कोलकाता का हिंदी रंगमंच-1

   कोलकाता में  हिन्दीभाषी समुदाय बहुत लंबे समय से और बहुत बड़ी तादाद में निवास करता आया है । यहां हिन्दी नाट्य प्रस्तु्तियों का इतिहास लगभग एक शताब्दी पुराना है । इसके शुरूआती दौर में तो पारसी शैली के व्यावसायिक नाटक ही छाए रहे ।   1906 में पहली बार मुंशी भृगुनाथ वर्मा के नेतृत्व में फूलकटरा में हिन्दी नाट्य समिति  की स्थापना हुई । यह हिंदी में पहला गैरव्यावसायिक रंग प्रयास था । बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में पं. माधव शुक्ल के कोलकाता आगमन और भोलानाथ बर्मन के साथ ‘हिन्दी नाट्य  परिषद’ की स्थापना से कोलकाता के हिन्दी रंगमंच को अपेक्षित गति व प्रतिष्ठा मिली जिसका सतत विकास आज के समर्थ नाट्य आंदोलन में देखा जा सकता है ।  

 उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में पारसी थियेटर कंपनियों ने कोलकाता में पारसी शैली के नाटक प्रदर्शित करने शुरू कर दिए थे । मूनलाइट, मिनर्वा, कोरिंथियन आदि थियेटरों में व्यावसायिक दृष्टि से सफल नाटक खेले जाने लगे थे । मनोरंजन करना और पैसा कमाना इनका एकमात्र उद्देश्य था । वृहत्तर सामाजिक संदर्भों से इनका कोई गहरा सरोकार नहीं था परंतु भारी संख्या में आम जनता को रंगमंच की ओर आकर्षित कर लेना इनकी बड़ी सफलता थी । सरल उर्दू या हिन्दुस्तानी में खेले जाने वाले इन नाटकों की भाषानीति नारायण प्रसाद ‘बेताब’ के ‘महाभारत’ नाटक के इस उद्धरण द्वारा समझी जा सकती है :   

  ” न खालिस उर्दू न ठेठ हिन्दी   

   जबान गोया मिली-जुली हो ।     

  अलग रहे दूध से न मिसरी,     

  डली-डली दूध में घुली हो ।।”  

 किन्तु पारसी नाटकों की प्रवृत्ति बाजारू और रुचि हल्की थी । अभिनय कला में भी एक तरह का उथलापन था । अतिनाटकीयता के साथ आकस्मिकता और चमत्कार का संयोग उसे और भी भोंडा बनाता था । किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह हमारी रंगयात्रा का प्रारंभिक चरण था और व्यावसायिकता के दबाव के बावजूद पारसी शैली के कई नाटक तत्कालीन राष्ट्रीय भावनाओं और आकांक्षाओं को निरूपित करने का खतरा मोल ले रहे थे । हिन्दी रंगमंच की विकास यात्रा में पारसी नाटकों का महत्वपूर्ण स्थान है । बहुत लंबे समय तक हिन्दी का गैरव्यावसायिक रंगमंच भी इनकी शैली से खासा प्रभावित रहा । 1930 तक पारसी शैली का थियेटर जिंदा रहा। सिनेमा के प्रचलन के बाद स्थाई रूप से इनका पर्दा गिर गया ।

                                                                   क्रमशः ….. 

                                                                                                                                                                                                                                                                                                               क्रमशः …….. 

4 Responses to “कोलकाता का हिंदी रंगमंच-1”

  1. kakesh Says:

    ये जानना काफी सुखद रहेगा . लिखें थोड़ा विस्तार से . मैं भी कभी इसी रंगमंच का हिस्सा था . प्रतीक्षा है कि आप लिखें श्यामा नंद जालान , संगीत कला मंदिर , उषा गांगुली , शंभू मित्र , शिव मूरत सिंह और भी कई नामवरों पर.

  2. अफ़लातून Says:

    एक सुन्दर ऐतिहासिक दस्तावेज की शकल ले रहे इस लेख के लिए साधुवाद ।

  3. अनूप शुक्ला Says:

    अच्छी शुरुआत है। आगे की कड़ी का इंतजार है!

  4. शम्भु चौधरी Says:

    कोलकात्ता के हिन्दी रंगमंच लेख आपके वेवपेज पर पढ़ने को मिला। बहुत ही अच्छा लेख है।
    कृपया लेखक का नाम और पता हमें भेजें, ताकि इस लेख को ‘समाज विकास’ पत्रिका में प्रकाशित किया जा सके।
    शम्भु चौधरी, सहयोगी सम्पादक

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