आतंक और आज़ादी

 आतंकवाद घृणा की संस्कृति का चरम बिन्दु है । आतंकवादी समूहों की कार्रवाइयां वस्तुनिष्ठ वास्तविकता की बजाय आत्मगत व्याख्या पर आधारित होती हैं । चूंकि एक आतंकवादी और मुक्तियोद्धा के बीच की विभाजक रेखा बहुत क्षीण है, अत: अधिकांश आतंकवादी अपने को योद्धा, मुक्तिदाता और शहीद की श्रेणी में रखते हैं । धार्मिक कट्टरवादी अपने को व्यक्ति न मानकर धर्म का प्रतीक मान बैठते हैं ।
 
 आतंकवाद का एक प्रकार राज्य प्रायोजित आतंकवाद भी है जहां राज्य की निरंकुश और दमनकारी भूमिका    का नृशंस    रूप    हमारे सामने     आता है । राजसत्ता के इस्तेमाल से विरोध के किसी भी स्वर को हिंसक तरीके से कुचल देना इसका अंतिम लक्ष्य होता है ।  ११ सितंबर की घटना के बाद अमेरिकी सरकार द्वारा अफगानिस्तान और ईराक में की गई कार्रवाई राज्य प्रायोजित आतंकवाद का ही नमूना है ।
 आतंकवाद का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह होता है कि आतंकवादी गतिविधियों से निपटने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के नाम पर राज्य नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता को सीमित अथवा स्थगित कर देता है । लोकतंत्र सिमटता जाता है और नागरिक अधिकारों के हनन की प्रक्रिया तेज हो जाती है । ग्यारह सितंबर की घटना के लगभग एक माह पश्चात अमेरिका द्वारा पारित ‘यूएसए पैट्रियट एक्ट’  राज्य की निगरानी शक्तियों के अभूतपूर्व विस्तार और नागरिक स्वतंत्रता के अनावश्यक और अनपेक्षित संक्षिप्तीकरण का ही एक उदाहरण है । इसमें जैवनिगरानी, चेहरे की पहचान करने वाले सॉफ्टवेयर तथा भाषा संसाधन प्रौद्योगिकी आदि नई पद्धतियों को शामिल किया गया है । ‘रेसियल प्रोफाइलिंग’ के जरिये न केवल विभेद को जन्म दिया रहा है बल्कि इस कदम ने सभी आप्रवासियों और अल्पसंख्यकों को बेवजह संदेह के घेरे में ला दिया है । निरपराध आप्रवासियों पर हमले की वारदातें इसी ‘नृजातीय प्रोफाइलिंग’ का ही नतीजा हैं ।

 मनुष्य की मुक्ति की संकल्पना में मस्तिष्क और शरीर दोनों की आजादी शामिल है । मुक्ति का अर्थ है शारीरिक और मानसिक बंधनों/प्रतिबंधों से आजादी । अभिव्यक्ति की आजादी, अवसर की आजादी,आराधना की आजादी और भय से आजादी; मुक्ति के इसी मूल मंत्र का प्रकटीकरण हैं । आज आदमी के आत्म सम्मान और सहज मानवीय गरिमा की रक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा और नहीं है । किंतु आतंकवादी तथा ‘आतंक के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय गठजोड़’ के नेता दोनों ही आम नागरिक के जनतांत्रिक अधिकारों को रौंद रहे हैं । एक ओर वे अधिक सभ्य, उदारचेता और आधुनिक होने का ढोंग रच रहे हैं, दूसरी ओर उनकी हिंसक और बर्बर प्रवृत्तियों का विस्फोट कुछ और ही सच्चाई बयान कर रहा है । ऐसे में लोकतंत्र का भविष्य मनुष्य के जनतांत्रिक अधिकारों की रक्षा पर ही निर्भर है । किंतु हमें याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र मुक्ति का पर्याय नहीं, मुक्ति की ओर प्रस्थान बिंदु है। इसके लिए राज्य को एक न्यायपूर्ण व्यवस्था की शर्त पर खरा उतरना होगा तथा नागरिकों को अपने व्यक्तिगत सद्गुणों, नैतिक अनुशासन और सतत जागरूकता के जरिये किसी भी कीमत पर अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी ।

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2 Responses to “आतंक और आज़ादी”

  1. अफ़लातून Says:

    बहुत खूब। नाम का पूर्वार्ध हटाइये , उसका विलोम सोचिए।

  2. अतुल शर्मा Says:

    आप बहुत ही अच्छा लिखते हैं। राज्य प्रायोजित आतंकवाद के बारे में इतना पहली बार पढ़ा।

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