चिट्ठाकारी का संसार : कुछ बेतरतीब विचार

नाटक में ‘स्वगत कथन’ होता है — सलिलक्वी — जैसे शेक्सपीयर के ‘हेमलेट’ नाटक में हेमलेट की प्रसिद्ध ‘सलिलक्वी’ . इसमें मंच पर जोर से कह कर विचार किया जाता है और यह माना जाता है कि इसे कोई सुन नहीं रहा है, पर सब सुनते हैं .

एक होता है ‘मोनोलॉग’ –  एकालाप  — जिसमें एक अकेला आदमी मंच पर कुछ कहता है पर उसके सामने एक अदृश्य श्रोता/दर्शक हमेशा मौजूद होता है .

सो जीवन के नाटक में ब्लॉगिंग का जुनून ब्लॉगरों का जोर-जोर से किया गया ‘स्वगत कथन’ है जिसे सब सुन रहे हैं या ‘मोनोलॉग’ है जो सबको सुनाया जा रहा है,इसका विचार  ब्लॉग जगत के मूर्धन्य यानी  चोटी-के (सिर्फ़ चोटीवाले नहीं) चिट्ठाकारों पर छोड़ देते हैं . पर इस असीम विस्तार वाले आभासी रंगमंच ने  हमें यह मौका सुलभ करवाया है . इसका चमत्कार यह है कि दूर-दूर के श्रोता/दर्शक न केवल आपकी प्रस्तुति देख रहे होते हैं वरन तुरत-फ़ुरत प्रतिक्रिया भी दे रहे होते हैं . यानी इस हाथ विचार/अभिव्यक्ति दे और उस हाथ तालियां या दुत्कार ले . स्थितिप्रज्ञ चिठेरों को  भले इससे कोई फ़र्क न पड़ता हो पर मुझ जैसे विषय-वासना में लिप्त संसारी चिठेरे को तो टिप्पणियों का ही सहारा  है .

ब्लॉगिंग यानी चिट्ठाकारी स्वतंत्र विधा है . यह किसी अन्य विधा का ‘ऑफ़शूट’ नहीं है . न तो साहित्य का और न ही पत्रकारिता का .

भला हो इस चिट्ठाकारिता का, कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के और विभिन्न व्यवसायों के तरह-तरह की विशिष्टता और विशेषज्ञता वाले लोग जो सामान्यतः लेखन से दूर थे, वे अपनी अब तक अप्रयुक्त ऊर्जा और अनूठी ललक के साथ इस संभावनाशील माध्यम की ओर प्रवृत्त हुए .

हिंदी में इसका इसलिए और ज्यादा महत्व है कि इसमें अपनी भाषा में अपने को अभिव्यक्त करने का आत्मीयता का तत्व भी जुड़ जाता है .

भाषा-साहित्य के थिर जल में, जो लगभग काला जल होता जा रहा था, इन नए आए चिट्ठाकारों ने नए प्राण फूंक दिए हैं . एक नए किस्म की प्राणशक्ति भर दी है .

जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों और अलग-अलग सामाजिक धरातलों से आए ये चिट्ठाकार अपने साथ एक विशिष्ट किस्म की भाषा-संजीवनी लेकर आए हैं .

भविष्य में जब नई सदी में हिंदी के स्वास्थ्य-लाभ और स्वास्थ्य-सुधार तथा नई हिंदी की निर्मिति पर शोधपूर्ण चर्चा होगी, तब साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े लोगों की भाषा और विषयवस्तु से कहीं अधिक महत्व उन चिट्ठाकारों की भाषा और विषयवस्तु का ठहरेगा जो अपनी नई भंगिमा और नए तेवर के साथ इतर क्षेत्रों से आए हैं .

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( दो टिप्पणियों के जोड़ से तैयार पोस्ट )

6 Responses to “चिट्ठाकारी का संसार : कुछ बेतरतीब विचार”

  1. अफ़लातून Says:

    कामना है कि इस रूप में फले - फूले चिट्ठालोक । आप जैसे स्थापित साहित्यकारों का प्रोत्साहन मिलते रहना चाहिए ।

  2. धुरविरोधी Says:

    “ब्लॉगिंग जीवन के नाटक में … जोर-जोर से किया गया ‘स्वगत कथन’ है जिसे सब सुन रहे हैं या ‘मोनोलॉग’ है जो सबको सुनाया जा रहा है,…..
    ……दूर-दूर के श्रोता/दर्शक न केवल आपकी प्रस्तुति देख रहे होते हैं वरन तुरत-फ़ुरत प्रतिक्रिया भी दे रहे होते हैं . यानी इस हाथ विचार/अभिव्यक्ति दे और उस हाथ तालियां या दुत्कार ले ”

    ब्लागिंग पर मेरे द्वारा अबतक पढ़ी गयी यह सर्वोत्तम व्याख्या है.

  3. अनुनाद Says:

    “भाषा-साहित्य के थिर जल में, जो लगभग काला जल होता जा रहा था, इन नए आए चिट्ठाकारों ने नए प्राण फूंक दिए हैं . एक नए किस्म की प्राणशक्ति भर दी है .”

    बहुत सार्थक बात कही आपने!

  4. अनूप शुक्ल Says:

    सही है। ये जुड़ी हुयी पोस्ट!

  5. Sanjeet Tripathi Says:

    बहुत सही!!

  6. प्रमोद सिंह Says:

    कुछ मौलिक ऑब्‍ज़र्वेशन रखिएगा.. समां बांधनेवाला बहुत देर तक विलंबित मत गाते रहियेगा..

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