<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"
		>
<channel>
	<title>Comments on: हसन जमाल और &#8230;.</title>
	<atom:link href="http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/</link>
	<description>a blog on current affairs</description>
	<lastBuildDate>Fri, 04 Jul 2008 07:44:31 +0000</lastBuildDate>
	<generator>http://wordpress.com/</generator>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
		<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-61</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 May 2007 15:59:00 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-61</guid>
		<description>@ सुजाता जी,

&lt;blockquote&gt;4. आपने और सृजन जी ने कहा - यह तो चेन रिएक्शन है - माने मसिजीवी हमला बोलेंगे तो जवाबी हमला होगा ही -जो दुखद भी है ।
मुझे बताया जाए मसिजीवी ने हसन जी के , आपके या सृजन जी के परिवार को लेकर कहँ टिप्पणी की है या पूरी पोस्ट लिखी है ।&lt;/blockquote&gt;

मैं गड़े मुर्दे उखाड़ना नहीं चाहता था। यह सवाल आपकी बजाय मसिजीवी पूछते तो मेरा उन्हें सीधा जवाब देना सही रहता। 

मैंने अपनी पहले वाली टिप्पणी में आपका कोई जिक्र नहीं किया है, इसलिए आप मुझसे यह सवाल क्यों कर रही हैं, यह मैं समझ नहीं पाया। ख़ैर, मेरे परिवार के संबंध में किसी को टिप्पणी करने की कोई गुंजाइश इसलिए भी नहीं है क्योंकि मेरे परिवार में मेरे अलावा कोई चिट्ठाकारी में सक्रिय नहीं है। वैसे, एक परिवार में कई लोगों का चिट्ठाकारी में सक्रिय होना कोई बुरी बात नहीं, बल्कि कई दृष्टिकोणों से बहुत अच्छी बात है। और, यही बात जब पहली बार मैंने ब्लॉगर मीट पर अपनी रिपोर्ट वाली पोस्ट में अत्यंत प्रसन्नता और निर्दोष भाव से उल्लेख की थी कि उसमें मसिजीवी जी सपरिवार शामिल हुए थे तो मसिजीवी जी ने उस पोस्ट पर सरेआम टिप्पणी करके वह बात लिखने पर मुझे मानहानि का मुकदमा झेलने के लिए तैयार रहने की धमकी दी थी। उस पोस्ट पर मसिजीवी का यह टिप्पणी करने का आखिर क्या आशय था कि नीलिमा के 
साथ उनके जैसे &#039;औघड़&#039; का नाम पति के रूप में जोड़ना उन्हें तो बुरा नहीं लगेगा, लेकिन नीलिमा को इतना बुरा जरूर लग सकता है कि वह मेरे ऊपर मुकदमा करने के लिए सोच सकती हैं? क्या वह मुझे आपकी दीदी के साथ किसी गैर-मर्द के रूप में अपना नाम जोड़ने के अपराध के लिए धमकी दे रहे थे? आप पूछिए अपने जीजाश्री से। 

मैंने नीलिमा जी और आपकी मर्यादा एवं सम्मान के विरुद्ध कभी कुछ नहीं लिखा है। नीलिमा जी तो ख़ैर वैसे भी मसिजीवी जी की खुराफातों में शामिल नहीं रही हैं, लेकिन शायद आप किसी हद तक शामिल जरूर रही हैं। फिर भी मैंने जब भी टिप्पणी की, उन मुखौटों के संबंध में की जिन्हें समय-समय पर धारण करके मेरे संबंध में टिप्पणियां की गईं, न कि आपके संबंध में, जिनसे मैं प्रत्यक्ष मिल भी चुका हूं। किसी भी महिला चिट्ठाकार के खिलाफ अप्रिय टिप्पणी करने की हिम्मत भला मैं कैसे कर सकता हूं! :) भले ही सौ मसिजीवियों और हजार अविनाशों से मैं सरेआम टक्कर मोल ले लूँ, लेकिन किसी महिला चिट्ठाकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की हिमाकत करना मेरे बूते के बाहर है। :)  इसमें चौपटस्वामी जैसे औघड़ ही किसी हद तक समर्थ होंगे। :)

मसिजीवी सैद्धांतिक तौर पर व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार को चिट्ठाकारी का स्वाभाविक अंग मानते रहे हैं और मुखौटावाद के तो वह प्रवर्तक ही हैं। लेकिन यह तो उनकी प्रतिक्रिया से जाहिर हो चुका है कि दूसरों की तरह उन्हें भी अपने ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपों पर आपत्ति होती है और मुखौटा धारण करने के संकट से भी वह परेशान हो चुके हैं। उनके साथ मेरा विरोध भी सैद्धांतिक ही रहा है और मैंने जो भी कुछ कहा है वह खुलेआम कहा है, जिस अंदाज में उन्होंने पहला वार किया है, उसी अंदाज में मैंने पलटवार किया है। वैसे भी, पहला वार मैं कभी किसी के विरुद्ध नहीं करता, लेकिन जो कोई हमला करता है उसका मुंहतोड़ उत्तर मैं जरूर देता हूं। शब्दों की इस लड़ाई से मुझे परहेज नहीं है, क्योंकि शब्दों की लड़ाई के अखाड़े में ही मुझे रोजाना घंटों गुजारने पड़ते हैं। 

&lt;blockquote&gt;5. और फिर सृजन जी आप से भी मेरी कभी कोई बात -सम्वाद नही हुआ । क्या आप भी चौपट जी की सोच में शामिल है । यदि नही जनते कि मसिजीवी की मै साली हू तो क्या आप लोग मुझे अनावश्यक बीच मे लाते ?&lt;/blockquote&gt;

जी हां, आपके साथ मेरा संवाद पिछले ब्लॉगर मीट के बाद से नहीं हुआ है। लेकिन नीलिमा जी और मसिजीवी जी के साथ संवाद अक्सर होता रहा है और आप उन्हीं से पूछिए कि चौपटस्वामी जी ने यहां जो प्रतिक्रिया व्यक्त की है उस सोच में मैं शामिल हूँ या नहीं। चौपटस्वामी जी, आप भले ही मेरे प्रवक्ता न हों, लेकिन सुजाता जी के इस सवाल पर इतना स्पष्टीकरण तो दे ही सकते हैं कि आपने अपनी पोस्ट में जो कुछ लिखा है, उस सोच में किसी भी रूप में मेरी प्रेरणा या प्रभाव शामिल नहीं है। 

लेकिन सुजाता जी, आप अपने प्यारे जीजाश्री से यह जरूर पूछिएगा कि उनकी पिछली धमकी के साथ-साथ निम्नलिखित ताज़ा धमकी का क्या आशय है- 
&lt;blockquote&gt;हम फिर वही कह रहे हैं कि ऐसे ही और इससे भी अधिक टटकी तर्कपद्धति से लेकिन अधिक मजबूत किलेबंदी से सवाल उठाए जाएंगे...भाषा इससे भी ज्‍यादा अश्‍लील होगी।&lt;/blockquote&gt;

मेरा ख्याल है कि यदि मसिजीवी जी ने यह पंक्ति न लिखी होती तो चौपटस्वामी इतने घातक प्रहार के साथ अपनी यह पोस्ट न लिखे होते, और फुरसतिया जी को भी अपनी भतीजी की शादी के व्यस्ततम और पावनतम अवसर के बीच इस तरह की अप्रिय बातों को समझने और हस्तक्षेप करने का गैर-जरूरी और स्तरहीन कार्य नहीं करना पड़ता।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@ सुजाता जी,</p>
<blockquote><p>4. आपने और सृजन जी ने कहा &#8211; यह तो चेन रिएक्शन है &#8211; माने मसिजीवी हमला बोलेंगे तो जवाबी हमला होगा ही -जो दुखद भी है ।<br />
मुझे बताया जाए मसिजीवी ने हसन जी के , आपके या सृजन जी के परिवार को लेकर कहँ टिप्पणी की है या पूरी पोस्ट लिखी है ।</p></blockquote>
<p>मैं गड़े मुर्दे उखाड़ना नहीं चाहता था। यह सवाल आपकी बजाय मसिजीवी पूछते तो मेरा उन्हें सीधा जवाब देना सही रहता। </p>
<p>मैंने अपनी पहले वाली टिप्पणी में आपका कोई जिक्र नहीं किया है, इसलिए आप मुझसे यह सवाल क्यों कर रही हैं, यह मैं समझ नहीं पाया। ख़ैर, मेरे परिवार के संबंध में किसी को टिप्पणी करने की कोई गुंजाइश इसलिए भी नहीं है क्योंकि मेरे परिवार में मेरे अलावा कोई चिट्ठाकारी में सक्रिय नहीं है। वैसे, एक परिवार में कई लोगों का चिट्ठाकारी में सक्रिय होना कोई बुरी बात नहीं, बल्कि कई दृष्टिकोणों से बहुत अच्छी बात है। और, यही बात जब पहली बार मैंने ब्लॉगर मीट पर अपनी रिपोर्ट वाली पोस्ट में अत्यंत प्रसन्नता और निर्दोष भाव से उल्लेख की थी कि उसमें मसिजीवी जी सपरिवार शामिल हुए थे तो मसिजीवी जी ने उस पोस्ट पर सरेआम टिप्पणी करके वह बात लिखने पर मुझे मानहानि का मुकदमा झेलने के लिए तैयार रहने की धमकी दी थी। उस पोस्ट पर मसिजीवी का यह टिप्पणी करने का आखिर क्या आशय था कि नीलिमा के<br />
साथ उनके जैसे &#8216;औघड़&#8217; का नाम पति के रूप में जोड़ना उन्हें तो बुरा नहीं लगेगा, लेकिन नीलिमा को इतना बुरा जरूर लग सकता है कि वह मेरे ऊपर मुकदमा करने के लिए सोच सकती हैं? क्या वह मुझे आपकी दीदी के साथ किसी गैर-मर्द के रूप में अपना नाम जोड़ने के अपराध के लिए धमकी दे रहे थे? आप पूछिए अपने जीजाश्री से। </p>
<p>मैंने नीलिमा जी और आपकी मर्यादा एवं सम्मान के विरुद्ध कभी कुछ नहीं लिखा है। नीलिमा जी तो ख़ैर वैसे भी मसिजीवी जी की खुराफातों में शामिल नहीं रही हैं, लेकिन शायद आप किसी हद तक शामिल जरूर रही हैं। फिर भी मैंने जब भी टिप्पणी की, उन मुखौटों के संबंध में की जिन्हें समय-समय पर धारण करके मेरे संबंध में टिप्पणियां की गईं, न कि आपके संबंध में, जिनसे मैं प्रत्यक्ष मिल भी चुका हूं। किसी भी महिला चिट्ठाकार के खिलाफ अप्रिय टिप्पणी करने की हिम्मत भला मैं कैसे कर सकता हूं! <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  भले ही सौ मसिजीवियों और हजार अविनाशों से मैं सरेआम टक्कर मोल ले लूँ, लेकिन किसी महिला चिट्ठाकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की हिमाकत करना मेरे बूते के बाहर है। <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />   इसमें चौपटस्वामी जैसे औघड़ ही किसी हद तक समर्थ होंगे। <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>मसिजीवी सैद्धांतिक तौर पर व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार को चिट्ठाकारी का स्वाभाविक अंग मानते रहे हैं और मुखौटावाद के तो वह प्रवर्तक ही हैं। लेकिन यह तो उनकी प्रतिक्रिया से जाहिर हो चुका है कि दूसरों की तरह उन्हें भी अपने ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपों पर आपत्ति होती है और मुखौटा धारण करने के संकट से भी वह परेशान हो चुके हैं। उनके साथ मेरा विरोध भी सैद्धांतिक ही रहा है और मैंने जो भी कुछ कहा है वह खुलेआम कहा है, जिस अंदाज में उन्होंने पहला वार किया है, उसी अंदाज में मैंने पलटवार किया है। वैसे भी, पहला वार मैं कभी किसी के विरुद्ध नहीं करता, लेकिन जो कोई हमला करता है उसका मुंहतोड़ उत्तर मैं जरूर देता हूं। शब्दों की इस लड़ाई से मुझे परहेज नहीं है, क्योंकि शब्दों की लड़ाई के अखाड़े में ही मुझे रोजाना घंटों गुजारने पड़ते हैं। </p>
<blockquote><p>5. और फिर सृजन जी आप से भी मेरी कभी कोई बात -सम्वाद नही हुआ । क्या आप भी चौपट जी की सोच में शामिल है । यदि नही जनते कि मसिजीवी की मै साली हू तो क्या आप लोग मुझे अनावश्यक बीच मे लाते ?</p></blockquote>
<p>जी हां, आपके साथ मेरा संवाद पिछले ब्लॉगर मीट के बाद से नहीं हुआ है। लेकिन नीलिमा जी और मसिजीवी जी के साथ संवाद अक्सर होता रहा है और आप उन्हीं से पूछिए कि चौपटस्वामी जी ने यहां जो प्रतिक्रिया व्यक्त की है उस सोच में मैं शामिल हूँ या नहीं। चौपटस्वामी जी, आप भले ही मेरे प्रवक्ता न हों, लेकिन सुजाता जी के इस सवाल पर इतना स्पष्टीकरण तो दे ही सकते हैं कि आपने अपनी पोस्ट में जो कुछ लिखा है, उस सोच में किसी भी रूप में मेरी प्रेरणा या प्रभाव शामिल नहीं है। </p>
<p>लेकिन सुजाता जी, आप अपने प्यारे जीजाश्री से यह जरूर पूछिएगा कि उनकी पिछली धमकी के साथ-साथ निम्नलिखित ताज़ा धमकी का क्या आशय है- </p>
<blockquote><p>हम फिर वही कह रहे हैं कि ऐसे ही और इससे भी अधिक टटकी तर्कपद्धति से लेकिन अधिक मजबूत किलेबंदी से सवाल उठाए जाएंगे&#8230;भाषा इससे भी ज्‍यादा अश्‍लील होगी।</p></blockquote>
<p>मेरा ख्याल है कि यदि मसिजीवी जी ने यह पंक्ति न लिखी होती तो चौपटस्वामी इतने घातक प्रहार के साथ अपनी यह पोस्ट न लिखे होते, और फुरसतिया जी को भी अपनी भतीजी की शादी के व्यस्ततम और पावनतम अवसर के बीच इस तरह की अप्रिय बातों को समझने और हस्तक्षेप करने का गैर-जरूरी और स्तरहीन कार्य नहीं करना पड़ता।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: arun</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-60</link>
		<dc:creator>arun</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 May 2007 01:53:42 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-60</guid>
		<description>अब हम का बॊले इहा तो झगडा ही समाप्त हो गया हम तो सोचते थे कि हम समझौता करायेगे और कुछ पार्टी वार्टी भी मिलेगी</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अब हम का बॊले इहा तो झगडा ही समाप्त हो गया हम तो सोचते थे कि हम समझौता करायेगे और कुछ पार्टी वार्टी भी मिलेगी</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: फुरसतिया &#187; कानपुर में ब्लागर मिलन</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-59</link>
		<dc:creator>फुरसतिया &#187; कानपुर में ब्लागर मिलन</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 May 2007 18:41:58 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-59</guid>
		<description>[...] आज जब इस पोस्ट को दुबारा पढ़ा तो मुझे अफसोस हुआ और [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] आज जब इस पोस्ट को दुबारा पढ़ा तो मुझे अफसोस हुआ और [...]</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: sujata</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-58</link>
		<dc:creator>sujata</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 May 2007 06:57:00 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-58</guid>
		<description>पहले तो कुछ नही लिखना चाहती थी पर आपकी हर टिप्पणी पर दी गयी प्रतिक्रिया देख लगा आपका चित्त शांत है ।
1. चिट्टःआचर्चा करके मेरा सशक्तिकरण हुआ है ? यह बात हास्यस्पद है । आप को भी निमंत्रण मिला था चर्चा करने का । आप नही करते तो क्या किया जाए ।
2. मै चर्चा किए बिना , ब्लॉग बनाने से पहले भी सशक्त ही थी । ब्लॉगिंग कर सकने वाली हर स्त्री सशक्त है चाहे बेजी हो ,प्रत्यक्षा, घुघुती-बसूती या मान्या हो या नीलिमा । वे चर्चा क्यो नही कर्ती , यह मेरी रुचि का प्रश्न तो नही पर आप्ने मुझमे ज़्यादा रुचि दिखा दी है । क्या कहना चाहते है आप ?
3. हसन जमाल पर मैने कोई बहस- तिप्पणी नही की , तो इस सारे मुआमले मे मसिजीवी के साथ मुझे और नीलिमा को आपने अनावश्यक क्यो घसीटा ? रस लेने के लिए ?किसी पुरुष के परिवार की स्त्रियो पर हमला करना खुन्दक निकालने का सबसे घटिया तरीका है । मै इसे अश्लील ,अभद्र मानती हूँ । हाँ यदि मैने हसन जी के बारे मे कुछ कहा होता तो आप मुझ पर भी प्रश्न लगाते ।
4. आपने और सृजन जी ने कहा - यह तो  चेन रिएक्शन है - माने मसिजीवी हमला बोलेंगे तो जवाबी हमला होगा ही -जो दुखद भी है ।
 मुझे बताया जाए मसिजीवी ने हसन जी के , आपके या सृजन जी के परिवार को लेकर कहँ टिप्पणी की है या पूरी पोस्ट लिखी है ।
5. और फिर सृजन जी आप से भी मेरी कभी कोई बात -सम्वाद नही हुआ  । क्या आप भी चौपट जी की सोच में शामिल है । यदि नही जनते कि मसिजीवी की मै साली हू तो क्या आप लोग मुझे अनावश्यक बीच मे लाते ?यह देखिये  मसिजीवी के एक लेख की टिप्पणियो में मेरा अनावश्यक ज़िक्र-Anonymous said... 
समीर जी ,सही राय है अब मीटिंग कर ही लो नोट पैड के साथ 

6:50 AM 

मेरा ई पन्ना said... 
anonymous jee
नोटपैड की बडी याद रखते हो ?
क्या चक्कर है? 

9:26 AM 

सूदखोर said... 
चह है कि साथ मे नोट पैड होगी तो दोनों का दिल बहला रहेगा। :) 
. 

10:15 PM 


 6  क्या मै इस सोच को आप सब सज्जनों की प्रतिनिधि सोच मानूँ ?


****************

( सुजाता जी,

            मन शांत ही है . ऐसा अशांत पहले भी नहीं था . पर एक बुज़ुर्ग के अवांछित मान-मर्दन और उपहास से व्यथित अवश्य था . समकाल पर मैं चौपटस्वामी हूं . मुखौटा मुझे मसिजीवी जितना आज़ाद करता है कि नहीं पता नहीं पर थोड़ी-बहुत वस्तुनिष्ठता और आज़ादी तो देता ही है .

१. यह महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है कि मुझे चर्चा का निमंत्रण मिला था या नहीं . मैं ऐसा करना चाहता हूं या नहीं , यह भी शायद इस संदर्भ में प्रासंगिक नहीं है . 

२. आपकी क्षमता पर कहां प्रश्नचिह्न लगाया है ? . शायद आपने ठीक से पढा नहीं . कृपया पुनः पढें . मैंने तो स्पष्ट लिखा है कि :
        &quot;&lt;strong&gt;नीलिमा और नोटपैड की क्षमता आश्वस्त करने वाली है. ये मसिजीवी की मदद के बिना भी अपनी जगह बनाने में सक्षम हैं.&quot;&lt;/strong&gt;
 मैं बहुत जानता नहीं आपके बारे में पर जब आप इतने विश्वास से कह रही हैं तो निश्चित रूप से आप सशक्त होंगी . चिट्ठा-चर्चा से आपको कोई माइलेज़ नहीं मिला है यह भी जब आप कह रही हैं तो सच ही कह रही होंगी . आपकी इस बात पर भी कोई ऐतराज़ नहीं है कि &#039;ब्लॉगिंग करने वाली हर स्त्री स्वतंत्र है&#039; .  आप कह रही हैं तो होगी --  ज़रूर होगी . जहां तक मेरी रुचि की बात है तो पुनः आपको अपनी पोस्ट की ओर ले चलूंगा जहां लिखा है :&lt;strong&gt;&#039; जैसे अन्य चिट्ठाकारों का जिक्र हो सकता है वैसे ही इनका भी हो सकता है &#039; &lt;/strong&gt;. अगर रुचि की बात करेंगी तो बस मेरी उतनी-सी ही रुचि थी . न उससे कम और न ज्यादा . और उस बड़ी-सी पोस्ट में बस उतना ही ज़िक्र हुआ है जितना उस घटनाक्रम/प्रसंग को बताने के लिए आवश्यक था .  दरअसल हसन जमाल पर वह उपहास और हिकारत से भरी पोस्ट लिखने और पुनः उसे जस्टीफ़ाई करने के पश्चात मेरी रुचि मसिजीवी में थी . आप तो मसिजीवी की रुचि के नाते इस कड़ी में आ जुड़ीं . बस यही कहना है .

३. हसन जमाल को कूपमंडूक और फूहड़ कह रहे मसिजीवी की थोड़ी-बहुत खबर ली थी . पर आपको और नीलिमा जी को तो कुछ भी अन्यथा नहीं कहा (बल्कि,आप दोनों की सामर्थ्य की तो तारीफ़ ही की है ) सिवाय इसके कि एक-साथ एक ही परिवार के तीन लोगों का शामिल होना संदेह पैदा करता है .  इससे गुटबंदी पैदा होने की भी आशंका थी . आखिर हम ही लोग राजनीति में परिवारवाद को कोसते हैं . &lt;strong&gt;सो आप लोगों को घसीटा नहीं, आप लोग एक पैकेज़ के रूप में साथ आए थे .&lt;/strong&gt; बल्कि मुझे तो यह ज्यादा अश्लील,अभद्र और आपकी क्षमताओं को &#039;अन्डरमाइन&#039; करने वाला लगता है कि आप और नीलिमा जैसे समर्थ व्यक्तित्व, जिन्हें मदद की कोई दरकार नहीं है, उनके पीछे मसिजीवी बिलावजह &#039;रक्षा-कवच&#039; और &#039;सहायता-यंत्र&#039; लिए घूमते रहते हैं . सो यहां हम दोनों की व्याख्या में फ़र्क है . इस पर कभी फ़ुरसत से लम्बी बहस करेंगे .

४. एक बार फिर से पढिएगा . पहली पोस्ट पूरी की पूरी हसन जमाल पर है . मसिजीवी उसमें उतने भी नहीं हैं जितना आटे में नमक होता है . दूसरी पोस्ट मसिजीवी पर ही थी . वे उसके &#039;हीरो&#039; थे . तो वे तो केन्द्र में होंगे ही . आपका नामोल्लेख सिर्फ़ उस पैराग्राफ में है जहां गुटबंदी और परिवारवाद की ओर संकेत है . परिवारवाद के मुद्दे पर चर्चा हो और परिवार के किसी व्यक्ति का नाम न आए ऐसा सम्भव नहीं दिखता . यह वैसे ही है जैसे कहा जाए कि स्त्रियों के भ्रष्टाचार पर चर्चा न करना वरना तुम्हें स्त्री-विरोधी मान लिया जाएगा . हां अभद्र और अश्लील टिप्पणी नहीं होनी चाहिए . जहां तक चेन रिएक्शन की बात है . वह बुरा है,पर होता है . इस यथार्थ को आप और मसिजीवी जैसे यथार्थवादियों से बेहतर भला और कौन समझेगा . 

५. सृजन शिल्पी की बात सृजन शिल्पी से कीजिएगा . मैं उनका प्रवक्ता नहीं हूं .

६. ये anonymous jee ,समीर जी , मेरा ई-पन्ना और सूदखोर कौन हैं और आपसे और मसिजीवी जी से क्या चाहते हैं, मैं नहीं जानता . उनसे मेरा किसी किस्म का कोई वास्ता नहीं है . 

७. आप मुझे सज्जन या दुर्जन जो भी मानें , पर इस सोच का प्रतिनिधि कतई न मानें बस इतनी गुज़ारिश है .

आपकी बात का संयत और ईमानदार जवाब देने का यथासंभव प्रयास किया है . तथापि यदि किसी बात से मन को कष्ट पहुंचा हो तो खेद प्रकट करता हूं .

शुभकामनाओं सहित,

चौपटस्वामी )
</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पहले तो कुछ नही लिखना चाहती थी पर आपकी हर टिप्पणी पर दी गयी प्रतिक्रिया देख लगा आपका चित्त शांत है ।<br />
1. चिट्टःआचर्चा करके मेरा सशक्तिकरण हुआ है ? यह बात हास्यस्पद है । आप को भी निमंत्रण मिला था चर्चा करने का । आप नही करते तो क्या किया जाए ।<br />
2. मै चर्चा किए बिना , ब्लॉग बनाने से पहले भी सशक्त ही थी । ब्लॉगिंग कर सकने वाली हर स्त्री सशक्त है चाहे बेजी हो ,प्रत्यक्षा, घुघुती-बसूती या मान्या हो या नीलिमा । वे चर्चा क्यो नही कर्ती , यह मेरी रुचि का प्रश्न तो नही पर आप्ने मुझमे ज़्यादा रुचि दिखा दी है । क्या कहना चाहते है आप ?<br />
3. हसन जमाल पर मैने कोई बहस- तिप्पणी नही की , तो इस सारे मुआमले मे मसिजीवी के साथ मुझे और नीलिमा को आपने अनावश्यक क्यो घसीटा ? रस लेने के लिए ?किसी पुरुष के परिवार की स्त्रियो पर हमला करना खुन्दक निकालने का सबसे घटिया तरीका है । मै इसे अश्लील ,अभद्र मानती हूँ । हाँ यदि मैने हसन जी के बारे मे कुछ कहा होता तो आप मुझ पर भी प्रश्न लगाते ।<br />
4. आपने और सृजन जी ने कहा &#8211; यह तो  चेन रिएक्शन है &#8211; माने मसिजीवी हमला बोलेंगे तो जवाबी हमला होगा ही -जो दुखद भी है ।<br />
 मुझे बताया जाए मसिजीवी ने हसन जी के , आपके या सृजन जी के परिवार को लेकर कहँ टिप्पणी की है या पूरी पोस्ट लिखी है ।<br />
5. और फिर सृजन जी आप से भी मेरी कभी कोई बात -सम्वाद नही हुआ  । क्या आप भी चौपट जी की सोच में शामिल है । यदि नही जनते कि मसिजीवी की मै साली हू तो क्या आप लोग मुझे अनावश्यक बीच मे लाते ?यह देखिये  मसिजीवी के एक लेख की टिप्पणियो में मेरा अनावश्यक ज़िक्र-Anonymous said&#8230;<br />
समीर जी ,सही राय है अब मीटिंग कर ही लो नोट पैड के साथ </p>
<p>6:50 AM </p>
<p>मेरा ई पन्ना said&#8230;<br />
anonymous jee<br />
नोटपैड की बडी याद रखते हो ?<br />
क्या चक्कर है? </p>
<p>9:26 AM </p>
<p>सूदखोर said&#8230;<br />
चह है कि साथ मे नोट पैड होगी तो दोनों का दिल बहला रहेगा। <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
. </p>
<p>10:15 PM </p>
<p> 6  क्या मै इस सोच को आप सब सज्जनों की प्रतिनिधि सोच मानूँ ?</p>
<p>****************</p>
<p>( सुजाता जी,</p>
<p>            मन शांत ही है . ऐसा अशांत पहले भी नहीं था . पर एक बुज़ुर्ग के अवांछित मान-मर्दन और उपहास से व्यथित अवश्य था . समकाल पर मैं चौपटस्वामी हूं . मुखौटा मुझे मसिजीवी जितना आज़ाद करता है कि नहीं पता नहीं पर थोड़ी-बहुत वस्तुनिष्ठता और आज़ादी तो देता ही है .</p>
<p>१. यह महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है कि मुझे चर्चा का निमंत्रण मिला था या नहीं . मैं ऐसा करना चाहता हूं या नहीं , यह भी शायद इस संदर्भ में प्रासंगिक नहीं है . </p>
<p>२. आपकी क्षमता पर कहां प्रश्नचिह्न लगाया है ? . शायद आपने ठीक से पढा नहीं . कृपया पुनः पढें . मैंने तो स्पष्ट लिखा है कि :<br />
        &#8220;<strong>नीलिमा और नोटपैड की क्षमता आश्वस्त करने वाली है. ये मसिजीवी की मदद के बिना भी अपनी जगह बनाने में सक्षम हैं.&#8221;</strong><br />
 मैं बहुत जानता नहीं आपके बारे में पर जब आप इतने विश्वास से कह रही हैं तो निश्चित रूप से आप सशक्त होंगी . चिट्ठा-चर्चा से आपको कोई माइलेज़ नहीं मिला है यह भी जब आप कह रही हैं तो सच ही कह रही होंगी . आपकी इस बात पर भी कोई ऐतराज़ नहीं है कि &#8216;ब्लॉगिंग करने वाली हर स्त्री स्वतंत्र है&#8217; .  आप कह रही हैं तो होगी &#8212;  ज़रूर होगी . जहां तक मेरी रुचि की बात है तो पुनः आपको अपनी पोस्ट की ओर ले चलूंगा जहां लिखा है :<strong>&#8216; जैसे अन्य चिट्ठाकारों का जिक्र हो सकता है वैसे ही इनका भी हो सकता है &#8216; </strong>. अगर रुचि की बात करेंगी तो बस मेरी उतनी-सी ही रुचि थी . न उससे कम और न ज्यादा . और उस बड़ी-सी पोस्ट में बस उतना ही ज़िक्र हुआ है जितना उस घटनाक्रम/प्रसंग को बताने के लिए आवश्यक था .  दरअसल हसन जमाल पर वह उपहास और हिकारत से भरी पोस्ट लिखने और पुनः उसे जस्टीफ़ाई करने के पश्चात मेरी रुचि मसिजीवी में थी . आप तो मसिजीवी की रुचि के नाते इस कड़ी में आ जुड़ीं . बस यही कहना है .</p>
<p>३. हसन जमाल को कूपमंडूक और फूहड़ कह रहे मसिजीवी की थोड़ी-बहुत खबर ली थी . पर आपको और नीलिमा जी को तो कुछ भी अन्यथा नहीं कहा (बल्कि,आप दोनों की सामर्थ्य की तो तारीफ़ ही की है ) सिवाय इसके कि एक-साथ एक ही परिवार के तीन लोगों का शामिल होना संदेह पैदा करता है .  इससे गुटबंदी पैदा होने की भी आशंका थी . आखिर हम ही लोग राजनीति में परिवारवाद को कोसते हैं . <strong>सो आप लोगों को घसीटा नहीं, आप लोग एक पैकेज़ के रूप में साथ आए थे .</strong> बल्कि मुझे तो यह ज्यादा अश्लील,अभद्र और आपकी क्षमताओं को &#8216;अन्डरमाइन&#8217; करने वाला लगता है कि आप और नीलिमा जैसे समर्थ व्यक्तित्व, जिन्हें मदद की कोई दरकार नहीं है, उनके पीछे मसिजीवी बिलावजह &#8216;रक्षा-कवच&#8217; और &#8216;सहायता-यंत्र&#8217; लिए घूमते रहते हैं . सो यहां हम दोनों की व्याख्या में फ़र्क है . इस पर कभी फ़ुरसत से लम्बी बहस करेंगे .</p>
<p>४. एक बार फिर से पढिएगा . पहली पोस्ट पूरी की पूरी हसन जमाल पर है . मसिजीवी उसमें उतने भी नहीं हैं जितना आटे में नमक होता है . दूसरी पोस्ट मसिजीवी पर ही थी . वे उसके &#8216;हीरो&#8217; थे . तो वे तो केन्द्र में होंगे ही . आपका नामोल्लेख सिर्फ़ उस पैराग्राफ में है जहां गुटबंदी और परिवारवाद की ओर संकेत है . परिवारवाद के मुद्दे पर चर्चा हो और परिवार के किसी व्यक्ति का नाम न आए ऐसा सम्भव नहीं दिखता . यह वैसे ही है जैसे कहा जाए कि स्त्रियों के भ्रष्टाचार पर चर्चा न करना वरना तुम्हें स्त्री-विरोधी मान लिया जाएगा . हां अभद्र और अश्लील टिप्पणी नहीं होनी चाहिए . जहां तक चेन रिएक्शन की बात है . वह बुरा है,पर होता है . इस यथार्थ को आप और मसिजीवी जैसे यथार्थवादियों से बेहतर भला और कौन समझेगा . </p>
<p>५. सृजन शिल्पी की बात सृजन शिल्पी से कीजिएगा . मैं उनका प्रवक्ता नहीं हूं .</p>
<p>६. ये anonymous jee ,समीर जी , मेरा ई-पन्ना और सूदखोर कौन हैं और आपसे और मसिजीवी जी से क्या चाहते हैं, मैं नहीं जानता . उनसे मेरा किसी किस्म का कोई वास्ता नहीं है . </p>
<p>७. आप मुझे सज्जन या दुर्जन जो भी मानें , पर इस सोच का प्रतिनिधि कतई न मानें बस इतनी गुज़ारिश है .</p>
<p>आपकी बात का संयत और ईमानदार जवाब देने का यथासंभव प्रयास किया है . तथापि यदि किसी बात से मन को कष्ट पहुंचा हो तो खेद प्रकट करता हूं .</p>
<p>शुभकामनाओं सहित,</p>
<p>चौपटस्वामी )</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-57</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 May 2007 04:04:09 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-57</guid>
		<description>किनारे खड़े नहीं थे,...ऊह तो कानपुर में थे इसलिए खबर मिलने के बाद भी मुआफी उआफी मांग सकने की गुंजाइश नहीं थी। नेट सहजता से उपलब्‍ध नहीं था।

तो सर चौपटसुआमी जी, काहे टटके के मसिजीवी, कालिखजीवी, विध्‍नजीवी को भाव देते हैं, अरे बरसात के मेंढक हैं, टर्राएंगे ही फिर दम नहीं होगा तो चुप हो जाएंगे। आपने नाहक ही इतनी वयस्‍क समीक्षाई ऊर्जा इन नामालूम शख्सियत के लिए जाया की, और जब आप इतना श्रम कर रहे थे तब न जाने कितने लोग अपने चिट्ठे में वर्तनी की गलतियॉं कर बैठे, पुल्लिंग के साथ ईकारान्‍त विशेषण लगा बैठे, रदीफ-कादिए की गलतियॉं कर बैठे उन्‍हें देखें। 
इतने पहुँचे लोगों को जो इतने पहुँचे लागों के इतने निकट हों, इन लोगों के मुँह लगना नहीं चाहिए। मटिआइए इन्‍हें।

आप नाहक ही इन्‍हें &#039;बड़े कलेजे&#039; (फो ग्रा) का घोषित कर रहे हैं और जैसा ये कह रहे थे कि आपकी भाषा अश्‍लील हो जाएगी, देखो आपने कर दिखाया।

हम फिर भी कहते हैं छोडि़ए मटिआइए....बाकि दिल न भरा हो तो उनको ईमेल कर और गलिया लीजिए काहे अपने चिट्ठे को और गंधा देने पर तुले हैं, आखिर आदमी की पहचान यहॉं तो उसकी भाषा से ही होगी।

                                   *********** 


( प्रिय भाई मसिजीवी, 

  हसन जमाल साहब के प्रति अपने रुख में आप थोड़े उदार दिख रहे हैं . यह अच्छी बात है . गलतियां हम सब करते हैं . पर मान लेने या खेद व्यक्त करने से कोई छोटा नहीं हो जाता . बल्कि कद ऊंचा होता है. हां! आपने ठीक इशारा किया है . गलतियां देखता-दिखाता रहा हूं . आपको नागवार गुज़रा हो तो कहिएगा, बंद कर दूंगा .  बेहद सामान्य आदमी हैं हम . किसी की निकटता से कोई बड़ा नहीं होता . जो बड़ा या छोटा होता है, वह अपने ही कारण . झूठ नहीं बोलूंगा . ऊर्जा तो लगती है पर आप इतने नामालूम भी नहीं हैं . भाई आपके चिट्ठे के जरिए आपको जानते हैं हम . आपने भी थोड़ा अहसास किया . लो हमने भी झगड़ा मटिया दिया .

पर आप जो वहां कह रहे थे भाषा के बारे में , अब यहां कुछ और ही कह रहे हैं . एक ओर जब मटियाने को कह रहे है तो फिर प्रपंच काहे कर रहे हैं.अश्लील भाषा की धमकी आपने दी थी . हमने तो अपनी समझ के हिसाब से कुछ भी अश्लील नहीं कहा . हम किस लायक हैं जो कुछ कर दिखाएंगे . यह तो &#039;तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा&#039; के भाव से किया था . फिर भी यदि पंचों को लगता हो तो हम भूल सुधार के लिए भी तैयार हैं. रही बात गंधने-गंधाने की तो अपनी भाषा-शैली और स्वर की चिंता कीजिए . हम अपनी चिंता कर लेंगे . तथापि सुझाव और हितचिंता के लिए आभार!

दिल में ऐसा कुछ नहीं है . पढिए-लिखिए और मौज करिए . हां! बड़े-बुज़ुर्गों के बारे में थोड़ा सोच-समझ कर बोलिए . हम जो काम आज कर रहे हैं उसमें उन्होंने एक उम्र दी है . उनकी गलत बात का विरोध करते समय भी हमें उनके योगदान को नहीं भूलना चाहिए . कृतज्ञता का थोड़ा-बहुत अहसास ज़रूरी है .

हां! थोड़े सुधार के साथ आपकी इस बात से सहमत हूं कि आदमी की पहचान उसकी भाषा से होती है और होगी. खाली यहां या वहां नहीं बल्कि हर जगह .

फिर भी यदि किसी बात से आपको बहुत ठेस पहुंची हो तो खेद व्यक्त करने में भी मुझे कोई संकोच नहीं होगा . ई-मेल क्यों भाई . हम तो जो कुछ कह रहे हैं सबके सामने कह रहे हैं .

स्नेह सहित,

आपका 

चौपटस्वामी</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>किनारे खड़े नहीं थे,&#8230;ऊह तो कानपुर में थे इसलिए खबर मिलने के बाद भी मुआफी उआफी मांग सकने की गुंजाइश नहीं थी। नेट सहजता से उपलब्‍ध नहीं था।</p>
<p>तो सर चौपटसुआमी जी, काहे टटके के मसिजीवी, कालिखजीवी, विध्‍नजीवी को भाव देते हैं, अरे बरसात के मेंढक हैं, टर्राएंगे ही फिर दम नहीं होगा तो चुप हो जाएंगे। आपने नाहक ही इतनी वयस्‍क समीक्षाई ऊर्जा इन नामालूम शख्सियत के लिए जाया की, और जब आप इतना श्रम कर रहे थे तब न जाने कितने लोग अपने चिट्ठे में वर्तनी की गलतियॉं कर बैठे, पुल्लिंग के साथ ईकारान्‍त विशेषण लगा बैठे, रदीफ-कादिए की गलतियॉं कर बैठे उन्‍हें देखें।<br />
इतने पहुँचे लोगों को जो इतने पहुँचे लागों के इतने निकट हों, इन लोगों के मुँह लगना नहीं चाहिए। मटिआइए इन्‍हें।</p>
<p>आप नाहक ही इन्‍हें &#8216;बड़े कलेजे&#8217; (फो ग्रा) का घोषित कर रहे हैं और जैसा ये कह रहे थे कि आपकी भाषा अश्‍लील हो जाएगी, देखो आपने कर दिखाया।</p>
<p>हम फिर भी कहते हैं छोडि़ए मटिआइए&#8230;.बाकि दिल न भरा हो तो उनको ईमेल कर और गलिया लीजिए काहे अपने चिट्ठे को और गंधा देने पर तुले हैं, आखिर आदमी की पहचान यहॉं तो उसकी भाषा से ही होगी।</p>
<p>                                   *********** </p>
<p>( प्रिय भाई मसिजीवी, </p>
<p>  हसन जमाल साहब के प्रति अपने रुख में आप थोड़े उदार दिख रहे हैं . यह अच्छी बात है . गलतियां हम सब करते हैं . पर मान लेने या खेद व्यक्त करने से कोई छोटा नहीं हो जाता . बल्कि कद ऊंचा होता है. हां! आपने ठीक इशारा किया है . गलतियां देखता-दिखाता रहा हूं . आपको नागवार गुज़रा हो तो कहिएगा, बंद कर दूंगा .  बेहद सामान्य आदमी हैं हम . किसी की निकटता से कोई बड़ा नहीं होता . जो बड़ा या छोटा होता है, वह अपने ही कारण . झूठ नहीं बोलूंगा . ऊर्जा तो लगती है पर आप इतने नामालूम भी नहीं हैं . भाई आपके चिट्ठे के जरिए आपको जानते हैं हम . आपने भी थोड़ा अहसास किया . लो हमने भी झगड़ा मटिया दिया .</p>
<p>पर आप जो वहां कह रहे थे भाषा के बारे में , अब यहां कुछ और ही कह रहे हैं . एक ओर जब मटियाने को कह रहे है तो फिर प्रपंच काहे कर रहे हैं.अश्लील भाषा की धमकी आपने दी थी . हमने तो अपनी समझ के हिसाब से कुछ भी अश्लील नहीं कहा . हम किस लायक हैं जो कुछ कर दिखाएंगे . यह तो &#8216;तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा&#8217; के भाव से किया था . फिर भी यदि पंचों को लगता हो तो हम भूल सुधार के लिए भी तैयार हैं. रही बात गंधने-गंधाने की तो अपनी भाषा-शैली और स्वर की चिंता कीजिए . हम अपनी चिंता कर लेंगे . तथापि सुझाव और हितचिंता के लिए आभार!</p>
<p>दिल में ऐसा कुछ नहीं है . पढिए-लिखिए और मौज करिए . हां! बड़े-बुज़ुर्गों के बारे में थोड़ा सोच-समझ कर बोलिए . हम जो काम आज कर रहे हैं उसमें उन्होंने एक उम्र दी है . उनकी गलत बात का विरोध करते समय भी हमें उनके योगदान को नहीं भूलना चाहिए . कृतज्ञता का थोड़ा-बहुत अहसास ज़रूरी है .</p>
<p>हां! थोड़े सुधार के साथ आपकी इस बात से सहमत हूं कि आदमी की पहचान उसकी भाषा से होती है और होगी. खाली यहां या वहां नहीं बल्कि हर जगह .</p>
<p>फिर भी यदि किसी बात से आपको बहुत ठेस पहुंची हो तो खेद व्यक्त करने में भी मुझे कोई संकोच नहीं होगा . ई-मेल क्यों भाई . हम तो जो कुछ कह रहे हैं सबके सामने कह रहे हैं .</p>
<p>स्नेह सहित,</p>
<p>आपका </p>
<p>चौपटस्वामी</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-56</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 May 2007 10:44:07 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-56</guid>
		<description>चिट्ठा जगत में विचार-विश्लेषण और बहस की प्रक्रिया के दौरान व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार से यथासंभव बचने की कोशिश की जाए -  इस आशय के प्रस्ताव का मुखर रूप से विरोध करने वालों में मसिजीवी अग्रणी रहे हैं। वह इसे चिट्ठाकारी के मिजाज का अंग मानते हैं और इसे दस्तूर की तरह निभाने का यत्न भी करते रहे हैं। जाहिर है कि वह अकेले ऐसे नहीं हैं, कुछ और साथी भी जब-तब हद की रेखा पार करते रहे हैं। 

जिस तरह कांटे को निकालने के लिए कांटे का इस्तेमाल और जहर के असर के शमन के लिए जहर का इस्तेमाल करना पड़ता है, उसी तरह का इस्तेमाल हिन्दी चिट्ठाकारी में भी कभी-कभी करना अपरिहार्य हो जाता है। लेकिन जैसा कि प्रमोद जी कहते हैं कि &quot;आपके जोर-जोर से बरजने से यहां किसी के मूल विचार बदलने नहीं वाले&quot;, यह बात कई साथियों के लिए वाकई सही है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चिट्ठा जगत में विचार-विश्लेषण और बहस की प्रक्रिया के दौरान व्यक्तिगत आक्षेप या प्रहार से यथासंभव बचने की कोशिश की जाए &#8211;  इस आशय के प्रस्ताव का मुखर रूप से विरोध करने वालों में मसिजीवी अग्रणी रहे हैं। वह इसे चिट्ठाकारी के मिजाज का अंग मानते हैं और इसे दस्तूर की तरह निभाने का यत्न भी करते रहे हैं। जाहिर है कि वह अकेले ऐसे नहीं हैं, कुछ और साथी भी जब-तब हद की रेखा पार करते रहे हैं। </p>
<p>जिस तरह कांटे को निकालने के लिए कांटे का इस्तेमाल और जहर के असर के शमन के लिए जहर का इस्तेमाल करना पड़ता है, उसी तरह का इस्तेमाल हिन्दी चिट्ठाकारी में भी कभी-कभी करना अपरिहार्य हो जाता है। लेकिन जैसा कि प्रमोद जी कहते हैं कि &#8220;आपके जोर-जोर से बरजने से यहां किसी के मूल विचार बदलने नहीं वाले&#8221;, यह बात कई साथियों के लिए वाकई सही है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: arun</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-55</link>
		<dc:creator>arun</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 May 2007 06:52:58 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-55</guid>
		<description>लिखने को बहुत कुछ है अगर लिखने पे आते
हमे अभि यही रहना है वर्ना आपसे आभार जताते
खुद को बताते है सागर,हैन्ड पम्प का नही है दम
देख रहे है आज तमाशा,किनारे से हम</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लिखने को बहुत कुछ है अगर लिखने पे आते<br />
हमे अभि यही रहना है वर्ना आपसे आभार जताते<br />
खुद को बताते है सागर,हैन्ड पम्प का नही है दम<br />
देख रहे है आज तमाशा,किनारे से हम</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अफ़लातून</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-54</link>
		<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 May 2007 15:52:59 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-54</guid>
		<description>चौपटस्वामीजी , 
हल्के-फुल्के लगातार हल्लुक होते रहेंगे । चिट्ठेकारी टिकेगी , चिट्ठेबाजी उड़ जाएगी । विदेशी धन लेने वाली संस्थाओं और बौद्धिक साम्राज्यवाद से उनके सम्बन्ध पर चर्चा की जमीन तैयार हो गयी है,शुक्रिया ।

******* 

(भाई अफ़लातून जी,
    आपने बहुत सही लिखा है कि चिट्ठेकारी टिकेगी , चिट्ठेबाज़ी उड़ जाएगी . विदेशी धन का असर इस देश के युवाओं के मन पर दिखने लगा है . इस पर चर्चा होनी चाहिए .
सादर,
चौपटस्वामी )</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चौपटस्वामीजी ,<br />
हल्के-फुल्के लगातार हल्लुक होते रहेंगे । चिट्ठेकारी टिकेगी , चिट्ठेबाजी उड़ जाएगी । विदेशी धन लेने वाली संस्थाओं और बौद्धिक साम्राज्यवाद से उनके सम्बन्ध पर चर्चा की जमीन तैयार हो गयी है,शुक्रिया ।</p>
<p>******* </p>
<p>(भाई अफ़लातून जी,<br />
    आपने बहुत सही लिखा है कि चिट्ठेकारी टिकेगी , चिट्ठेबाज़ी उड़ जाएगी . विदेशी धन का असर इस देश के युवाओं के मन पर दिखने लगा है . इस पर चर्चा होनी चाहिए .<br />
सादर,<br />
चौपटस्वामी )</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अभय तिवारी</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-53</link>
		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 May 2007 15:47:18 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-53</guid>
		<description>मेरी पहली बात मसिजीवी से है.. भाई आप जो भी करें जो भी लिखें.. एक बार माथा ठण्डा कर लें.. और लेट कर सोचें.. फिर लिखें.. मुहम्मद साहब ने एक बड़ी प्यारी  बात कही है.. कि अगर किसी को गुस्सा आये और अगर वह खड़ा है तो बैठ जाय और फिर भी गुस्सा ना जाय तो लेट जाय.. 
दूसरी बात स्वामी जी से.. आप एक बार अपने विश्लेषण पर पुनर्विचार करें.. क्या आपका विश्लेषण अतिरेक में इकतरफ़ा नहीं हो गया.. और हो सके तो पश्चलेख छापें..

तीसरी बात जमाल साब से.. हमें माफ़ कर दें.. हम से गलती हुई है..


( प्रिय अभय भाई,
  पश्चलेख लिखूं या मसिजीवी जी की टिप्पणी पर मेरी प्रतिक्रिया को ही पश्चलेख मान लेंगे ? आप कह रहे हैं तो बात में कुछ तो सच्चाई होगी ही .
   --  चौपटस्वामी )</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरी पहली बात मसिजीवी से है.. भाई आप जो भी करें जो भी लिखें.. एक बार माथा ठण्डा कर लें.. और लेट कर सोचें.. फिर लिखें.. मुहम्मद साहब ने एक बड़ी प्यारी  बात कही है.. कि अगर किसी को गुस्सा आये और अगर वह खड़ा है तो बैठ जाय और फिर भी गुस्सा ना जाय तो लेट जाय..<br />
दूसरी बात स्वामी जी से.. आप एक बार अपने विश्लेषण पर पुनर्विचार करें.. क्या आपका विश्लेषण अतिरेक में इकतरफ़ा नहीं हो गया.. और हो सके तो पश्चलेख छापें..</p>
<p>तीसरी बात जमाल साब से.. हमें माफ़ कर दें.. हम से गलती हुई है..</p>
<p>( प्रिय अभय भाई,<br />
  पश्चलेख लिखूं या मसिजीवी जी की टिप्पणी पर मेरी प्रतिक्रिया को ही पश्चलेख मान लेंगे ? आप कह रहे हैं तो बात में कुछ तो सच्चाई होगी ही .<br />
   &#8212;  चौपटस्वामी )</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: प्रमोद सिंह</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-52</link>
		<dc:creator>प्रमोद सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 May 2007 15:15:27 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samakaal.wordpress.com/2007/05/08/hasanjamal-2/#comment-52</guid>
		<description>चौपट स्‍वामी जी, ऊपर दो बार अपने नाम के ज़ि‍क्र से यूं भी आपके पाले में खड़ा होने और इसके और उसके खिलाफ़ दिखने का खतरा हो गया है. हसन जमाल साहब को इस समूचे प्रकरण से कैसी, कितनी ठेस पहुंची है, इसका भी मुझे ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं. लेकिन अगर वह दुखी हुए हैं, तो मुझे अभी भी लगता है कि जिस भी सूरत में संभव हो उन तक यह बात कन्‍वे होनी चाहिये कि इस मूखर्तापूर्ण फजीहत में वे अकेले नहीं खड़े हैं, और सवा सौ की इस भीड़ में ऐसे लोग हैं जिनकी सम्‍वेदना उनके साथ है, और उनके कुछ तर्कों से सहमति न हो तो काफी सारे तर्कों से सहमति है भी. रही बात बाबू मसिजीवी जी व उनकी लिखाई व तथाकथित &#039;पारिवारिक&#039; खेमेबंदी की, तो हमें लगता है भाई साहब, हम सभी टूटे पायों पर खड़े लोकतंत्र को जीने के अभ्‍यासी हैं. कभी उसमें कुछ बुरा होता है. कभी बहुत&#039;बहुत बुरा होता है. क्‍या किया जाए ऐसा ही लोकतंत्र हमारे हिस्‍से आया है. चाहे किसी के अपने ब्‍लॉग पर हो, या फिर चिट्ठा चर्चा में, आदमी दुरुस्‍त लेखन नहीं करेगा तो उसे पढ़नेवाले भी एक सीमा तक ही भाव देंगे. इससे ज्‍यादा उस पर ऊर्जा खरचना, मेरी समझ से, उक्‍त लेखन का नहीं आपकी ऊर्जा का अपव्‍यय है. मन इतना कड़वा न करें. बच्‍चे हैं, बच्‍चों को ठुमका लगाने दें. आपके जोर-जोर से बरजने से यहां किसी के मूल विचार बदलने नहीं वाले. जिसको तकलीफ पहुंची है हम उसकी ज्‍यादा चिंता करें.

( प्रिय प्रमोद भाई,
                    लगता है मैंने अनचाहे आपको विषम स्थिति में डाल दिया . आप किसी के पक्ष या खिलाफ़ में नहीं हो सकते .  मैं आपको अपने खिलाफ़ कभी नहीं समझूंगा . आप तो वही कहते रहे हैं जो आपको ठीक लगता है और वही कहना भी चाहिए . क्या कहूं! संवेदना बची है तो सब बचा है . आपकी बात समझ रहा हूं . हम ऐसे ही समय में रहने को अभिशप्त हैं . जितना अंतर कर और रख सकते हैं उतना रखते-करते हुए . ऊर्जा के अपव्यय के संबंध में आपके विचार ध्यान रखने योग्य हैं . बच्चे ठुमका लगाएं कोई दिक्कत नहीं है . हम भी प्रमुदित होंगे . बस किसी बुज़ुर्ग की खोपड़ी पर ठोल न लगाएं .

बाकी तो फिर &#039;मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना&#039; .

सादर आपका

चौपटस्वामी )</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चौपट स्‍वामी जी, ऊपर दो बार अपने नाम के ज़ि‍क्र से यूं भी आपके पाले में खड़ा होने और इसके और उसके खिलाफ़ दिखने का खतरा हो गया है. हसन जमाल साहब को इस समूचे प्रकरण से कैसी, कितनी ठेस पहुंची है, इसका भी मुझे ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं. लेकिन अगर वह दुखी हुए हैं, तो मुझे अभी भी लगता है कि जिस भी सूरत में संभव हो उन तक यह बात कन्‍वे होनी चाहिये कि इस मूखर्तापूर्ण फजीहत में वे अकेले नहीं खड़े हैं, और सवा सौ की इस भीड़ में ऐसे लोग हैं जिनकी सम्‍वेदना उनके साथ है, और उनके कुछ तर्कों से सहमति न हो तो काफी सारे तर्कों से सहमति है भी. रही बात बाबू मसिजीवी जी व उनकी लिखाई व तथाकथित &#8216;पारिवारिक&#8217; खेमेबंदी की, तो हमें लगता है भाई साहब, हम सभी टूटे पायों पर खड़े लोकतंत्र को जीने के अभ्‍यासी हैं. कभी उसमें कुछ बुरा होता है. कभी बहुत&#8217;बहुत बुरा होता है. क्‍या किया जाए ऐसा ही लोकतंत्र हमारे हिस्‍से आया है. चाहे किसी के अपने ब्‍लॉग पर हो, या फिर चिट्ठा चर्चा में, आदमी दुरुस्‍त लेखन नहीं करेगा तो उसे पढ़नेवाले भी एक सीमा तक ही भाव देंगे. इससे ज्‍यादा उस पर ऊर्जा खरचना, मेरी समझ से, उक्‍त लेखन का नहीं आपकी ऊर्जा का अपव्‍यय है. मन इतना कड़वा न करें. बच्‍चे हैं, बच्‍चों को ठुमका लगाने दें. आपके जोर-जोर से बरजने से यहां किसी के मूल विचार बदलने नहीं वाले. जिसको तकलीफ पहुंची है हम उसकी ज्‍यादा चिंता करें.</p>
<p>( प्रिय प्रमोद भाई,<br />
                    लगता है मैंने अनचाहे आपको विषम स्थिति में डाल दिया . आप किसी के पक्ष या खिलाफ़ में नहीं हो सकते .  मैं आपको अपने खिलाफ़ कभी नहीं समझूंगा . आप तो वही कहते रहे हैं जो आपको ठीक लगता है और वही कहना भी चाहिए . क्या कहूं! संवेदना बची है तो सब बचा है . आपकी बात समझ रहा हूं . हम ऐसे ही समय में रहने को अभिशप्त हैं . जितना अंतर कर और रख सकते हैं उतना रखते-करते हुए . ऊर्जा के अपव्यय के संबंध में आपके विचार ध्यान रखने योग्य हैं . बच्चे ठुमका लगाएं कोई दिक्कत नहीं है . हम भी प्रमुदित होंगे . बस किसी बुज़ुर्ग की खोपड़ी पर ठोल न लगाएं .</p>
<p>बाकी तो फिर &#8216;मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना&#8217; .</p>
<p>सादर आपका</p>
<p>चौपटस्वामी )</p>
]]></content:encoded>
	</item>
</channel>
</rss>
