Archive for March, 2007

बांगलार नरेन्द्र मोदी ?

March 22, 2007

 बुद्धदेव की बांगलार नरेन्द्र मोदी ?

वे पहले बुद्धदेव थे, फिर क्रुद्धदेव हुए और अब बुद्धूदेव साबित हुए हैं.

पिकासो ने अपनी गुएर्निका में सांडों को हिंसा और आतंक के प्रतीक के रूप में चित्रित किया है .

नंदीग्राम की निरीह गायों पर पगलाए सरकारी सांडों का स्तब्ध करनेवाला तांडव दीदे फाड़-फाड़ कर देखा आपने ?

भारत में वामपंथ के भविष्य का  रास्ता क्या वाया नंदीग्राम जाता है ?

नंदीग्राम वह ‘स्पेस’ है जहां वामपंथ और मुक्त बाज़ार नशे की हालत में गलबहियां डाले खड़े पाए गए .

नंदीग्राम वह ‘स्पेस’ है जो कुछ दिनों तक एक तरह  के ‘ग्राम स्वराज’ के अधीन था . जिसे बकौल बुद्ध बाबू दखल करना बहुत ज़रूरी था कानून की प्रतिष्ठा के लिए ‘क्योंकि सब्ज़ीवाले सब्ज़ियां नहीं बेच पा रहे थे.’ ( आश्चर्य मत करिये ये बुद्ध बाबू के शब्द हैं)

नंदीग्राम वह ‘स्पेस’ है जहां बीस हज़ार से भी ज्यादा किसान और ग्रामवासी अपने अस्तित्व पर होने वाले हमले को लेकर उद्विग्न थे और ‘मरता क्या न करता’ के तहत किसी भी कीमत पर ज़मीन देने को तैयार नहीं थे .

इस कृषिप्रधान देश के किसान का मन समझे बिना विकास की बात करने वाले विदेशी भाव-भूमि पर खड़े इन सूरदासों को क्या तो कहा जाए ?

किसान का मनोविज्ञान — उसका अपनी ज़मीन से जुड़ाव –  न तो मुक्त व्यापार के समर्थक बाज़ारू किस्म के लोग समझ सकते हैं और  न ही भ्रष्ट एवम आपराधिक चरित्र के राजनेता . हर पांच-दस साल में अपना घर/फ़्लैट बेचकर नई जगह बस जाने वाले वाले शहरी मध्यवर्ग से भी इसकी उम्मीद करना बेकार है कि वे ज़मीन के साथ किसान के इस भावनात्मक जुड़ाव को समझ पाएंगे .

तो किसान अब अपने को छोड़ किस पर उम्मीद रखे ? किस पर भरोसा करे ?

इसी नाउम्मीदी का नतीज़ा था नंदीग्राम के किसानों का प्रतिरोध . जिसने नंदीग्राम को  एक ’आइसोलेटेड’ और ‘लिबरेटेड’ इलाके में बदल दिया . जहां अपनी पूरी मशीनरी के बावजूद प्रशासन घुस नहीं पा रहा था . कुछ माह पहले दो-तिहाई बहुमत से जीतने वाली और तीस साल से राज कर रही पार्टी के नुमाइंदे घुसने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे .

किसान बहुत धीरज धरने वाली कौम है. पर उसके धीरज का इम्तिहान लेने की भूल नहीं करनी चाहिये . उसके धीरज का बांध जब टूटता है तो  तख्त उलट जाते हैं और नए इतिहास की रचना होती है . 

सत्ता का चरित्र सब जगह एक-सा होता है . बुद्धदेव के बंगाल में भी वही हुआ जो नरेन्द्र मोदी के  गुजरात में हुआ था . वीभत्स हत्याएं,शिशु हत्याएं और बलात्कार .

यह अकारण नहीं है कि कुछ दिनों से बुद्ध बाबू के मन में नरेन्द्र मोदी के लिए सम्मान भाव जाग्रत हो रहा था जो उनकी भाषा  से  भी  रिस   रहा था .

और इसी इनवेस्टमेंट-प्रेम,  शिल्पायन-प्रेम और मोदी-प्रेम का नतीज़ा है नंदीग्राम .

सुप्रसिद्ध बांग्ला कवि जॉय गोस्वामी ने  ‘बांग्लार नरेन्द्र मोदी’  यानी ‘बंगाल का नरेन्द्र मोदी’  कह कर उनकी  भर्त्सना की  है.

क्या आप  इस तुलना से सहमत  हैं ?

मैं  असहमत हूं .

बुद्धदेव नरेन्द्र मोदी होना भी चाहें तो बंगाल उन्हें होने नहीं देगा .

पार्टी लाइन छोड़कर पूरा बंगाल खड़ा है नंदीग्राम के किसानों के साथ.

विपत्तियां अपने साथ अपना तोड़ भी लेकर आती हैं .

तीस सालों में पहली बार वाम मोर्चा ‘बैक फ़ुट’ पर है .

बंगाल के आम नागरिक और बुद्धिजीवी सड़कों पर उतर आए हैं.

जिसने यह दृश्य देखा है वही जान सकता है इसका प्रभाव.

महाश्वेता देवी,शंखो घोष,नवारुण भट्टाचार्य,जया मित्रा और जॉय गोस्वामी जैसे ख्यातनामा साहित्यकार ; सांओली मित्र,बिभास चक्रवर्ती,मनोज मित्र,मेघनाद भट्टाचार्य,अशोक मुखर्जी,चंदन सेन जैसे समाजचेता नाट्य व्यक्तित्व ; अपर्णा सेन ,गौतम घोष और शशि आनंद जैसे संवेदनशील फ़िल्मकार ; शुभप्रसन्न और जोगेन चौधुरी जैसे बड़े चित्रकार इसके लिए सड़कों पर उतर आए और सरकार को लानतें भेजीं. एक स्वर में धिक्कारा . विभिन्न सरकारी अकादमियों से अपने-अपने इस्तीफ़े दे दिये .

बिभास चक्रवर्ती ने कहा कि ‘बुद्धदेव के सफ़ेद कुर्ते पर खून के छीटे लगे हैं. वे लेडी मेकबेथ की तरह अब कितने बार भी धोएं उनके हाथों में रक्त लगा रहेगा .’

पश्चिम बंग सरकार द्वारा दिया गया बंकिम पुरस्कार लौटाते हुए वरिष्ठ कवि नवारुण भट्टाचार्य ने कहा कि मैं बुद्धदेव के त्यागपत्र की नहीं  बल्कि इस अपराध के लिये ‘दृष्टांतमूलक शास्ति’ यानी ऐसी सज़ा की मांग करता  हूं जो दूसरों के लिए एक उदाहरण का काम करे .

डॉक्टर,वकील,अध्यापक-प्राध्यापक और मीडियाकर्मियों से लेकर राजनैतिक गतिविधियों से दूर रहने वाले साधारण गृहस्थ, गृहणियां कौन नहीं आया सड़कों पर धिक्कार जताने .

यह अंतर है गुजरात और बंगाल में . गुजरात में ऐसा प्रबल प्रतिरोध दिखाई नहीं दिया . गांधीवादी तक चुप्पी खींच गये .

कोलकाता में सिंगूर और नंदीग्राम के लोगों के लिये चंदा मांग रहे कार्यकर्ताओं को लोग इस हिचक और इस शर्मिंदगी से ५०, १०० और ५०० रु. दे रहे थे मानो उनका भी कोई दोष है इस घटना में. शायद वे यह सोच रहे हों कि उनके वोटों से चुनकर आई इस सरकार की करनी का कुछ दोष तो उन पर आता ही है .

इसी लिए चाह कर भी बुद्धदेव भट्टाचार्य    नरेन्द्र मोदी नहीं हो पाएंगे.

जाग्रत और सचेतन बंगाल उन्हें मोदी होने नहीं देगा .

उत्तर-गोधरा  हिंसा ने मोदी को गुजरात में हीरो बना दिया .

नंदीग्राम की हिंसा ने बुद्धदेव को बंगाल में ज़ीरो बना दिया .

************

Hello world!

March 21, 2007

Welcome to WordPress.com. This is your first post. Edit or delete it and start blogging!