धर्म का धर्मसंकट
धर्म का संबंध मनुष्य के आंतरिक विश्वास और उसके बाह्य नैतिक आचरण — सदाचार – से ठहरता है । धर्म की किसी सर्वमान्य परिभाषा पर एकमत होना मुश्किल काम है । तथापि यदि विभिन्न धर्मों के मूल सिद्धांतों की विवेचना करें तो धर्म का अर्थ उच्चतर मानव मूल्यों को धारण करना ठहरता है जिसे तुलसी ने बहुत सरल और सार्थक भाषा में परिभाषित किया है :
“परहित सरिस धर्म नहिं भाई ।
परपीड़ा सम नहिं अधमाई ।।”
यदि धर्म का तत्व इतना सरल और सहज परिभाषेय होता तो महाभारत में शरशैया पर लेटे भीष्म को ‘धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां’ (धर्म का तत्व अत्यंत गूढ़ है ) कहने की आवश्यकता ही क्यों होती । धर्मग्रन्थ धर्म की एकांगी और विरोधाभासी परिभाषाओं से पटे पड़े हैं । कहीं अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म माना गया तो कहीं अच्छे आचरण को । कहीं-कहीं तो इसे धार्मिक कर्मकाण्ड तक ही सीमित कर दिया गया है । ऐसी स्थिति में धर्म तर्क पर मिथक की जीत का परचम थामे दिखाई दे तो आश्चर्य कैसा ।
धर्म और नैतिकता के मध्य सुनिश्चित संबंध है । विवाद मात्र इस बात पर हो सकता है कि आज नैतिक मूल्यों में आई गिरावट जीवन में धर्म के महत्व में आई कमी की वजह से है अथवा यह व्यक्तिगत या राजनैतिक लाभ के लिए धर्म के इस्तेमाल से उपजा नैतिक मूल्यों और मानकों के सर्वतोमुखी पतन का एक बिम्ब है ।
अपने नए संस्करण में धर्म संस्कृति में नवाचार और रचनात्मकता का विरोधी तो बन ही गया है , यह सभ्यताओं को वर्गीकृत करने और उन्हें एक-दूसरे का शत्रु बनाने का आधार भी बन गया है । संकीर्ण अतिवादी साम्प्रदायिक संगठनों ने इसे अपने ही साथी मनुष्यों के खिलाफ क्रूरता, हिंसा और आतंक को सही ठहराने का जरिया बना दिया है । शाश्वतता और अपरिवर्तनीयता को धर्म का मूल आधार मान कर कठमुल्ले नियतिवादियों ने धर्म के भीतर की विवेकवादी परम्परा का गला घोंटकर धर्म को रूढिवाद की ऐसी अंधी सुरंग में ढकेल दिया है, जहां सिर्फ अज्ञान का अंधेरा है और मौत की ठंडक ।
ऐसे में महात्मा गांधी की देवदूत सरीखी भविष्यवाणी का स्मरण प्रासंगिक होगा :
” भावी समाज की नवरचना में जो धर्म संकुचित रहेगा और बुद्धि की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा, वह टिक नहीं सकेगा क्योंकि उस नव निर्माण में प्रत्येक वस्तु को नए ढंग से आंका जाएगा ।”
*****************
April 12, 2007 at 2:50 am
April 17, 2007 at 6:53 pm
चौपटास्वामी जी. लेखनी जानदार है. लेखन जारी रखिए. मैं इंतज़ार में हूं कि आपको लगातार पढ़ने का मौक़ा मिलता रहेगा. अत्यंत प्रभावोत्पादक.
April 20, 2007 at 4:45 pm
धन्यवाद चौपटस्वामी जी..