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	<title>Comments on: विवाद की अविनाशप्रियता</title>
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		<title>By: मोहल्ला &#171;</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/04/20/vivadpriyata-1/#comment-140</link>
		<dc:creator>मोहल्ला &#171;</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 05 Jul 2007 14:28:11 +0000</pubDate>
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		<description>[...] जा रही हैं! अनुरोध है कि कृपया इसे आपकी महीन चापलूसी की संज्ञा न [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] जा रही हैं! अनुरोध है कि कृपया इसे आपकी महीन चापलूसी की संज्ञा न [...]</p>
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		<title>By: उन्मुक्त</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/04/20/vivadpriyata-1/#comment-32</link>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Apr 2007 12:43:37 +0000</pubDate>
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		<description>फुरसतिया जी तो झुझारू व्यक्ति हैं। इतनी जलदी तो वे नहीं हारने वाले।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>फुरसतिया जी तो झुझारू व्यक्ति हैं। इतनी जलदी तो वे नहीं हारने वाले।</p>
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		<title>By: panakj बेंगाणी</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/04/20/vivadpriyata-1/#comment-31</link>
		<dc:creator>panakj बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Apr 2007 05:15:34 +0000</pubDate>
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		<description>badiya lekh. dhanyavad.</description>
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		<title>By: RC Mishra</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/04/20/vivadpriyata-1/#comment-30</link>
		<dc:creator>RC Mishra</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Apr 2007 19:22:25 +0000</pubDate>
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		<description>आपका लेख कुछ कठोर उपाय करने को प्रेरित करता है ।

धन्यवाद</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका लेख कुछ कठोर उपाय करने को प्रेरित करता है ।</p>
<p>धन्यवाद</p>
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		<title>By: Rajesh Roshan</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/04/20/vivadpriyata-1/#comment-29</link>
		<dc:creator>Rajesh Roshan</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Apr 2007 17:33:45 +0000</pubDate>
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		<description>Sabse pahle to aapne aapka lekh achha laga. Shuru ke 7-8 para to sach bahut achha hai. Bhai sab kuch hone ke bawjood main ab tak nahi samjh pa raha hu ki log ek ke peeche itna kyon pade hue hain.

Aap mujhe ye jaroor kah sakte hain ki main abhi yaha naya hu lekin ek baat samjhata hu ki aap ek to kisi ka dusprachar kar rahe hain, jo achhi baat nahi hai.(kam se kam mujhe to nahi pasand) iske saath ek baat aur aap jab bhi kisi ka dusprachar karte hain to use thoda aur prachar mil jata hai.

Aapko uske chhite mein post na karna ho na kare lekin ye kya ki kisi ek ne likha dusre ne likha to sabhi likhne lage.

Ha ye bhi jaroor hai ki apna chittha hai apni marji hai to kyon na likhe lekin thoda rukh to narm ho sakta hai. Kyon ?

Ha ek baat aur ab tak logo ne isme ek bhi post kyon nahi kiya hai main samjh nahi paya? koi khas wajh?

Jo bhi aapne likha accha hai :) likhte rahe</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Sabse pahle to aapne aapka lekh achha laga. Shuru ke 7-8 para to sach bahut achha hai. Bhai sab kuch hone ke bawjood main ab tak nahi samjh pa raha hu ki log ek ke peeche itna kyon pade hue hain.</p>
<p>Aap mujhe ye jaroor kah sakte hain ki main abhi yaha naya hu lekin ek baat samjhata hu ki aap ek to kisi ka dusprachar kar rahe hain, jo achhi baat nahi hai.(kam se kam mujhe to nahi pasand) iske saath ek baat aur aap jab bhi kisi ka dusprachar karte hain to use thoda aur prachar mil jata hai.</p>
<p>Aapko uske chhite mein post na karna ho na kare lekin ye kya ki kisi ek ne likha dusre ne likha to sabhi likhne lage.</p>
<p>Ha ye bhi jaroor hai ki apna chittha hai apni marji hai to kyon na likhe lekin thoda rukh to narm ho sakta hai. Kyon ?</p>
<p>Ha ek baat aur ab tak logo ne isme ek bhi post kyon nahi kiya hai main samjh nahi paya? koi khas wajh?</p>
<p>Jo bhi aapne likha accha hai <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  likhte rahe</p>
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	<item>
		<title>By: अनूप शुक्ला</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/04/20/vivadpriyata-1/#comment-27</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Apr 2007 13:14:22 +0000</pubDate>
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		<description>यह देखना बड़ा सुखद है कि आपने इसी बहाने हिंदी के लगभग सभी प्रमुख ब्लागर साथियों को याद कर लिया और अधिक खुशी की बात यह भी है कि जिस रूप में उनके बारे में लिखा वह सच्चाई के बहुत नजदीक है। इससे अहसास होता है कि आप को हिंदी ब्लागर्स के बारे में अच्छी जानकारी है।

वैसे तो इस बारे में तो पूरी पोस्ट लिखने की बनती है लेकिन वह फिर कभी।

सबसे पहली बात तो यह कि मैं इस विषय पर न निराश हूं, न हताश और न ही उदासीन।

अंतर्जाल एक मुक्त व्यवस्था है। यहां हर कोई अपनी मर्जी का लिखने के लिये स्वतंत्र है। यही इसकी सामर्थ्य है यही सीमा भी।

अविनाश के बारे में आपने खुद ही लिखा &lt;b&gt; जो सबसे कम रचनात्मक होता है वह सबसे ज्यादा विवादप्रिय होता है &lt;/b&gt; अविनाश का ब्लाग मूलत: ब्लाग नहीं है। वे इसे एक नोटिस बोर्ड की तरह प्रयोग कर रहे हैं। ब्लाग लेखन में व्यक्ति अपने विचार लिखता है जबकि अविनाश अपने किसी उद्देश्य के तहत उन लेखों को पोस्ट करते हैं जो उनको अपने मन, विचार के नजदीक लगते हैं।  

चूंकि अविनाश दूसरों का लिखा पोस्ट करते हैं इसलिये उनके पास उन बातों के कोई जवाब नहीं
होते जो लोग उनके ब्लाग पर पोस्ट लेखों के बारे में पूछते हैं। अब सब लेखक रवीश कुमार जैसे तो होते नहीं कि अपने लेखन की जिम्मेदारी लें और अपने कहे, लिखे पर कुछ संसोधन करना हो तो उसे करें। 

अविनाश राजेन्द्र यादव या ओम थानवी जैसे जाने-माने लेखकों के लेख क्यों छापते हैं यह वे ही बेहतर बता सकते हैं लेकिन राजेन्द्र यादवजी के बारे में दुनिया जानती है कि वे कितने विवाद प्रिय हैं। बहुत कुछ लिखा-कहा समझा जा चुका है उनके बारे में। 

आपने मुझसे यह जानना चाहा कि हम इस बारे में क्या सोचते हैं। इसके पहले हमें &#039;निगोशियेटर&#039; बताया। जहां तक झगड़ा निपटाने की बात है तो यह काम कोई भी तब बेहतर अंजाम दे सकता है जब उसकी बात दोनों पक्ष मानें। यहां तो अविनाश ने हमें खुद एक पार्टी बना दिया। हम यथास्थित वादी हैं , हमारी सोच ऐसी है वैसी है। हम किस मुंह से अविनाश या दूसरों से कुछ कहें।

दूसरा तरीका यह हो सकता है कि जो कोलाज टाइप के लेख मोहल्ले में छपें हम उनको अविनाश की सोच मानते हुये , व्यापक पड़ताल करते हुये साबित करने के अंतहीन प्रयास में जुट आयें कि उनकी सोच ठीक नहीं है। हम बतायें कि उनके नौजवान साथी के सौंदर्य के आयाम कोलतार सी सड़क है उस पर बिखरा गोबर है आदि-इत्यादि। लेकिन मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं है। ऐसा शायद इसलिये भी कि मैं उनको अभी भी अपना ब्लागर दोस्त ही मानता हूं। और जिसको मैं अपना साथी मानता हूं उसको चेताने, टोकने से अधिक और उसके खिलाफ़ कुछ लिखने-पढ़ने में मेरी कोई रुचि नहीं है। न मंशा।

हमारे ब्लागर साथियों को भी यह समझना चाहिये कि अविनाश सारे पत्रकार जगत के प्रतिनिधि नहीं हैं। रवीश कुमार के दैनिन्दिन अनुभव और प्रमोद सिंहजी के लेख ,भले ही वे थोड़े ऊंचे दर्जे के हैं, वे भी उसी पत्रकार जगत से जुड़े हुये लोगों के लेख हैं जो कि ब्लागजगत
की एक उपलब्धि हैं।

मुझे अविनाश से जो कहना था वह मैं उनके ब्लाग पर टिप्पणी करके पहले ही कह चुका। ब्लागिंग एक ऐसा  माध्यम है जिसमें आपको अपने लेखन पर प्रतिक्रिया अगर मिलती रहती है तो आपको अच्छा लगता है। आपके ब्लाग पर लाख लोग आयें और कोई प्रतिक्रिया न करें तो आपको अच्छा नहीं लगेगा। और प्रतिक्रिया पाने के लिये आपको लोगों से जुड़ना पड़ेगा। यह एक रिश्तेदारी सा मामला है भाई जिसके यहां तुम जाओगे वो तुम्हारे यहां आयेगा।

मुझे मोहल्ले से कोई खतरा नहीं है, न ही हिंदी ब्लाग जगत को। ऐसा इसलिये कि फिलहाल मोहल्ले में अविनाश अपना कुछ नहीं लिखते। मेरा ऐसा मानना है कि मोहल्ले के बारे में या तो लोग बात करना बंद कर देंगे या मोहल्ले के साथी अपने-अपने ब्लाग खोल लेंगे या अविनाश रवीश कुमार की तरह अपना लेखन करने लगें।

जितनी तीखी भाषा अविनाश अपने परिचयात्मक लेखों में लिखते हैं वे उन औघड़ी भाषा के नमूनों के आगे पासंग भी नहीं हैं जो हमारे तमाम साथी लिखकर छोड़ चुके हैं । वे आजकल नये कामों में जुटे हैं कुछ ही दिन में जब वे काम सामने आयेंगे तब देखियेगा कि मोहल्ले की 
सारहीन बहसों और उन उपलब्धियों में क्या अंतर है।

बहुत कुछ बेतरतीब तरीके से लिख गया। अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि मैं अविनाश के मोहल्ले से न परेशान हूं, न उनके रवैये से हैरान। हताश तो कतई नहीं हूं। मैं शांतिकामी हूं क्यॊकि मुझे नहीं लगता कि इस वर्जुअल दुनिया में कुश्ती करने से कुछ हासिल होता है। यहां अपने पोस्ट से किसी दूसरे की पोस्ट को पटक देने से कोई दंगल नहीं जीत जाता। ब्लागर साथी अपना खुद का दिमाग रखते हैं । वे कोई आवारा भीड़ नहीं हैं कि किसी मोहल्ले पर छपी किसी पोस्ट से बहककर कपड़े फ़ाड़ने लगेंगे।

मोहल्ले पर किसी भी तरह के प्रतिबंध के मैं खिलाफ़ हूं। क्योंकि इस तरह का लेखन का इलाज कोई प्रतिबंध नहीं कर सकता। आज ये लिखेंगे कल कोई दूसरा लिखेगा। नारद की भूमिका भी हिंदी के बढ़ते ब्लाग संख्या बदलती जायेगी। आज भी अगर किसी को लिखने की आजादी है तो आपको उसका लिखा पढ़ने या न पढ़ने की आजादी है। आपको अगर किसी चीज को पढ़ना बुरा लगता है तो पढ़्कर मुंह बनाने की बजाय उसे पढ़ने से बचें।

किसी खराब लेखन का जवाब यह है कि आप उससे अच्छा लिखें। लोगों को अच्छा लिखा हुआ पढ़ायें! 

वैसे यह बात हैरान जरूर करती है कि अविनाश जैसे नयी उमर के व्यक्ति में महिला, दलित, मुसलमान के हित की इतनी चिंता सवार है कि बेचारे को कुछ भी खुशनुमा नहीं दिखता। 

बहरहाल, अविनाश के बहाने ,मैं जो सोचता था वह मैंने लिखा। आपके पढ़ने का आभार!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह देखना बड़ा सुखद है कि आपने इसी बहाने हिंदी के लगभग सभी प्रमुख ब्लागर साथियों को याद कर लिया और अधिक खुशी की बात यह भी है कि जिस रूप में उनके बारे में लिखा वह सच्चाई के बहुत नजदीक है। इससे अहसास होता है कि आप को हिंदी ब्लागर्स के बारे में अच्छी जानकारी है।</p>
<p>वैसे तो इस बारे में तो पूरी पोस्ट लिखने की बनती है लेकिन वह फिर कभी।</p>
<p>सबसे पहली बात तो यह कि मैं इस विषय पर न निराश हूं, न हताश और न ही उदासीन।</p>
<p>अंतर्जाल एक मुक्त व्यवस्था है। यहां हर कोई अपनी मर्जी का लिखने के लिये स्वतंत्र है। यही इसकी सामर्थ्य है यही सीमा भी।</p>
<p>अविनाश के बारे में आपने खुद ही लिखा <b> जो सबसे कम रचनात्मक होता है वह सबसे ज्यादा विवादप्रिय होता है </b> अविनाश का ब्लाग मूलत: ब्लाग नहीं है। वे इसे एक नोटिस बोर्ड की तरह प्रयोग कर रहे हैं। ब्लाग लेखन में व्यक्ति अपने विचार लिखता है जबकि अविनाश अपने किसी उद्देश्य के तहत उन लेखों को पोस्ट करते हैं जो उनको अपने मन, विचार के नजदीक लगते हैं।  </p>
<p>चूंकि अविनाश दूसरों का लिखा पोस्ट करते हैं इसलिये उनके पास उन बातों के कोई जवाब नहीं<br />
होते जो लोग उनके ब्लाग पर पोस्ट लेखों के बारे में पूछते हैं। अब सब लेखक रवीश कुमार जैसे तो होते नहीं कि अपने लेखन की जिम्मेदारी लें और अपने कहे, लिखे पर कुछ संसोधन करना हो तो उसे करें। </p>
<p>अविनाश राजेन्द्र यादव या ओम थानवी जैसे जाने-माने लेखकों के लेख क्यों छापते हैं यह वे ही बेहतर बता सकते हैं लेकिन राजेन्द्र यादवजी के बारे में दुनिया जानती है कि वे कितने विवाद प्रिय हैं। बहुत कुछ लिखा-कहा समझा जा चुका है उनके बारे में। </p>
<p>आपने मुझसे यह जानना चाहा कि हम इस बारे में क्या सोचते हैं। इसके पहले हमें &#8216;निगोशियेटर&#8217; बताया। जहां तक झगड़ा निपटाने की बात है तो यह काम कोई भी तब बेहतर अंजाम दे सकता है जब उसकी बात दोनों पक्ष मानें। यहां तो अविनाश ने हमें खुद एक पार्टी बना दिया। हम यथास्थित वादी हैं , हमारी सोच ऐसी है वैसी है। हम किस मुंह से अविनाश या दूसरों से कुछ कहें।</p>
<p>दूसरा तरीका यह हो सकता है कि जो कोलाज टाइप के लेख मोहल्ले में छपें हम उनको अविनाश की सोच मानते हुये , व्यापक पड़ताल करते हुये साबित करने के अंतहीन प्रयास में जुट आयें कि उनकी सोच ठीक नहीं है। हम बतायें कि उनके नौजवान साथी के सौंदर्य के आयाम कोलतार सी सड़क है उस पर बिखरा गोबर है आदि-इत्यादि। लेकिन मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं है। ऐसा शायद इसलिये भी कि मैं उनको अभी भी अपना ब्लागर दोस्त ही मानता हूं। और जिसको मैं अपना साथी मानता हूं उसको चेताने, टोकने से अधिक और उसके खिलाफ़ कुछ लिखने-पढ़ने में मेरी कोई रुचि नहीं है। न मंशा।</p>
<p>हमारे ब्लागर साथियों को भी यह समझना चाहिये कि अविनाश सारे पत्रकार जगत के प्रतिनिधि नहीं हैं। रवीश कुमार के दैनिन्दिन अनुभव और प्रमोद सिंहजी के लेख ,भले ही वे थोड़े ऊंचे दर्जे के हैं, वे भी उसी पत्रकार जगत से जुड़े हुये लोगों के लेख हैं जो कि ब्लागजगत<br />
की एक उपलब्धि हैं।</p>
<p>मुझे अविनाश से जो कहना था वह मैं उनके ब्लाग पर टिप्पणी करके पहले ही कह चुका। ब्लागिंग एक ऐसा  माध्यम है जिसमें आपको अपने लेखन पर प्रतिक्रिया अगर मिलती रहती है तो आपको अच्छा लगता है। आपके ब्लाग पर लाख लोग आयें और कोई प्रतिक्रिया न करें तो आपको अच्छा नहीं लगेगा। और प्रतिक्रिया पाने के लिये आपको लोगों से जुड़ना पड़ेगा। यह एक रिश्तेदारी सा मामला है भाई जिसके यहां तुम जाओगे वो तुम्हारे यहां आयेगा।</p>
<p>मुझे मोहल्ले से कोई खतरा नहीं है, न ही हिंदी ब्लाग जगत को। ऐसा इसलिये कि फिलहाल मोहल्ले में अविनाश अपना कुछ नहीं लिखते। मेरा ऐसा मानना है कि मोहल्ले के बारे में या तो लोग बात करना बंद कर देंगे या मोहल्ले के साथी अपने-अपने ब्लाग खोल लेंगे या अविनाश रवीश कुमार की तरह अपना लेखन करने लगें।</p>
<p>जितनी तीखी भाषा अविनाश अपने परिचयात्मक लेखों में लिखते हैं वे उन औघड़ी भाषा के नमूनों के आगे पासंग भी नहीं हैं जो हमारे तमाम साथी लिखकर छोड़ चुके हैं । वे आजकल नये कामों में जुटे हैं कुछ ही दिन में जब वे काम सामने आयेंगे तब देखियेगा कि मोहल्ले की<br />
सारहीन बहसों और उन उपलब्धियों में क्या अंतर है।</p>
<p>बहुत कुछ बेतरतीब तरीके से लिख गया। अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि मैं अविनाश के मोहल्ले से न परेशान हूं, न उनके रवैये से हैरान। हताश तो कतई नहीं हूं। मैं शांतिकामी हूं क्यॊकि मुझे नहीं लगता कि इस वर्जुअल दुनिया में कुश्ती करने से कुछ हासिल होता है। यहां अपने पोस्ट से किसी दूसरे की पोस्ट को पटक देने से कोई दंगल नहीं जीत जाता। ब्लागर साथी अपना खुद का दिमाग रखते हैं । वे कोई आवारा भीड़ नहीं हैं कि किसी मोहल्ले पर छपी किसी पोस्ट से बहककर कपड़े फ़ाड़ने लगेंगे।</p>
<p>मोहल्ले पर किसी भी तरह के प्रतिबंध के मैं खिलाफ़ हूं। क्योंकि इस तरह का लेखन का इलाज कोई प्रतिबंध नहीं कर सकता। आज ये लिखेंगे कल कोई दूसरा लिखेगा। नारद की भूमिका भी हिंदी के बढ़ते ब्लाग संख्या बदलती जायेगी। आज भी अगर किसी को लिखने की आजादी है तो आपको उसका लिखा पढ़ने या न पढ़ने की आजादी है। आपको अगर किसी चीज को पढ़ना बुरा लगता है तो पढ़्कर मुंह बनाने की बजाय उसे पढ़ने से बचें।</p>
<p>किसी खराब लेखन का जवाब यह है कि आप उससे अच्छा लिखें। लोगों को अच्छा लिखा हुआ पढ़ायें! </p>
<p>वैसे यह बात हैरान जरूर करती है कि अविनाश जैसे नयी उमर के व्यक्ति में महिला, दलित, मुसलमान के हित की इतनी चिंता सवार है कि बेचारे को कुछ भी खुशनुमा नहीं दिखता। </p>
<p>बहरहाल, अविनाश के बहाने ,मैं जो सोचता था वह मैंने लिखा। आपके पढ़ने का आभार!</p>
]]></content:encoded>
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		<title>By: Shrish</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/04/20/vivadpriyata-1/#comment-26</link>
		<dc:creator>Shrish</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Apr 2007 10:57:53 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;blockquote&gt;लिखना चाहिए था   अपने जैसे अनामों यानी धुरविरोधी, अनामदास, ककेश और ब्रह्मराक्षस पर जो अनाम रहते हुए भी कई नामवालों से बेहतर विमर्श कर रहे हैं&lt;/blockquote&gt;
बिल्कुल सत्य कहा।
 
&lt;blockquote&gt;
नारद वैसा ही है,जैसा हमारा भारत है. जिसमें मतभिन्नताएं हैं, मतभेद हैं. पर मनभेद न हो इसके प्रयास होते रहे हैं और सफलता से होते रहे हैं.&lt;/blockquote&gt;
वाह नारद को इससे सुंदर उपमा नहीं दी जा सकती। कमाल की कल्पना है आपकी। 

&lt;blockquote&gt;
धर्मनिरपेक्षता बहुत महान मूल्य है. बहुत ज़रूरी भी . पर धर्मनिरपेक्षता मूर्खता और फ़ूहड़पन को धो देने वाला साबुन नहीं है. धर्मनिरपेक्षता तर्कशून्यता और ज़ाहिली को ढंकने वाला मुखौटा नहीं है.&lt;/blockquote&gt;
अब इस बारे में क्या कहें। सब आपने इन दो पंक्तियों में कह ही दिया है।

बाकी रही बात उपरोक्त लोगों से निपटने की तो भाई &lt;a href=&quot;http://www.kaulonline.com/chittha/2007/04/mohalla-cancer/&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt;तय हुआ है&lt;/a&gt; कि इन &lt;a href=&quot;http://hindini.com/eswami/?p=132&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt;ट्रॉल्स&lt;/a&gt; को इग्नोर किया जाए। यही इनका सबसे बेहतर इलाज है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>लिखना चाहिए था   अपने जैसे अनामों यानी धुरविरोधी, अनामदास, ककेश और ब्रह्मराक्षस पर जो अनाम रहते हुए भी कई नामवालों से बेहतर विमर्श कर रहे हैं</p></blockquote>
<p>बिल्कुल सत्य कहा।</p>
<blockquote><p>
नारद वैसा ही है,जैसा हमारा भारत है. जिसमें मतभिन्नताएं हैं, मतभेद हैं. पर मनभेद न हो इसके प्रयास होते रहे हैं और सफलता से होते रहे हैं.</p></blockquote>
<p>वाह नारद को इससे सुंदर उपमा नहीं दी जा सकती। कमाल की कल्पना है आपकी। </p>
<blockquote><p>
धर्मनिरपेक्षता बहुत महान मूल्य है. बहुत ज़रूरी भी . पर धर्मनिरपेक्षता मूर्खता और फ़ूहड़पन को धो देने वाला साबुन नहीं है. धर्मनिरपेक्षता तर्कशून्यता और ज़ाहिली को ढंकने वाला मुखौटा नहीं है.</p></blockquote>
<p>अब इस बारे में क्या कहें। सब आपने इन दो पंक्तियों में कह ही दिया है।</p>
<p>बाकी रही बात उपरोक्त लोगों से निपटने की तो भाई <a href="http://www.kaulonline.com/chittha/2007/04/mohalla-cancer/" rel="nofollow">तय हुआ है</a> कि इन <a href="http://hindini.com/eswami/?p=132" rel="nofollow">ट्रॉल्स</a> को इग्नोर किया जाए। यही इनका सबसे बेहतर इलाज है।</p>
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		<title>By: अफ़लातून</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/04/20/vivadpriyata-1/#comment-25</link>
		<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Apr 2007 05:39:38 +0000</pubDate>
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		<description>चौपटस्वामीजी, 
चिट्ठाजगत साफ-सुथरा और किसी को भी चोट न पहुँचाने वाला बना रहे यह मुमकिन नहीं है।यहाँ अग्निशामक फुरसतिया हैं तो &#039;अप्रैल माह में पंजीकृत स्वनामधन्य विष्ठा&#039; भी हैं।आज ई-स्वामी ने एक अतिप्रासंगिक आलेख लिखा है।एक छोटा प्रतिगामी दौर है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चौपटस्वामीजी,<br />
चिट्ठाजगत साफ-सुथरा और किसी को भी चोट न पहुँचाने वाला बना रहे यह मुमकिन नहीं है।यहाँ अग्निशामक फुरसतिया हैं तो &#8216;अप्रैल माह में पंजीकृत स्वनामधन्य विष्ठा&#8217; भी हैं।आज ई-स्वामी ने एक अतिप्रासंगिक आलेख लिखा है।एक छोटा प्रतिगामी दौर है।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>By: नीरज दीवान</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/04/20/vivadpriyata-1/#comment-23</link>
		<dc:creator>नीरज दीवान</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 18:00:15 +0000</pubDate>
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		<description>चिंता न करें ये पैदावार नहीं है. ये खरपतवार है जो कीटनाशक डालकर साफ कर दी जाएगी. जब इनकी कमेंट ब्लाग पर आनी शुरु होगी तब हम गेटकीपर को बिठा रखेंगे जो पास देखकर ही अंदर आने देगा. अंग्रेज़ी चिट्ठाकारी में ये होता आ रहा है. भीड़ बढ़ती है तो ऐसे लोग घुस आते हैं. हिन्दी में आए हैं तो बेवजूद रहेंगे. 

&#039;&#039;&#039;मैं नारद के अपने अनन्य अग्निशामक और शांतिकामी फ़ुरसतिया को हताश और निराश और उदासीन नहीं देखना चाहता. हमें क्या करना चाहिए ?&#039;&#039;&#039;

आपके इस सवाल का जवाब फुरसतिया जी देंगे. मेरे विचार से आग ठंडी होनी शुरू हो गयी है. दस्ता काम पर लगा है. 

और हां चौपटास्वामी जी, तारीफ़ में किसी का नाम छूटा तो नहीं?  ठीक से देख लें ;) भई विनोद है. अन्यथा न लें. आपके लेखों को सदा पढ़ता हूं और सहमत भी हूं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चिंता न करें ये पैदावार नहीं है. ये खरपतवार है जो कीटनाशक डालकर साफ कर दी जाएगी. जब इनकी कमेंट ब्लाग पर आनी शुरु होगी तब हम गेटकीपर को बिठा रखेंगे जो पास देखकर ही अंदर आने देगा. अंग्रेज़ी चिट्ठाकारी में ये होता आ रहा है. भीड़ बढ़ती है तो ऐसे लोग घुस आते हैं. हिन्दी में आए हैं तो बेवजूद रहेंगे. </p>
<p>&#8221;&#8217;मैं नारद के अपने अनन्य अग्निशामक और शांतिकामी फ़ुरसतिया को हताश और निराश और उदासीन नहीं देखना चाहता. हमें क्या करना चाहिए ?&#8221;&#8217;</p>
<p>आपके इस सवाल का जवाब फुरसतिया जी देंगे. मेरे विचार से आग ठंडी होनी शुरू हो गयी है. दस्ता काम पर लगा है. </p>
<p>और हां चौपटास्वामी जी, तारीफ़ में किसी का नाम छूटा तो नहीं?  ठीक से देख लें <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' />  भई विनोद है. अन्यथा न लें. आपके लेखों को सदा पढ़ता हूं और सहमत भी हूं.</p>
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		<title>By: Tarun</title>
		<link>http://samakaal.wordpress.com/2007/04/20/vivadpriyata-1/#comment-22</link>
		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 16:59:57 +0000</pubDate>
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		<description>haal ke vivado (ya vivadi ;) ) ko bilkul alag nazeriye se dekhne ki koshish kari hai aapne.

pehle ignore karke dekh sakte hain</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>haal ke vivado (ya vivadi <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' />  ) ko bilkul alag nazeriye se dekhne ki koshish kari hai aapne.</p>
<p>pehle ignore karke dekh sakte hain</p>
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