कोलकाता का हिंदी रंगमंच-2

By chaupatswami

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में व्यावसायिक व शौकिया रंगमंच समानांतर  चलते रहे ।  देश इस समय नवजागरण की लहर पर सवार  था । हिन्दी जाति के सांस्कृतिक अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट व पं. माधव शुक्ल जैसे अनेक बुद्धिजीवी और सुसंस्कृत देशवासी पारसी कंपनियों की लोकरुचि को दूषित करने वाली प्रस्तुतियों से क्षुब्ध थे । धीरोदात्त नायक दुष्यंत को खेमटेवालियों की तरह कमर मटका कर नाचते और ‘पतरी कमर बल खाय’  गाते हुए देखना इनके लिए   असह्य था । ये वे लोग थे जो भाषा और देश दोनों के लिए चिंतित थे । वे अपनी भाषा में सुसंस्कृत और साहित्यिक अभिरुचि वाले नाटक खेलना चाहते थे और जनता को स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करना चाहते थे ।

 1916 में प्रकाशित महाभारत (पूर्वार्ध) नाटक की भूमिका में शुक्ल जी ने स्पष्ट लिखा है कि “आजकल पारसी नाटकों का प्रधान्य है । उसके साज-सामान हाव-भाव बिल्कुल कृत्रिम होते हैं । क्योंकि उनके सारे कार्य अर्थोपार्जन के उद्देश्य पर ही संबद्ध हैं……।’ परंतु शुक्ल जी यह भी अनुभव कर रहे थे कि “संपूर्ण परिवर्तन के साथ-साथ नाट्यकला में भी आशातीत परिवर्तन हो रहा है । दर्शकों की इच्छा भाव और दृष्टि में बहुत अंतर आ गया है । अब लोग उदारतापूर्वक नाट्यशाला में जाते हैं और बड़े ही उत्सुकता से नाटक देखते हैं । शिक्षित समाज अब बहुत कम पारसी कंपनियों की ओर झुकता है ।” राष्ट्रीय जागरण में नाटक की भूमिका के प्रति वे विशेष सजग थे । महाभारत (पूर्वार्ध) नाटक में कुंती के मुंह से मानो भारत माता स्वयं आह्वान कर रही है :

    ”स्वाभिमान नहिं तजो आत्म चिंता नहिं छोड़ो ।
     स्वाधिकार हित लड़ो सत्य से मुख नहिं मोड़ो ।।”

1911 में माधव शुक्ल कोलकाता पधारे । ‘हिन्दी नाट्य समिति’ तब भारतेंदु के नाटक ‘नीलदेवी’ के मंचन की प्रक्रिया में थी । शुक्ल जी के मार्गदर्शन से 1912 में भारत संगीत समाज के मंच पर ‘नीलदेवी’ का सफल मंचन हुआ । पर इसी दौरान कुछ मतभेद उभरे और भोलानाथ बर्मन व शुक्ल जी हिन्दी नाट्य समिति से अलग हो गए । हिन्दी नाट्य समिति ने ‘नीलदेवी’ के अतिरिक्त पं. राधेश्याम कथावाचक लिखित ‘वीर अभिमन्यु’ का सफल मंचन किया । पहले प्रदर्शन में ही इतनी धनराशि प्राप्त हुई कि प्रस्तुति का खर्च निकालकर चार हजार रुपये उड़ीसा के बाढ़पीड़ितों की सहायतार्थ दिए गए . 1920 में जमुनादास मेहरा ने ‘पाप परिणाम’ नामक नाटक के कई सफल मंचन किए । मेहरा जी द्वारा निर्देशित ‘भक्त प्रहलाद’ के भी लगभग दस मंचन हुए । इसके अतिरिक्त ‘हिन्दी नाट्य समिति’ के बैनर तले सत्यविजय, पांडव विजय, भारत रमणी, सती पद्मिनी, सम्राट परीक्षित और स्कूल की लड़की आदि नाटकों के सफल प्रदर्शन किए गए । 1939 के बाद यह संस्था कुछ विशेष या सार्थक नहीं कर सकी ।

 पं. माधव शुक्ल द्वारा ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की स्थापना के साथ हिन्दी रंगमंच का संबंध देशानुरागी भावनाओं से और प्रगाढ़ हो गया था । शुक्ल जी नाटकों के द्वारा जागृति लाकर   राष्ट्रीय आंदोलन को बल देना चाहते थे । परंतु अंग्रेज सरकार 1876 में ‘ड्रामैटिक पफ़ॉर्मेंस बिल’ पास कर चुकी थी और दीनबंधु मित्र का नाटक ‘नीलदर्पण’ जब्त कर लिया गया था। खाडिलकर का ‘कीचक वध’ और वृंदावन लाल वर्मा का ‘सेनापति ऊदल’ भी प्रतिबंधित कर दिया गया था । ऐसे समय में जब परिषद ने राधाकृष्ण दास का नाटक ‘महाराणा प्रताप’ खेलना चाहा तो अनुमति नहीं दी गई । अत: यह नाटक ‘भामाशाह की राजभक्ति’ नाम से खेला गया. इसी तरह अंग्रेज सरकार की आंख में धूल झोंककर ‘महाभारत’ नाटक ‘कौरव कलंक’ नाम से व ‘मेवाड़ पतन’ नामक नाटक  ‘विश्व  प्रेम’ नाम से खेला गया । इनके अतिरिक्त डी.एल.राय के ‘चंद्रगुप्त’ आदि नाटक सफलतापूर्वक खेले गए ।

 लगभग दो दशकों तक ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की कमान पं. माधव शुक्ल के हाथों में रही और रंगमंच पर राष्ट्रप्रेम की धारा अप्रतिहत बहती रही । आलम यह था कि शुक्ल जी के प्रयत्नों से महाकवि निराला जैसे साहित्यकार भी नाट्य लेखन और अभिनय की ओर प्रवृत्त हुए । पं. माधव शुक्ल के पश्चात परिषद का नेतृत्व पं. देवव्रत मिश्र व ललित कुमार सिंह ‘नटवर’ ने किया और नूरजहां, शाहजहां, उस पार, महात्मा ईसा, छत्रसाल व पुनर्मिलन (महानिशा) मंचित किए । ‘महानिशा’ नाटक का मंचन इस दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण था कि इसमें पहली बार स्त्री पात्रों की भूमिकाएं महिला कलाकारों द्वारा ही अभिनीत की गई थीं । इससे पहले पुरूष कलाकार ही स्त्री पात्रों की भूमिका में आते थे ।

1931 में कोलकाता से ही नरोत्तम व्यास के संपादन में ललित कला संबंधी सचित्र साप्ताहिक ‘रंगमंच’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ । इसका उददेश्य निम्नलिखित काव्य पंक्तियों के रूप में लिखा रहता था :


    ” हिन्दी माता के पुत्रों में कला-विवेक भाव भर दे
    जग में ये भी शीश उठाएं, इतना इनको अवसर दे ।।
    क्रम-क्रम से वे सब उठ जाएं, पड़े हुए हैं जो परदे ।
    कागज का यह ‘रंगमंच’, पैदा वह रंगमंच कर दे ।।”  

पं. माधव शुक्ल के महाभारत (पूर्वार्ध) में भी तो अर्जुन कुछ ऐसा ही उद्घोष करता है :             

          “आत्मदशा का ज्ञान नहीं जिस नर के भीतर ।
            उसकी भी क्या है मनुष्य में संज्ञा क्षिति पर ।।
  

हिन्दी नाट्य  परिषद के ही कुछ सदस्यों ने बाद में अलग होकर ‘बजरंग परिषद और ‘श्री कृष्ण परिषद’ जैसी नाट्य संस्थाएं गठित कीं । ‘बजरंग परिषद’ ने 1939 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बीसवें अधिवेशन में ‘श्रवण कुमार’ नाटक का मंचन किया जो सफल नहीं रहा। किंतु अगले दिन ‘भक्त प्रहलाद’ नाटक सफलतापूर्वक खेला गया । बजरंग परिषद द्वारा ‘सिंहनाद’, ‘भयंकर भूत’ और ‘जखमी पंजाब’ नाटक का भी मंचन किया गया । श्रीकृष्ण परिषद तो ‘कृष्ण-सुदामा’ नामक एक ही नाटक खेल सकी । बड़ाबाजार के ‘अपर इंडिया एसोसिएशन’ नामक क्लब ने ‘दुर्गादास’, ‘राजा हरिशचंद्र’ व ‘मधुर मिलन’ आदि नाटकों का मंचन किया । 1943 में स्थापित ‘बिड़ला क्लब’ ने 1945 से 1963 के बीच मिनर्वा, कालिका, कोरिंथियन, स्टार तथा विश्वरूपा आदि थियेटरों में डी.एल.राय के ‘मेवाड़ पतन’  ‘चंद्रगुप्त’ और ‘उस पार’ नाटकों का और उग्र के ‘महात्मा ईसा’ नाटक का मंचन किया । 1964 में ‘रुपया बोलता है’ का प्रदर्शन किया गया । 

                                                                          क्रमशः …

                                                                                                                                                                         

One Response to “कोलकाता का हिंदी रंगमंच-2”

  1. अफ़लातून Says:

    वाह, चौपटस्वामी जी, रस ले कर पढ़ रहे हैं । कोलकाता में तो इसे छापने वाले भी होंगे ।

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