीतर है पर इधर जिसकी झलक मिलनी जरा कम हो गई है .
कबीर का एक पद है जो मुझे बहुत पसंद है . इसे सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका नीला भागवत ने बहुत ही शानदार ढंग से गाया है :
भूले को घर लावे।
सो जन हमका भावे॥
हम पहले से ही हार क्यों मान लें . यह मान कर ‘डेस्परेट डिसीज़न्स’ की राह क्यों चल पड़ें कि भूला हुआ घर नहीं लौटेगा . उम्मीद बची है तो सब बचा है . नारद भी तो हमारी उम्मीद ही है . हमने उसे एक निरा एग्रीगेटर भला कब माना है . आशा है आपको इस बात का भान होगा कि सैकड़ों चिट्ठाकारों की उम्मीद भरी नज़रें आप पर टिकी हैं .
एक अंतिम बात आपसे और कहूंगा . असगर वज़ाहत बहुत प्यारे लेखक हैं . उनका लघु कथाओं का गुच्छा ’शाह आलम कैम्प की रूहें’ साम्प्रदायिकता का जैसा सृजनात्मक विरोध है वैसा साहित्य के इतिहास में कम ही देखने को मिलता है ,समाज के इतिहास में तो और भी कम . मैंने जब उसे पढा तो मन में करुणा की लहरों की एक अज़ब-सी उमड़-घुमड़ थी .भावनाओं का एक अनोखा आलोड़न था . मेरी आंखें डबडबाई हुई थीं .बहुत प्रयास के बाद और अपने को बहुत संयत करने के बाद ही मैं उसे पूरा पढ पाया . समवेदना के समान धरातल पर खड़े होकर यदि आप उसे पढ़ेंगे तो आपको भी उसका मर्म समझ में आएगा और गलतफ़हमी दूर होगी . पर शर्त यही है कि उसे मनुष्य हो कर पढना होगा . हिंदू या मुसलमान होकर नहीं . इस मुश्किल समय में यह मुश्किल काम है, पर असम्भव नहीं .
बहुत भरोसे के साथ और
बहुत-बहुत स्नेह और शुभकामनाओं सहित,
आपका
चौपटस्वामी
पुनश्च : इस बारे में अपने निर्णय तक पहुंचने के लिए आप हिंदी चिट्ठाकार समाज के प्रबुद्ध सदस्यों, यथा सुनील दीपक, अफ़लातून, रवि रतलामी, प्रमोद, अभय, चंद्रभूषण, रवीश, धुरविरोधी, बेजी, घुघुती बासुति से , या और जिसे आप बेहतर समझते हों उससे भी विचार-विमर्श कर सकते हैं . याद रहे आपका यह निर्णय नारद की भावी यात्रा का मार्ग और उसके मानक तय करेगा .
June 13, 2007 at 11:02 am
बहुत मार्मिक पत्र है। विनम्र भी। इस भाषा से सिर्फ ईर्ष्या ही की जा सकती है। उम्मीद है, संजय भाई आपकी बात समझ पाएंगे।
June 13, 2007 at 11:07 am
“एक आदमी के जाने से नारद के इस निर्णय की ताल में खड़ताल बजा रहे नारदमोहाविष्टों को कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला है . पर इस इकतरफ़ा निर्णय से नारद की आत्मा पर जो खरौंच आएगी वह कभी भरी नहीं जा सकेगी . नारद को अभी एक लंबा सफ़र तय करना है . हिंदी के हित एक ऐतिहासिक भूमिका निबाहनी है . अतः इस निर्णय पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है .”
आपके स्वर में मेरा स्वर भी शामिल है.
June 13, 2007 at 11:11 am
बहुत खूब स्वामीजी।जरूरी प्रविष्टी है।
June 13, 2007 at 11:37 am
यह आपके अकेले के विचार हो सकते हैं, जिन सैकड़ों चिट्ठाकारों की निगाहों की बात आप कर रहे है, उन्होने अपने विचार कल ही नारद उवाच पर बता दिये थे। यानि की नब्बे फीसदी लोग चाहते हैं कि गंद फैलाने वाले को हटा दिया जाये।
अच्छा आप ऐसा करिये बैंगानी की जगह अपना नाम लगा कर देखिये कि… चौपटस्वामी गंदा नैप्किन है ….. आप खुद सहन नहीं कर सके ना। तब क्यों संजय को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं?
बड़ी मुश्किल से नारद जी ने पहली बार हिम्म्त दिखाई है और हम सब उसका स्वागत करते हैं। जिनको लगता है कि राहुल के साथ अन्याय हुआ है वह राजी खुशी नारद से अपना नाम हट सकता है। आप पहल करें बाकी के लोग आपके साथ आ जायेंगे।
June 13, 2007 at 11:48 am
आपकी बातों मे दम हैऔर इस पर नारद को गम्भीरतासे विचार करना चाहिये.
June 13, 2007 at 12:31 pm
प्रिय भाई अनाम,
जो सम्मान मैं अनामदास जी को देता हूं उसका दसवां हिस्सा आप जैसे कायर को भी देते हुए आपकी टिप्पणी के लिए आभार व्यक्त करता हूं और आपकी अयाचित सलाह के लिए भी .
सैकड़ों लोग आपके साथ हों इसके लिए आपको खुले में आना होता है . पर वह आप करेंगे नहीं . आप तो अंधेरी कोठरी में चोरी से घुसकर चुकड़िया में गुड़ फोड़ेंगे . चुकड़िया जानते हैं न . छोटे मुंह वाली छोटी मटकिया . इसे मलइया भी कहते हैं .
जब हम आपको सहन कर रहे हैं तो किसी और को सहन करने में हमें क्या तकलीफ़ है . थोड़ा दुर्भाग्य अगर राहुल का जाना है तो उससे बड़ा दुर्भाग्य आपका होना है . बस यही कह सकता हूं आपके सम्मान में .
जिस दिन नारद से जाना होगा उसी शान से जाऊंगा जिस शान से आया था . लीजिए! फ़ैज़ साहब की दो पंक्तियां मुलाहिजा फ़रमाइये :
जिस धज से कोई मकतल को गया
वो शान सलामत रहती है,
इस जान की कोई बात नहीं
ये जान तो आनी-जानी है ।
June 13, 2007 at 12:44 pm
आपके इस पत्र के लिए क्या लिखूं समझ में नही आ रहा।
सर्वप्रथम तो आपका यह पत्र पढ़कर सच में यह सोचना पड़ रहा है कि क्या एकदम से वह चिट्ठा नारद से हटा देना उचित था, शायद वह पोस्ट ही बस हटाया जा सकता था। इसे पढ़कर ही यह महसूस हो रहा है कि शायद एक मौका ऐसी पोस्ट लिखने वाले को देना चाहिए था!
और हां इस पत्र की भाषा को देखकर सच में जलन भी हो रही है।
June 13, 2007 at 1:22 pm
चौपट्स्वामी जी,
मैं आपकी बात का शत प्रतिशत समर्थन करता हूँ . ऐसा महसूस होता है कि एक उदाहरण बनाने की कोशिश में किसी एक को आवश्यकता से अधिक सजा दे दी गयी है .
दूसरा, जनमत सर्वेक्षण के आधार पर किसी को सजा एक बडी दुधारी तलवार है, अगर नारद ने इसको ध्यान में रखते हुये फ़ैसला सुनाया है तो मैं स्पष्ट रूप से अपना विरोध दर्ज करता हूँ .
इससे पहले भी आपस में पंगे हो चुके हैं लेकिन इस प्रकार की स्थिति कभी नहीं आयी .
मैं आशा करता हूँ कि नारदमुनि अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करेंगे .
June 13, 2007 at 2:10 pm
प्रतिबन्ध का सर्मथन मैं भी नही करता हूँ, पर बाजार ने जो उद्दण्डता की उसके लिये यह करना जरूरी था। अगर बाजार को अपने किये पर शर्मिन्दगी है तो अक्षरग्राम पर सार्वजनिक रूप से माफी माँगकर , पुन: ऐसी गलती न करने के वादे के साथ नारद पर आ सकते है। संचालक मंडल मेरी बात पर ध्यान दें।
June 13, 2007 at 2:41 pm
प्रति टिप्प्णी के लिये धन्यवाद
आपसे यही उम्मीद थी।
June 13, 2007 at 3:33 pm
मैं तो इन बातों से सदा ही दूर रहने का प्रयास किया है…ब्लाग के शुरुआत में ही मेरा काफी पंगा हो चुका था लोगों ने कहा की मैं गंदी मछली हूँ इत्यादि…
लेकिन जहाँ तक बाजार का प्रश्न है ऐसा किया जाना एक उदाहरण है जो उन लोगों को सचेत करता है जो मात्र अपने जुमले को टिप्पणी का माला पहनाने के उद्देश्य से लिखे जाते है…उदाहरण देने का मैं मतलब नहीं समझता…लोग जानते है…
प्रियंकर जी,,,, भारत की लेखनी और सोच कई मायनों में उतनी दृष्टिपरक नहीं है जैसा लोग समझते है…कला को अभी बहुत आगे जाना है पर अभी ऐसा उतावलापन विनाश ही करता है खाश कर मानसिक…और हाँ ह्यूम और सार्त्र का दर्शन उतनी ही आलोचना का शिकार रहा है…।मानववाद पर यही आरोप है की इसने एक वहशी जानवर को हथियार दे दिया…। धन्यवाद!!!
June 13, 2007 at 5:10 pm
आपका पत्र वह एक क्षीण सी धारा है जो अभी भी विवेक को स्थान देना चाहती है…साधुवाद।
किंतु जरा इस घृणा की धारा पर भी विचार करें जो निरंतर हर विवेकी स्वर को चुनौती दे रही है कि आप भी हट जाएं चलें जाएं।
यह तैश दिलाने की कोशिश क्यों की जा रही है। और इसे प्रतिशत का सवाल भी न बनाया जाए तो बेहतर।
हमारी विनम्र मान्यता है कि भले ही नारद के पास अधिकार रहा हो किंतु बजार को हटाने का निर्णय समझदारी भरा नहीं था और खासतौर पर यह बेंगाणी मित्रों की और फजीहत करवाने वाला सिद्ध हुआ (भले ही यह उनकी शिकायत पर की गई कार्रवाई रही हो)
पुन: विचार करें यह साहस की मांग भले ही करता है किंतु इसे नाक का सवाल बनाने की तुलना में अधिक अच्छा है।
June 13, 2007 at 5:49 pm
प्रिय भाई,
बहुत अच्छा पत्र है। मै आपके लेखन का सदा से कायल रहा हूँ। अब चूंकि ये मुद्दा दो चिट्ठाकारों के बीच का है, नारद पर शिकायत आयी और नियमावली के अनुसार हमने एक पक्ष को दोषी पाया तो हमने उसे पोस्ट हटाने के लिए कहा, उसने पोस्ट नही हटाई। अलबत्ता उसने हमारी टिप्पणी को एप्रूव अवश्य किया, इसका मतलब था कि वो आनलाइन मौजूद था। हमने तुरन्त एक इमेल लिखी और उसको नारद एडवाइजरी के निर्णय के बारे मे बताया, लेकिन उसने कोई जवाब नही दिया। और ना ही अपना पक्ष रखने के लिए कुछ समय मांगा।
मुद्दा चूंकि गम्भीर था, इसलिए हमने तुरन्त निर्णय लिया। अब भी उन जनाब के दो और ब्लॉग हमारे पास पंजीकृत है, यदि हमे किसी पूर्वाग्रह होता तो उसके सभी ब्लॉग हटाते, हमने सिर्फ़ यह ब्लॉग हटाया। यदि वो अपनी पोस्ट हटाकर, बातचीत करने की पहल करते, तो शायद हम कुछ सोचते। अब संजय बैंगानी और बाजार वाले चिट्ठाकार, दोनो आपसी सहमति करें, और नारद को चिट्ठी लिखें तभी हम कुछ सोचेंगे।
यदि कल को कोई आपके प्रति गालियां लिखेगा और आप नारद को शिकायत करेंगे तो हम उस समय भी यही करेंगे। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का मतलब ये नही होता कि कोई किसी के बारे मे अनाप शनाप लिखते रहे, सार्वजनिक मंच पर किसी के विरुद्द कुछ भी कहते समय हमे जिम्मेदारी का एहसास होना जरुरी है। इतना तो हम उम्मीद करते ही है। कोई ये कहे, हम तो गालियां लिखेंगे, हर बार लिखेंगे और हटा के दिखाओ, तो भैया, हमे अपने घर की सफ़ाई करनी आती है। ये अनुशानहीनता और उद्दंडता है, बाकी आप स्वयं समझदार, स्वयं निर्णय लें।
June 13, 2007 at 6:20 pm
भाई चौपटस्वामी जी, आपने इतना भावुक पत्र लिखा। बहुत अच्छा है। संजय बेंगाणी को इतना लम्बा पत्र लिखने और तमाम टिप्पणियों के जवाब देने के साथ-साथ आप दो लाइन राहुल को भी लिखते कि वे अपनी पोस्ट हटा कर नारद को सूचित करते तथा आगे से इस तरह की बचकानी भाषा इस्तेमाल नहीं करते तो बेहतर होता। पुनर्विचार के लिये राहुल हमें मौका तो दें।
आप ये देख लो कहीं आपकी स्थिति बेगानी(बेंगाणी नहीं भाई) शादी में अब्दुल्ला दीवाना वाली न हो रही हो। इस ब्लाग पर प्रतिबंध के बावजू राहुल के दो ब्लाग हैं। तब तक उनमें लिखें। कुछ वो कहें-करें तो! 
June 13, 2007 at 10:30 pm
स्व्च्छता.शुचिता,पवित्रता,समन्वय,आदर,इज़्ज़त,दीर्घ समय तक सह-पथिक रहने की चाहत,और कडुवाहट से परे एक पूरी नईदुनिया बनने जा रही हिन्दी ब्लागर्स की.हिन्दी से पूर्वाग्रह रखने वाले पूरी की पूरी एक जमात यह चाह रही है कि ये हिन्दी वाले टूट पडें एक दूसरे पर…लड़ते-झगड़ते अपनी वालदैन यानी मां हिन्दी की अपने बच्चों को भिड़ते देखें..सबको सन्मति दे भगवान.आइये बाबा कबीर दास जी को याद कर लेते हैं…
हदै छाडि़ बेहद गया…जहां निरन्तर होय
बेहद के मैदान में रहा कबीरा सोय.
संजय पटेल
June 14, 2007 at 6:07 am
प्रिय जीतू भाई,
तारीफ़ के लिए शुक्रिया के अलावा और क्या कह सकता हूं . कोलकाता आएं तो रसगुल्ला खिलाऊंगा . आपका पक्ष एकदम स्पष्ट है . आपने जो किया नियम के तहत किया .
यह जो मेरा पत्र है यह किसी राहुल को बचाने की और किसी संजय को बरगलाने की कवायद नहीं है . यह उस अमूर्त विचार को बचाने की ज़द्दोजहद है जिसे स्वतंत्रता कहते हैं और जो इस समय सबसे ज्यादा खतरे में है .
फ़ूहड़ लिखने वाले को, अनुशासनहीनता करने वाले को हटाया जा सकता है और हटाया जाना चाहिए, पर अंतिम अस्त्र के रूप में . हम अगर हर छोटे-मोटे विवाद में ब्रम्हास्त्र का उपयोग करने लगे तो ब्रह्मास्त्र बच्चों के ‘सूतली बम’ में बदल जाएगा .
आपकी बात से पूरा इत्तिफ़ाक रखता हूं कि सार्वजनिक मंच पर बात-चीत और बहस जिम्मेदारी से होनी चाहिए. जो लक्ष्मण-रेखा लांघें उन्हें चेतावनी ज़रूर दी जानी चाहिए और उनके निलम्बन की भी व्यवस्था होनी चाहिए . पर ये सब ‘डेस्परेट मेज़र्स’ हैं जो अन्य सब विकल्पों के चुक जाने के बाद लिए जाते हैं .
नारद पर ५०० से ज्यादा ब्लॉगर्स हैं . क्या ऐसा नहीं हो सकता कि फ़ूहड़ और बचकाना पोस्ट पर सौ लोग जाकर ‘शर्म-शर्म’ की टिप्पणी लिख मारें . ताकि उक्त चिट्ठाकार पर एक नैतिक दबाव बनाया जा सके . और तब भी न माने तो आपके तरकश में सभी किस्म के तीर तो हैं ही .
आप यहां किसी गलती पर नहीं हैं . आपने जो किया नियम के तहत किया,सलाहकार मंडल की सिफ़ारिश पर किया . आपकी गलती दूसरी जगह है . नासिर के ब्लॉग ‘ढाई आखर’ पर आपकी टिप्पणी गैर-ज़रूरी और अहमन्यता से भरी है . आप आम व्यक्ति नहीं हैं . कोई साधारण ब्लॉगर नहीं हैं . नारद के नियामक हैं . आप ऐसा कैसे कर सकते हैं ? आपको और अधिक संयत और जिम्मेदार होना होगा .
June 14, 2007 at 6:29 am
भाई अनूप जी,
समझदारी भरी सिखावनहारी टिप्पणी के लिए धन्यवाद . संजय को पत्र इसलिए लिखा क्योंकि उनसे संवाद था . राहुल को इसलिए नहीं लिखा क्योंकि उनसे किसी किस्म का कोई परिचय व संवाद नहीं था . बल्कि इस विवाद के बाद ही उनका नाम तक जान पाया . पर ऐसे लोग ज़रूर होंगे जो राहुल से परिचित होंगे और उन्हें दो से ज्यादा लाइनें लिख कर समझा रहे होंगे .
अभी कुछ देर पहले अफ़लातून जी से पता चला कि राहुल ने गलती मानते हुए खेद व्यक्त किया है . और अपनी पोस्ट हटा ली है . और इस तरह आपको पुनर्विचार का मौका दे दिया है . आशा है आप इस ‘डिवेलपमेंट’ पर सुविधाजनक रूप से संतुष्ट होंगे .
बेगानी (बेंगानी नहीं) शादियों में पूरा देश ही अब्दुल्ला बना हुआ है तो एक अब्दुल्ला और सही . क्या फ़र्क पड़ता है . पर आप तो आमंत्रित होने के आदी हैं सो चिंता छोड़िये और दूध-जलेबी मजड़िये .
मुझे नहीं पता राहुल के कितने ब्लॉग हैं . पर यह पता है कि उन्होंने कुछ कह-कर दिया है और आपको पुनर्विचार मौका दे दिया है .
June 14, 2007 at 7:23 am
ओह ओह ये आप कह रहे हैं स्वामी जी .
June 14, 2007 at 9:08 am
हां! हमहीं उवाच रहे हैं . एक ही ओह काफ़ी था हमरे लिए . ठीक हैं तो ?
March 29, 2008 at 7:53 am
[...] में प्रियंकरजी ऐसे पत्र खुले आम लिखते हैं और मानते हैं कि वे [...]