विवाद की अविनाशप्रियता
कितनी अज़ीब बात है . मुझे लिखना चाहिए था ‘इन्डस्क्राइब’ पर जो बरसों से उर्दू साहित्य के बेहतरीन नगीने अपने ब्लॉग पर परोस रहे हैं,वह भी बिना किसी शोर-शराबे और टिप्पणी की प्रत्याशा के. लिखना चाहिए था ‘अरुणिमा’ पर जो अभी हाल ही में छंद की पारम्परिक छटा के साथ चिट्ठा जगत में आईं या आए हैं .
लिखना चाहिए था रवि रतलामी या देबाशीष पर जिनका भाषा और साहित्य से लगाव तकनीकी ज्ञान से संयुक्त होकर नए कीर्तिमान रच रहा है . लिखना चाहिए था सुनील दीपक या अनूप भार्गव या जीतू या पंकज नरुला या उड़नतश्तरी या अतुल अरोड़ा या विनय पर जो परदेश में रहते हुए भी अपनी भाषा में लिखने की ललक बचाए और बनाए हुए हैं .
लिखना चाहिए था हिंदी और हिंदी भाषा-समुच्चय की बोलियों के फ़्लेवर से – उसके रूप-रस-गंध से — रची-बसी भाषा का अद्भुत आत्मीय और खिलंदड़ा गद्य रचने के लिए अनूप शुक्ला और प्रियरंजन झा पर . लिखना चाहिए था समसामयिक समस्याओं और राजनैतिक परिदृष्य पर पैनी नज़र रखते और सार्थक हस्तक्षेप करते अफ़लातून या नीरज दीवान या सृजनशिल्पी पर .
लिखना चाहिए था ब्लॉग जगत में बहु-अनुशासनिक अध्ययन का तेवर ‘इंजेक्ट’ करने वाले मसिजीवी पर या उस अद्भुत व्यंग्यकार शुएब पर जिसकी खुदा सीरीज़ की लोकप्रियता खुद अपनी सफ़लता की कहानी कहती है. लिखना चाहिए विविध विषयों पर समान सिद्धहस्तता से कलम चलाने वाले उन्मुक्त,मनीष, रमन कौल और जगदीश भाटिया पर . लिखना चाहिए था श्रीश और अमित जैसे प्रौद्योगिकीवीरों पर जो अपनी तकनीकी-दक्षता का इस्तेमाल हिंदी के हित कर रहे हैं . रामचंद्र मिश्र और प्रतीक पांडेय जैसे सुदर्शन युवकों पर जो हिंदी चिट्ठा संसार की जीवंत उपस्थिति हैं.
लिखना चाहिए था उस नए आए दस्ते पर जिसके प्रमोद सिंह,अभय तिवारी और रवीश जैसे सदस्यों की वजह से हिंदी चिट्ठाकारी में एक नई त्वरा — एक नया पुनर्बलन — दिखाई दे रहा है. लिखना चाहिए था घुघुती बासुती,प्रत्यक्षा,रत्ना,अन्तर्मन,रचना और नीलिमा जैसे स्वरों पर जो दो मोर्चों पर लडते हुए भी इस हिंदी चिट्ठा संसार को नई भंगिमा दे रहे हैं .
लिखना चाहिए था अपने जैसे अनामों यानी धुरविरोधी, अनामदास, काकेश और ब्रह्मराक्षस पर जो अनाम रहते हुए भी कई नामवालों से बेहतर विमर्श कर रहे हैं. लिखना चाहिए लक्ष्मी गुप्त या ज्ञानदत्त पांडेय जैसे वरिष्ठों के बारे में जिनका इस आभासी जगत में हस्तक्षेप किसी न किसी रूप में सहज ज्ञान का कोई न कोई सूत्र अवश्य देता है गुनने के लिए. इस नितांत कविता विरोधी समय में, कविता जैसी विधा को समर्पित मोहन राणा,प्रियंकर,बेजी,रजनी भार्गव,अभिनव,मान्या, योगेश समदर्शी, शैलेश भारतवासी, गिरिराजजोशी, अनुपमा, सुनीता और रन्जू पर भी लिखना चाहता हूं .
यहां तक कि मैं सॉफ़्ट-हिंदुत्व के हामी समझे जाने वाले संजय-पंकज बेंगानी,शशि सिंह,अमिताभ त्रिपाठी,सागर,प्रमेन्द्र और कमल पर भी लिखना चाहता हूं क्योंकि अपने भिन्न दृष्टिकोण के बावजूद अभी तक के अपने चिट्ठा जगत के आचरण में उन्होंने ऐसा कोई कारण नहीं दिया है जिसके चलते उन्हें अलग छेक दिया जाए. हां! उनकी कई बातों पर जोरदार बहस-मुबाहिसे और विरोध ज़रूर हुए हैं. खासकर परिचर्चा में बेंगानी बंधुओं से अफ़लातून और प्रियंकर की तीखी नोंक-झोंक.
भवानी भाई की भाषा में थोड़ी-बहुत तोड़-मरोड़ के साथ कहा जाए तो उसके बाद भी हम यहां नारद पर साथ रह रहे हैं क्योंकि हमें साथ रहने लायक तत्व दिख रहे हैं.
नारद वैसा ही है,जैसा हमारा भारत है. जिसमें मतभिन्नताएं हैं, मतभेद हैं. पर मनभेद न हो इसके प्रयास होते रहे हैं और सफलता से होते रहे हैं. अपने फ़ुरसतिया जी तो पैदाइशी ’नेगोशिएटर’ और नारद के अग्निशामक दस्ते के मुखिया हैं. ज्ञानरंजन की एक कहानी का शीर्षक उधार लूं तो कह सकता हूं कि उनका प्रभाव ’फ़ेंस के इधर और उधर’ दोनों तरफ़ बराबर चलता है. सो अन्ततः शांति कायम हो जाती है. सब कुछ सामान्य और पहले जैसा हो जाता है. वैसे ही जैसे अच्छी कुश्ती के बाद दो अच्छे पहलवान गले मिलते हैं.
पर इस बार फ़ुरसतिया की शांति सेना पहली बार नाकामयाब दिखती है. वे हारे-थके से दिखते हैं. पर उन्हें वैसा देखना दुखद है. उन्हें वैसा नहीं दिखना चाहिए. बस यह पोस्ट इसी उद्देश्य से है . अविनाश तो बहाना है .
अविनाश के लेखन में शुरु से ही एक हिंसक और युयुत्सु भाव दिखाई देता रहा है. उनके लेखन की प्रकृति से यह तथ्य भी सत्यापित होता है कि जो सबसे कम रचनात्मक होता है वह सबसे ज्यादा विवादप्रिय होता है . वे कुछ अच्छे और कुछ अपने खुद के जैसे साथियों के बल पर मोहल्ला चला रहे हैं . चलाएं . कुछ लोगों का मत है कि उनका कोई ‘हिडन एजेन्डा’ है. वह क्या है इसमें अपनी कोई दिलचस्पी तब तक नहीं है जब तक यह साबित न हो जाए कि ऐसा कुछ है. पर कुछ तथ्य तो स्पष्ट दिखते हैं जैसे कि यह कि वे अल्पसंख्यक,दलित और स्त्री विमर्श को अपनी बपौती मानते हैं. खूब मानें अपने को क्या तकलीफ़ है. दिक्कत यह है कि जैसे ही कोई सृजनशिल्पी या संजय बेंगानी या कोई और इस या इन विषयों पर लिखता है. उन्हें लगता है उनके नीचे की ज़मीन खिसक रही है. वे घर से बेघर हो रहे हैं. एक असुरक्षाबोध व्यापने लगता है. सो कई बार युयुत्सा भीतर के कायरपन को छिपाने की एक तरकीब भी होती है. धर्मनिरपेक्षता बहुत महान मूल्य है. बहुत ज़रूरी भी . पर धर्मनिरपेक्षता मूर्खता और फ़ूहड़पन को धो देने वाला साबुन नहीं है. धर्मनिरपेक्षता तर्कशून्यता और ज़ाहिली को ढंकने वाला मुखौटा नहीं है.
एक और लक्षण भी मोहल्ला में साफ़-साफ़ दिखाई देता है , वह है बड़े सम्पादकों जैसे हरिवंश,राजेन्द्र यादव और ओम थानवी की महीन चापलूसी का . करें भाई! खूब करें अपने को क्या है. प्रतीतात्मक और प्रतीकात्मक आदर्शवाद की यही अधोगति होती है. अरे अगला अपना भविष्य सुरक्षित करने के जतन में लगा है सो लगा रहे, नारद का इससे क्या आता-जाता है.
दिक्कत की वजह और है, और चिंता का विषय भी और . मोहल्ला की वजह से और सम्भवतः मोहल्ला की प्रतिक्रिया में भी जिन विषाक्त बीजों का प्रकीर्णन हुआ था उसकी फ़सल तैयार खड़ी है. यह ज़हरीली फ़सल है. ज़हर ही फैलाएगी. समूचा माहौल ज़हरीला कर देगी. इन टिप्पणीकारों के नाम ऐसे हैं जिन्हें देने में भी मुझे शर्मिंदगी का बोध हो रहा है. पर देने तो होंगे ही. ये सब इसी अप्रैल माह में पंजीकृत हुए हैं. इनके नाम हैं : लोला_संत,हस्तमैथुन,है-तो-है,लिंग-भेदी-अस्त्र, इस्लामिक_लेस्बियन आदि-आदि. ज़ाहिर है इनकी टिप्पणियां भी इनके नाम जैसी ही होंगी.
अनाम रहने की क्या यही परिणति है ? इस चेन-रिएक्शन का उत्तर- दायी कौन है ? इस घृणा की पैदावार का क्या किया जाए ? इसका उत्तरदायी यदि मोहल्ला है तो उसका क्या उपचार होना चाहिए. किसी भी ब्लौग को नारद पर बैन करना इसका सबसे आसान उपाय दिखता है. पर मैं स्वयं उनमें से एक हूं जो सिद्धांततः प्रतिबंध के खिलाफ़ हैं. तब क्या किया जाए ?
पर मैं नारद के अपने अनन्य अग्निशामक और शांतिकामी फ़ुरसतिया को हताश और निराश और उदासीन नहीं देखना चाहता. हमें क्या करना चाहिए ? आप इस बारे में क्या सोचते हैं ? ज़रूर-ज़रूर लिखिएगा . आपके उत्तर में मेरी रुचि होगी .
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April 20, 2007 at 12:53 pm
आपने अच्छा लिखा है… लेकिन एक बार ठहर कर फिर सोचिए, क्या आपने सचमुच पूरे विवेक से लिखा है? अगर ऐसा है, तो मैं आपके साथ हूं…
April 20, 2007 at 2:29 pm
भई चौपटस्वामी जी,
चुप और उदास मैं भी हूं, मेरी जानकारी में और भी बहुत-से लोग हैं, मगर यह बात मेरे समझ में नहीं आती कि इसी रेकॅर्ड पर आकर हमारी सूई अटकती क्यों रहती है. इतने सारे विष्ाय हैं जीवन में आप उस पर चिंता लिखिये, टिप्पणियाइये, विचार कीजिये, कविता करिये, एक ही खूंटे पर लौट-लौट कर आने और माथा फोड़ने की ऐसी क्यों पड़ी है?.. छोटे शहरों में कवि होते हैं, महीने-पंद्रह दिन में एक बार जमावड़ा जमता है. सारे कविगण प्रेम कविता वाली कापी लेकर आए होते हैं कि अचानक एक नौजवान प्रेतबाधा की कविता पढ़ना शुरू करता है. रुख एकदम-से मुड़ जाता है और अन्य भाई लोग अपनी-अपनी प्रेतबाधा वाली कविता ढ़ूढ़ने लगते हैं. आप अपनी कविता पढ़िये, भाई, सुनाने दीजिये जिसकी मर्जी है प्रेतबाधा की कपिता. इस्लामिक लेस्बियन और जाने क्या-क्या से बहस में गला दुखेगा धीरे-धीरे शांति लौट आयेगी. नहीं?..
April 20, 2007 at 3:22 pm
चौपटस्वामी जी,
आपने अपनी चिंता जाहिर कर दी है। जिनसे आपकी इतनी अपेक्षाएं जुड़ी हैं, वे शायद आपको उत्तर देकर संतुष्ट करने का प्रयास भी करेंगे। वैसे तो, नारद के कर्णधारों ने कइयों को निराश और असंतुष्ट किया है। यदि यही हाल बना रहा तो शायद उनका मोहल्ला-मोह, सागर की तरह कई दूसरे नियमित चिट्ठाकारों को नारद से दूरी बनाने के लिए मजबूर करेगा। लेकिन वे लोग स्वयंभू महा-चिट्ठाकार हैं, परम विवेकशील हैं, जो करते हैं सोच-समझ कर ही करते हैं और ठीक ही करते हैं। उनका विवेक कभी विचलित नहीं हो सकता। आप यकीन मानिए और इत्मीनान रखिए।
मैं अपने चिट्ठे पर आपके द्वारा उठाए गए प्रश्नों के संदर्भ में अपने स्तर पर कुछ बातें रखने की कोशिश करूंगा अगली पोस्ट में।
आपकी लेखन-शैली अच्छी लगी। आपने तो बहुत जल्द ही हिन्दी चिट्ठा जगत में स्तरीय लेखन करने वालों की पहचान कर ली। इससे जाहिर होता है कि आप दूसरों को बहुत गहराई से पढ़ते हैं। काश कि मोहल्ले वाले भी आपसे कुछ सीख सकते कि दूसरों के बारे में कोई राय बनाने से पहले उनको ठीक से पढ़ना जरूरी होता है।
April 20, 2007 at 3:22 pm
मित्र,
मैं भी काफ़ी दिनों से हिन्दी-ब्लॉगिंग की दुर्दशा देखकर दुखी हूँ। सब लोग एक ही नारा लगा रहे हैं- मोहल्ला। वैसे अब शायद रचनात्मकता की पूछ नहीं रही। मगर कहा जाता है न कि जैजाती छोड़े नहीं छूटती। शायद वही है, जो सबकुछ बचाये हुए है।
April 20, 2007 at 3:35 pm
चिठ्ठाकारिता में आग इतनी तेज फैल गई है कि चिठ्ठाकारित के पुरोध इसमे हाथ सेंकने से डर रहे है कि कहीं हाथ जल न जाये। यह अनूप जी कि ही विवशता नही बल्कि सभी वरिष्ठों की है।
धन्यवाद कि आप संजय-पंकज बेंगानी,शशि सिंह,अमिताभ त्रिपाठी,सागर,प्रमेन्द्र और कमल निखना चाहते है। पर मै नही समझता कि मै इस योग्य हूँ।
आपने संजय-पंकज बेंगानी,शशि सिंह,अमिताभ त्रिपाठी,सागर,प्रमेन्द्र और कमल का उल्लेख किया है। मैने कमल जी को अभी तक नही पढ़ किन्तु उपरोक्त सभी को जानता हॅँ। किसी ने भी आज तक किसी पर कोई अक्षेप नही किया।
लगता है मै जैसा सोचा करता था वह साकार हो रहा है। मै जल्द ही लिखूँगा अपने ब्लाग पर
अगर आप लिखना चाहेगें तो मै सभी के बारे मे पढ़ना चाहूँगा
April 20, 2007 at 3:43 pm
भाई जी ,
आपने मेरी पोस्ट http://kakesh.wordpress.com/2007/04/19/mohalaa_badlo पर तो कोई आपत्ति नहीं की .पर मेरी दो आपत्तियां हैं.
1. आपने मेरा नाम ‘काकेश’ ना लिख ‘ककेश’ लिखा.
2. आपने लिखा अनाम काकेश . क्यों भय्या आपको क्या हमारा नाम “काकेश” नहीं पता. अब मजाक में हमने अपने नाम का संधि - विच्छेद क्या कर दिया आप तो हमें अनाम बोलने लगे.
कृपया बतायें.
काकेश..
April 20, 2007 at 3:44 pm
आपके सवाल का जवाब आसान नहीं है.. सभी लोग त्रस्त से दिख रहे हैं ..शायद फ़िलहाल हमें शांत रहकर अपने भीतर के बेहतर मनुष्य की आवाज़ को सुनना चाहिये..
April 20, 2007 at 4:04 pm
मेरे कुछ तुच्छ सुझाव
April 20, 2007 at 4:47 pm
IGNORE
DO NOT VISIT
DO NOT REACT
DO NOT COMMENT
April 20, 2007 at 4:59 pm
haal ke vivado (ya vivadi
) ko bilkul alag nazeriye se dekhne ki koshish kari hai aapne.
pehle ignore karke dekh sakte hain
April 20, 2007 at 6:00 pm
चिंता न करें ये पैदावार नहीं है. ये खरपतवार है जो कीटनाशक डालकर साफ कर दी जाएगी. जब इनकी कमेंट ब्लाग पर आनी शुरु होगी तब हम गेटकीपर को बिठा रखेंगे जो पास देखकर ही अंदर आने देगा. अंग्रेज़ी चिट्ठाकारी में ये होता आ रहा है. भीड़ बढ़ती है तो ऐसे लोग घुस आते हैं. हिन्दी में आए हैं तो बेवजूद रहेंगे.
”’मैं नारद के अपने अनन्य अग्निशामक और शांतिकामी फ़ुरसतिया को हताश और निराश और उदासीन नहीं देखना चाहता. हमें क्या करना चाहिए ?”’
आपके इस सवाल का जवाब फुरसतिया जी देंगे. मेरे विचार से आग ठंडी होनी शुरू हो गयी है. दस्ता काम पर लगा है.
और हां चौपटास्वामी जी, तारीफ़ में किसी का नाम छूटा तो नहीं? ठीक से देख लें
भई विनोद है. अन्यथा न लें. आपके लेखों को सदा पढ़ता हूं और सहमत भी हूं.
April 21, 2007 at 5:39 am
चौपटस्वामीजी,
चिट्ठाजगत साफ-सुथरा और किसी को भी चोट न पहुँचाने वाला बना रहे यह मुमकिन नहीं है।यहाँ अग्निशामक फुरसतिया हैं तो ‘अप्रैल माह में पंजीकृत स्वनामधन्य विष्ठा’ भी हैं।आज ई-स्वामी ने एक अतिप्रासंगिक आलेख लिखा है।एक छोटा प्रतिगामी दौर है।
April 21, 2007 at 10:57 am
बिल्कुल सत्य कहा।
वाह नारद को इससे सुंदर उपमा नहीं दी जा सकती। कमाल की कल्पना है आपकी।
अब इस बारे में क्या कहें। सब आपने इन दो पंक्तियों में कह ही दिया है।
बाकी रही बात उपरोक्त लोगों से निपटने की तो भाई तय हुआ है कि इन ट्रॉल्स को इग्नोर किया जाए। यही इनका सबसे बेहतर इलाज है।
April 21, 2007 at 1:14 pm
यह देखना बड़ा सुखद है कि आपने इसी बहाने हिंदी के लगभग सभी प्रमुख ब्लागर साथियों को याद कर लिया और अधिक खुशी की बात यह भी है कि जिस रूप में उनके बारे में लिखा वह सच्चाई के बहुत नजदीक है। इससे अहसास होता है कि आप को हिंदी ब्लागर्स के बारे में अच्छी जानकारी है।
वैसे तो इस बारे में तो पूरी पोस्ट लिखने की बनती है लेकिन वह फिर कभी।
सबसे पहली बात तो यह कि मैं इस विषय पर न निराश हूं, न हताश और न ही उदासीन।
अंतर्जाल एक मुक्त व्यवस्था है। यहां हर कोई अपनी मर्जी का लिखने के लिये स्वतंत्र है। यही इसकी सामर्थ्य है यही सीमा भी।
अविनाश के बारे में आपने खुद ही लिखा जो सबसे कम रचनात्मक होता है वह सबसे ज्यादा विवादप्रिय होता है अविनाश का ब्लाग मूलत: ब्लाग नहीं है। वे इसे एक नोटिस बोर्ड की तरह प्रयोग कर रहे हैं। ब्लाग लेखन में व्यक्ति अपने विचार लिखता है जबकि अविनाश अपने किसी उद्देश्य के तहत उन लेखों को पोस्ट करते हैं जो उनको अपने मन, विचार के नजदीक लगते हैं।
चूंकि अविनाश दूसरों का लिखा पोस्ट करते हैं इसलिये उनके पास उन बातों के कोई जवाब नहीं
होते जो लोग उनके ब्लाग पर पोस्ट लेखों के बारे में पूछते हैं। अब सब लेखक रवीश कुमार जैसे तो होते नहीं कि अपने लेखन की जिम्मेदारी लें और अपने कहे, लिखे पर कुछ संसोधन करना हो तो उसे करें।
अविनाश राजेन्द्र यादव या ओम थानवी जैसे जाने-माने लेखकों के लेख क्यों छापते हैं यह वे ही बेहतर बता सकते हैं लेकिन राजेन्द्र यादवजी के बारे में दुनिया जानती है कि वे कितने विवाद प्रिय हैं। बहुत कुछ लिखा-कहा समझा जा चुका है उनके बारे में।
आपने मुझसे यह जानना चाहा कि हम इस बारे में क्या सोचते हैं। इसके पहले हमें ‘निगोशियेटर’ बताया। जहां तक झगड़ा निपटाने की बात है तो यह काम कोई भी तब बेहतर अंजाम दे सकता है जब उसकी बात दोनों पक्ष मानें। यहां तो अविनाश ने हमें खुद एक पार्टी बना दिया। हम यथास्थित वादी हैं , हमारी सोच ऐसी है वैसी है। हम किस मुंह से अविनाश या दूसरों से कुछ कहें।
दूसरा तरीका यह हो सकता है कि जो कोलाज टाइप के लेख मोहल्ले में छपें हम उनको अविनाश की सोच मानते हुये , व्यापक पड़ताल करते हुये साबित करने के अंतहीन प्रयास में जुट आयें कि उनकी सोच ठीक नहीं है। हम बतायें कि उनके नौजवान साथी के सौंदर्य के आयाम कोलतार सी सड़क है उस पर बिखरा गोबर है आदि-इत्यादि। लेकिन मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं है। ऐसा शायद इसलिये भी कि मैं उनको अभी भी अपना ब्लागर दोस्त ही मानता हूं। और जिसको मैं अपना साथी मानता हूं उसको चेताने, टोकने से अधिक और उसके खिलाफ़ कुछ लिखने-पढ़ने में मेरी कोई रुचि नहीं है। न मंशा।
हमारे ब्लागर साथियों को भी यह समझना चाहिये कि अविनाश सारे पत्रकार जगत के प्रतिनिधि नहीं हैं। रवीश कुमार के दैनिन्दिन अनुभव और प्रमोद सिंहजी के लेख ,भले ही वे थोड़े ऊंचे दर्जे के हैं, वे भी उसी पत्रकार जगत से जुड़े हुये लोगों के लेख हैं जो कि ब्लागजगत
की एक उपलब्धि हैं।
मुझे अविनाश से जो कहना था वह मैं उनके ब्लाग पर टिप्पणी करके पहले ही कह चुका। ब्लागिंग एक ऐसा माध्यम है जिसमें आपको अपने लेखन पर प्रतिक्रिया अगर मिलती रहती है तो आपको अच्छा लगता है। आपके ब्लाग पर लाख लोग आयें और कोई प्रतिक्रिया न करें तो आपको अच्छा नहीं लगेगा। और प्रतिक्रिया पाने के लिये आपको लोगों से जुड़ना पड़ेगा। यह एक रिश्तेदारी सा मामला है भाई जिसके यहां तुम जाओगे वो तुम्हारे यहां आयेगा।
मुझे मोहल्ले से कोई खतरा नहीं है, न ही हिंदी ब्लाग जगत को। ऐसा इसलिये कि फिलहाल मोहल्ले में अविनाश अपना कुछ नहीं लिखते। मेरा ऐसा मानना है कि मोहल्ले के बारे में या तो लोग बात करना बंद कर देंगे या मोहल्ले के साथी अपने-अपने ब्लाग खोल लेंगे या अविनाश रवीश कुमार की तरह अपना लेखन करने लगें।
जितनी तीखी भाषा अविनाश अपने परिचयात्मक लेखों में लिखते हैं वे उन औघड़ी भाषा के नमूनों के आगे पासंग भी नहीं हैं जो हमारे तमाम साथी लिखकर छोड़ चुके हैं । वे आजकल नये कामों में जुटे हैं कुछ ही दिन में जब वे काम सामने आयेंगे तब देखियेगा कि मोहल्ले की
सारहीन बहसों और उन उपलब्धियों में क्या अंतर है।
बहुत कुछ बेतरतीब तरीके से लिख गया। अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि मैं अविनाश के मोहल्ले से न परेशान हूं, न उनके रवैये से हैरान। हताश तो कतई नहीं हूं। मैं शांतिकामी हूं क्यॊकि मुझे नहीं लगता कि इस वर्जुअल दुनिया में कुश्ती करने से कुछ हासिल होता है। यहां अपने पोस्ट से किसी दूसरे की पोस्ट को पटक देने से कोई दंगल नहीं जीत जाता। ब्लागर साथी अपना खुद का दिमाग रखते हैं । वे कोई आवारा भीड़ नहीं हैं कि किसी मोहल्ले पर छपी किसी पोस्ट से बहककर कपड़े फ़ाड़ने लगेंगे।
मोहल्ले पर किसी भी तरह के प्रतिबंध के मैं खिलाफ़ हूं। क्योंकि इस तरह का लेखन का इलाज कोई प्रतिबंध नहीं कर सकता। आज ये लिखेंगे कल कोई दूसरा लिखेगा। नारद की भूमिका भी हिंदी के बढ़ते ब्लाग संख्या बदलती जायेगी। आज भी अगर किसी को लिखने की आजादी है तो आपको उसका लिखा पढ़ने या न पढ़ने की आजादी है। आपको अगर किसी चीज को पढ़ना बुरा लगता है तो पढ़्कर मुंह बनाने की बजाय उसे पढ़ने से बचें।
किसी खराब लेखन का जवाब यह है कि आप उससे अच्छा लिखें। लोगों को अच्छा लिखा हुआ पढ़ायें!
वैसे यह बात हैरान जरूर करती है कि अविनाश जैसे नयी उमर के व्यक्ति में महिला, दलित, मुसलमान के हित की इतनी चिंता सवार है कि बेचारे को कुछ भी खुशनुमा नहीं दिखता।
बहरहाल, अविनाश के बहाने ,मैं जो सोचता था वह मैंने लिखा। आपके पढ़ने का आभार!
April 21, 2007 at 5:33 pm
Sabse pahle to aapne aapka lekh achha laga. Shuru ke 7-8 para to sach bahut achha hai. Bhai sab kuch hone ke bawjood main ab tak nahi samjh pa raha hu ki log ek ke peeche itna kyon pade hue hain.
Aap mujhe ye jaroor kah sakte hain ki main abhi yaha naya hu lekin ek baat samjhata hu ki aap ek to kisi ka dusprachar kar rahe hain, jo achhi baat nahi hai.(kam se kam mujhe to nahi pasand) iske saath ek baat aur aap jab bhi kisi ka dusprachar karte hain to use thoda aur prachar mil jata hai.
Aapko uske chhite mein post na karna ho na kare lekin ye kya ki kisi ek ne likha dusre ne likha to sabhi likhne lage.
Ha ye bhi jaroor hai ki apna chittha hai apni marji hai to kyon na likhe lekin thoda rukh to narm ho sakta hai. Kyon ?
Ha ek baat aur ab tak logo ne isme ek bhi post kyon nahi kiya hai main samjh nahi paya? koi khas wajh?
Jo bhi aapne likha accha hai
likhte rahe
April 21, 2007 at 7:22 pm
आपका लेख कुछ कठोर उपाय करने को प्रेरित करता है ।
धन्यवाद
April 23, 2007 at 5:15 am
badiya lekh. dhanyavad.
April 24, 2007 at 12:43 pm
फुरसतिया जी तो झुझारू व्यक्ति हैं। इतनी जलदी तो वे नहीं हारने वाले।
July 5, 2007 at 2:28 pm
[...] जा रही हैं! अनुरोध है कि कृपया इसे आपकी महीन चापलूसी की संज्ञा न [...]