लफ़्फ़ाज़ी के खिलाफ़ एक कविता

महत्वपूर्ण हिंदी कवि भवानीप्रसाद मिश्र अपनी कविता के  सरल-सहज शिल्प और उसमें बोल-चाल की अपनी  विशिष्ट शैली के लिए विख्यात हैं . भवानी भाई ने  देश के पढे-लिखे बौद्धिक वर्ग के छद्म को बहुत बारीकी से निरखा-परखा था . तभी तो वे कह पाए कि :

                ” रोना किसान के मज़दूर के दुखड़े को

                 शीशे में हज़ार बार देखना मुखड़े को ।”

ऐसे ही बुद्धिजीवियों की छद्म क्रांतिकारिता और उनके ‘पॉश्चर’ को उघाड़ कर सामने रखती उनकी कविता  ‘ तुम्हारा हाथ ‘  आपके समक्ष प्रस्तुत है  :

तुम्हारा हाथ

 

तुम्हारा हाथ

इतना ऊपर क्यों उठता है

बोलते वक्त

 

होश क्यों नहीं रहता तुमको

मुंह खोलते वक्त

 

आवाज़ तुम्हारी –

चीख में क्यों बदल जाती है

 

भले ही मत बोलो सच

 

मगर बनाकर

झूठ की एक फ़ेहरिश्त

 

किस्त दर किस्त मंचों से

उसे बार-बार दोहराना

अपने उन पूर्वजों का

नाम बार-बार गोहराना

जिनका तुमसे कुछ नहीं मिलता

 

तुम्हें

बहुत ज्यादा व्यक्त करता है

सीधी-सादी आंखों को

वह रक्त करता है

अपने को थोड़ा छुपाओ

 

अपनी सारी चालाकियों के साथ

इतने खुले में मत आओ

 

ऐसा क्षण आएगा

जब मज़दूर

 

‘दुनिया के मज़दूरों’  वगैरा के नारे

बर्दाश्त नहीं करेंगे

 

और तो और

ये पीढी दर पीढी

मज़दूरी और किसानी करनेवाले लोग

मज़दूरी नहीं करेंगे

काश्त नहीं करेंगे

 

मर जाएगी

तुम्हारे पाप से

धरती जो रही है

इनके बल पर श्यामला

 

इसी से कह रहे हैं हम

कि ओ भाई गरीब के हामी

अरे ओ भाई कोरे शब्दों के स्वामी

कुछ सच्चा भी कर

कुछ सच्चा भी कह

 

मत बाज़ारू बाज़ीगरों की तरह

झूठे दो-दो फुट ऊंचे

आम के पेड़ उगा

 

मत उनमें

साफ़-सुथरे एकदम नकली

तीन-तीन पाव के

आम जगा ।

 

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( परिवर्तन जिए , पृष्ठ : 54 )

6 Responses to “लफ़्फ़ाज़ी के खिलाफ़ एक कविता”

  1. arun Says:

    वाह प्रभु बहुत दिनो बाद दिखाई दिये और आते ही झडी लगादी

  2. अफ़लातून Says:

    क्या बात है ! आभार ।

  3. kakesh Says:

    वाह वाह ..मजा आ गया …एकदम सटीक कविता .. साधुवाद पढ़वाने के लिये…

  4. अनूप शुक्ल Says:

    बहुत अच्छी कविता पढ़वाई आपने! शुक्रिया!

  5. yunus Says:

    प्रिय भाई
    भवानी दादा की कविताओं के अपन अपार प्रशंसक हैं । खासतौर पर तीन कविताओं के । एक तो जी हां मैं गीतफरोश हूं किसिम किसिम के गीत बेचता हूं । दूसरा—सतपुड़ा के घने जंगल । और तीसरा सन्‍नाटा । आपने ये कविता पढ़ाकर आनंद ला दिया । धन्‍यवाद ।

  6. ज्ञानदत्त पाण्डेय Says:

    भवानीप्रसाद मिश्र को बहुत पहले सन्नाटा का पाठ करते सुना था चण्डीगढ़ में. वह याद आपने ताजा कर दी. यह कविता भी अपने मन-माफिक है - बेलाग!

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